Semiconductors: सेमीकंडक्टर पर महासंग्राम की तैयारी

तकनीकी से जुड़े उत्पादन पर नियंत्रण को लेकर दुनिया की महाशक्तियां आपस में टकरा रही हैं। अब सेमीकंडक्टर (माइक्रो चिप) के उत्पादन पर एकाधिकार को लेकर चीन और अमेरिका आमने सामने आ गये हैं।

Semiconductors

जापान के विदेश मंत्री ओशिमासा हायाशी जब 2 अप्रैल को चीन के विदेश मंत्री कुइन गांग से मिले तो उन्हें इस बात का अंदाज हो गया था कि चीन उनसे क्या मांग करने वाला है। क्योंकि वह उसके पहले हाल ही में पद संभालने वाले चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग से मिल चुके थे। उस मुलाकात में वो यह समझ चुके थे कि बीजिंग की रूचि केवल सेमीकंडक्टर (माइक्रो चिप) बनाने के लिए आवश्यक उपकरणों को प्राप्त करने में है, जिसके निर्यात पर जापान ने जुलाई से प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। चीनी नेताओं ने तीन साल तीन महीने बाद पहुंचे किसी जापानी नेता की विदाई इस घुड़की के साथ की कि जापान अमरीका का पिट्ठू ना बने, वरना स्थिति बहुत खराब हो सकती है।

फॉर्च्यून बिजनेस इनसाइट्स के अनुसार 2022 में माइक्रो चिप का वैश्विक व्यापार 573 अरब डॉलर का था, जो कि वर्ष 2029 तक बढ़कर 1380 अरब डॉलर का हो सकता है। माइक्रो चिप का कारोबार सामान्य नहीं है, बल्कि भविष्य के लगभग सभी उद्योग इस चिप पर आधारित हो सकते हैं। चाहे इलेक्ट्रानिक हो या कम्यूनिकेशन या फिर डिफेंस। मोबाइल से लेकर न्युक्लियर रिएक्टर तक में इसका उपयोग हो रहा है और आगे इसका उपयोग बढ़ते ही जाना है।

अभी सेमीकंडक्टर के व्यापार में अमेरिका और ताइवान का दबदबा है। उसके बाद जापान, साउथ कोरिया, नीदरलैंड और यूरोप की कंपनियां भी इसमें महारत हासिल करती जा रही हैं। चीन इस समय दुनिया का प्रोडक्शन हाउस बना हुआ है। उसे इन माइक्रो चिप की सबसे ज्यादा जरूरत हो रही है। पर अमेरिका नहीं चाहता कि चीन इसमें आत्मनिर्भर बने। इसलिए वह सेमीकंडक्टर उत्पादन करने वाले देशों को साथ मिलाकर चीन पर नकेल डालना चाहता है। जापान उसमें भागीदारी करने को तैयार हो चुका है।

जापान और चीन के बीच आपसी रिश्ता वैसे ही है जैसे भारत और पाकिस्तान के बीच। सीमा विवाद और कई जापानी द्वीपों पर चीन के दावे के कारण हर समय युद्ध जैसी स्थिति बनी रहती है। लेकिन जापान के विदेश मंत्री के इतने लंबे समय के बाद इस बीजिंग यात्रा को चीन ने सीमा विवाद या इलाके के दावे में खर्च नहीं किया। रविवार को दोपहर के भोजन पर चीनी विदेश मंत्री कुइन ने बिना लाग लपेट जापान के विदेश मंत्री को यह चेतावनी दे डाली कि टोक्यो अमेरिकी पंजे में ना आए।

चीन के अखबार 'दि ग्लोबल टाइम्स' के अनुसार विदेश मंत्री ने सीधे सेमीकंडक्टर का मुद्दा उठा दिया और कहा कि यह सब अमेरिका के उकसावे पर हो रहा है। जापान ने हाल ही में यह घोषणा की है कि उनका देश माइक्रो चिप बनाने वाले 23 प्रकार के उपकरणों के निर्यात पर इस साल जुलाई से प्रतिबंध लगा देगा। जापान का मानना है कि कुछ देश सेमीकंडक्टर चिप का इस्तेमाल घातक सैन्य उपकरणों में कर रहे हैं। हालांकि जापान ने चीन का नाम नहीं लिया लेकिन बीजिंग ने इसे अपने उपर प्रतिबंध मान लिया है। चीन का कहना है कि अमेरिका की कोशिश है कि चीन के पास यह आधुनिक तकनीक ना पहुंचे। इसलिए वह अपने मित्र देशों पर दबाव बना रहा है।

चीन इस घटना को कितनी गंभीरता से ले रहा है इसका खुलासा दि ग्लोबल टाइम्स के संपादकीय से हो रहा है। दि ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है- जापान को मौजूदा समय में आग के गोले से नहीं खेलना चाहिए।

चीन के प्रति जापान का नकारात्मक रवैया उसको बहुत महंगा पड़ेगा- राजनीतिक रूप से भी और आर्थिक रूप से भी। जापान के इस व्यवहार ने उसे बहुत जोखिम में डाल दिया है। कहा तो यह भी जा रहा है कि चीन ने जासूसी के नाम पर एक जापानी को पकड़ रखा है और उसे छुड़ाने के एवज में चीन जापान को अपनी बात मानने पर मजबूर करना चाहता है। लोग इसे चीन की किडनैपिंग डिप्लोमैसी भी कह रहे हैं। सेमीकंडक्टर बनाने के उपकरणों की आपूर्ति यदि जापान रोक देता है तो चीन को इससे बहुत नुकसान हो सकता है।

चीन और जापान के बीच खुले इस नये फ्रंट के लिए अमेेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध की अपनी भूमिका है। पिछले साल के अंत में अमेरिका की कंपनी माइक्रोन ने शंघाई में चल रही मेमोरी चिप बनाने की अपनी फैक्ट्री बंद कर दी। माइक्रोन के इस फैसले के पीछे चीन को चिप टेक्नोलाॅजी में महारत हासिल करने से रोकना था। एक दूसरा कारण यह भी था कि चीन ने भी कोविड महामारी के दौरान कई देशों को चिप की आपूर्ति रोक दी थी, जिसका असर यूरोप की कई कंपनियों पर पड़ा। अब चीन माइक्रोन को सबक सिखाने पर तुल गया है। उसके खिलाफ चीन ने साइबर सिक्योरिटी कानून के तहत मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

अमेरिका ने पलटवार किया और जापान, नीदरलैंड और ताईवान के साथ मिलकर चिप-4 गंठबंधन बना लिया है। इन चारों देशों ने यह तय किया है कि चिप बनाने वाले प्रमुख उपकरणों का निर्यात बंद कर देंगे। चीन इसी बात पर भड़का है। उसका साफ कहना है कि अमेरिका और उसके सहयोगियों की कोशिश चीन को सेमीकंडक्टर की सप्लाई चेन से बाहर करने तथा उसे सेमीकंडक्टर निर्माण में आत्मनिर्भर बनने से रोकने की है।

चीन ने मेमोरी चिप बिजनेस की लड़ाई में अपने को बचाए रखने के लिए डिप्लोमेसी के साथ साथ धमकाने की नीति पर भी काम शुरू कर दिया है। अमेरिका के माइक्रोन के खिलाफ साइबर सिक्योरिटी कानून के तहत कार्रवाई करने का उसका मुख्य मकसद चीन में काम कर रही उन विदेशी कंपनियों को एक कठोर संदेश देना है जो अभी चीन में चिप का उत्पादन कर रही हैं, खासकर दक्षिण कोरिया की सैमसंग इलेक्ट्रोनिक्स और एसके हाइनिक्स के लिए।

इस समय सेमीकंडक्टर उद्योग पर अमेरिका का दबदबा है। इंटेल, क्वालकॉम, एन वीडिया जैसी अमेरिका कंपनियां चिप उद्योग में अमेरिका को वर्ल्ड लीडर का दर्जा दिला चुकी हैं। अब चीन इस दबदबे को तोड़ना चाहता है। कम से कम वह इस मामले में आत्मनिर्भरता हासिल करना चाहता है, क्योंकि उसे मालूम है कि बिना माइक्रो चिप की सहज उपलब्धता के वह टैक्नोलॉजी आधारित उद्योगों में अमेरिका से लोहा नहीं ले सकता। इस माइक्रोचिप की आवश्यकता, कम्यूनिकेशन से लेकर डिफेंस उद्योग तक में है।

अमेरिका में माइक्रो चिप को लेकर अब यह आम राय बन रही है कि चिप बनाने वाली कंपनियों को फेडरल गवर्मेन्ट स्पेशल फंड दे ताकि भविष्य के लिए जरूरी इस यंत्र को बनाने के लिए महंगे उपकरण खरीदे जा सके। इस मांग को तब और बल मिला जब बिडेन सरकार ने पिछले साल अक्टूबर में सेमीकंडक्टर कानून को मंजूरी दी और साथ में चिप बनाने वाली कंपनियों के लिए 52 बिलियन डाॅलर की सब्सिडी मंजूर की।

चीन भी कहां पीछे रहने वाला है। समाचार एजेंसी रायटर की माने तो चीन ने अपने यहां सेमीकंडक्टर चिप बनाने वाली कंपनियों के लिए एक खरब युआन यानी लगभग 143 अरब डॉलर की सहायता देने की योजना बनाई है। इसमें पांच साल के लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन राशि, टैक्स क्रेडिट और खोज एवं अनुसंधान के लिए सब्सिडी शामिल है। चीन ने निर्यात रोकने के मामले में अमेरिका के खिलाफ वर्ल्ड ट्रेड आर्गनाइजेशन में भी मुकदमा किया है। देखना है कि यह लड़ाई अब आगे कहां तक जाती है। इसमें भारत के लिए सुखद बात इतनी भर है कि ताइवान ने भारत के लोगों को सेमीकंडक्टर उद्योग की ट्रेनिंग देने का भरोसा दिया है और यदि ऐसा होता है तो वैश्विक बाजार में भारत भी एक महत्वपूर्ण स्थान के लिए अपना दावा पेश कर देगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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