Kesavananda Bharati: केशवानंद भारती केस पर रिव्यू पिटीशन की संभावना
Kesavananda Bharati: रिटायर्ड चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने संविधान के बुनियादी ढांचे वाले सुप्रीमकोर्ट के फैसले पर सवाल उठाकर केशवानंद भारती केस को पुनर्जीवित कर दिया है| 1973 में केशवानंद भारती केस में 13 जजों की बेंच ने फैसला किया था कि संविधान के मूल ढांचे में संसद बदलाव नहीं कर सकती| केशवानंद भारती 20 साल का केरल का युवक था, जिसने संविधान संशोधन पर एक याचिका डाली थी। बाद में प्रसिद्ध वकील नानी पालखीवाला ने सूत्र को पकड़ा और केस को आगे बढ़ाया। केशवानंद भारती कभी भी नानी पालखीवाला से नहीं मिले| उन्होंने केस पर पीछे मुड़कर कभी देखा भी नहीं, लेकिन क्योंकि पहली याचिका केशवानंद भारती की थी, इसलिए यह फैसला केशवानंद भारती केस के रूप में जाना गया|
हालांकि यह फैसला 7-6 के अंतर से हुआ था, सात जजों का मानना था कि संसद को संविधान के मूल ढांचे में बदलाव का हक नहीं है, जो संविधान सभा ने लिख दिया, बस लिख दिया, उसके बाद की पीढियां उस पर विचार करके कोई बदलाव नहीं सकती| जबकि छह जज इससे सहमत नहीं थे, उनका मानना था कि चुनी हुई संसद को वही अधिकार हैं, जो संविधान सभा को थे|

इस फैसले में उस समय के चीफ जस्टिस एस एम सीकरी की अहम भूमिका थी| जो लोग इस फैसले का विरोध करते हैं, वे जस्टिस सीकरी को जिम्मेदार ठहराते हैं| सीकरी के अलावा जस्टिस जे एम शेलत, जस्टिस ग्रोवर, जस्टिस के एस हेगड़े, जस्टिस मुखर्जी, जस्टिस पी जगनमोहन रेड्डी और जस्टिस एच आर खन्ना ने बहुमत का फैसला सुनाया था|
जबकि 13 सदस्यीय बैंच के बाकी छह सदस्य जस्टिस ए एन राय, जस्टिस , मैथ्यूज, जस्टिस बेग, जस्टिस द्विवेदी, जस्टिस पालेकर और मौजूदा चीफ जस्टिस डी.वाई. चन्द्रचूड के पिता जस्टिस वाई. वी. चंद्रचूड़ ने संसद की सर्वोच्चता के पक्ष में फैसला सुनाया था| क्योंकि फैसला बहुमत से होना था, इसलिए जो सात जजों ने कहा वह ब्रह्मवाक्य हो गया और जो छह जजों ने कहा वह बेकार हो गया|

कई लोगों का मानना है कि केशवानंद भारती केस के फैसले ने देश के संविधान और लोकतंत्र की रक्षा की| ज्यादातर कानूनविद यह भी मानते हैं कि देश को केशवानंद भारती और नानी पालखीवाला का हमेशा आभारी होना चाहिए कि वे देश के संविधान और लोकतंत्र की रक्षा करने वाले इस फैसले के हिस्सेदार थे| ऐसा कहा जाता है कि इस फैसले ने भारत के संविधान की रक्षा की और भारत में अधिनायकवादी शासन या एक दलीय सरकार के शासन को आने से रोका|
इस फैसले ने बुनियादी ढांचे के प्रसिद्ध सिद्धांत को निर्धारित करके संसद की सर्वोच्चता को खत्म कर दिया, बुनियादी ढाँचे शब्द का आविष्कार जस्टिस सीकरी ने किया था| इस एतिहासिक फैसले से लोकतंत्र की दशा और दिशा ही बदल गई| सुप्रीमकोर्ट को यह स्थाई अधिकार मिल गया कि वह संसद से पारित किसी भी क़ानून की संवैधानिकता की जांच कर सकता है, और संसद के क़ानून को रद्द भी कर सकता है|
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी निर्वाचित संसद पर अंकुश लगाने का फैसला देने वाले सात जजों से बेहद खफा थीं| वह इतने गुस्से में थी कि फैसले के अगले ही दिन उन्होंने तीन सीनियर जजों को बाईपास कर के फैसले के खिलाफ मत लिखने वाले चौथे नंबर के जज जस्टिस ए.एन. राय को चीफ जस्टिस बना दिया| जस्टिस ए.एन. राय ने लिखा है कि उन्होंने इंदिरा गांधी से सोचने का वक्त मांगा था, लेकिन जितना वक्त मांगा था, उससे पहले ही अपनी सहमति दे दी थी, क्योंकि अगर वह सहमति नहीं देते, तो कोई और जूनियर जज चीफ जस्टिस बनता|
जस्टिस ए.एन. राय को चीफ जस्टिस बनाए जाने के खिलाफ जस्टिस शेलात, जस्टिस हेगड़े और जस्टिस ग्रोवर पहले छुट्टी पर चले गए और बाद में तीनों ने इस्तीफा दे दिया था| जस्टिस ए.एन. राय को चीफ जस्टिस बनाने के बाद इंदिरा गांधी ने संसद की सर्वोच्चता बहाल करवाने के लिए अटार्नी जनरल निरेन डे से रिव्यू पीटिशन दाखिल करने के लिए कहा| इंदिरा गांधी के निर्देश पर अटार्नी जनरल डे ने चीफ जस्टिस ए.एन. राय के सामने मौखिक पीटिशन दाखिल की थी।
चीफ जस्टिस राय ने 13 सदस्यीय नई संवैधानिक पीठ का गठन करके रिव्यू का आदेश भी दिया था, इसी बीच इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगा दिया और सारी शक्ति अपने हाथ में ले ली| सुप्रीमकोर्ट में आठ नए जजों की नियुक्ति की गई, खुद राय की नियुक्ति भी विवादास्पद हो चुकी थी, क्योंकि इंदिरा गांधी ने केशवानंद भारती केस का फैसला करने वाले तीन जजों को बाईपास कर के ए.एन. राय को चीफ जस्टिस बनाया था|
मौखिक रिव्यू पीटिशन पर सुनवाई हुई, लेकिन नानी पालखीवाला की दलीलों के सामने अटार्नी जनरल टिक नहीं पाए। पहली सुनवाई में 8 जज पालखीवाला से सहमत हो चुके थे कि रिव्यू पीटिशन नहीं बनती। दूसरी सुनवाई में बाकी 4 जज भी पालखीवाला से सहमत हो गए और चीफ जस्टिस ए.एन. राय अकेले पड़ गए| इस तरह रिव्यू पीटिशन खारिज हो गई थी| सुप्रीमकोर्ट के रिकार्ड में इस रिव्यू पीटिशन का कोई रिकार्ड नहीं है, क्योंकि लिखित पीटिशन थी ही नहीं। यह सब वर्णन पूर्व सोलिसीटर जनरल टीआर अन्ध्यारुजिना की किताब में है, जिसका जिक्र रंजन गोगोई ने 7 अगस्त को राज्यसभा में किया था|
केशवानंद भारती केस ने संसद की सर्वोच्चता को खत्म करके सुप्रीमकोर्ट की सर्वोच्चता कायम कर दी थी| इंदिरा गांधी कुछ नहीं कर पाई थी। अपनी झेंप मिटाने के लिए इंदिरा गांधी ने आपातकाल में ही 42वां संशोधन करके संविधान की प्रस्तावना, जिसे संविधान का मूल ढांचा कहा जा रहा है, उसमें समाजवाद और सेकुलरिज्म को बिना संसद की मंजूरी के अपनी तरफ से जोड़ दिया|
केशवानंद भारती केस में संसद की सर्वोच्चता को खत्म करने के बाद सुप्रीमकोर्ट ने जजों की नियुक्ति का अधिकार भी सरकार से छीन कर अपने हाथ में ले लिया| उससे पहले सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस से सिर्फ सलाह ली जाती थी, लेकिन सुप्रीमकोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने फैसला दिया कि चीफ जस्टिस की सलाह बाध्यकारी है| सुप्रीमकोर्ट के कोलिजियम सिस्टम की आज भी आलोचना होती है|
इस कोलिजियम सिस्टम को खत्म करके हाईकोर्टों और सुप्रीमकोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए आयोग बनाने पर लंबे समय से विचार चल रहा था| 2013 में यूपीए सरकार ने आयोग का बिल तैयार किया, लेकिन संसद के दोनों सदनों से सर्वसम्मति से बिल पास हुआ नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद| लेकिन सुप्रीमकोर्ट ने उसे भी संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ बता कर खारिज कर दिया|
पिछले दिनों सरकार और सुप्रीमकोर्ट के बीच जजों की नियुक्ति को लेकर काफी लंबा विवाद चला| उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और तत्कालीन क़ानून मंत्री किरन रिजीजू ने सुप्रीमकोर्ट के उस फैसले पर रिव्यू की जरूरत बताई थी, जिसमें सुप्रीमकोर्ट ने जजों की नियुक्ति के लिए बनाए गए आयोग के क़ानून को खारिज कर दिया था|
यह विवाद इतना बढ़ गया कि एक बार ऐसा लगने लगा कि सरकार जजों की नियुक्ति के लिए खुद सुप्रीमकोर्ट की ओर से बनाए गए पांच जजों के कोलिजियम सिस्टम को खत्म करने का उपाय सोच रही है| लेकिन इस विवाद की परिणिति किरन रिजीजू का विभाग बदलने से हुई| इसका मतलब यह निकाला गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न्यायपालिका से फिलहाल किसी टकराव के मूड में नही है|
लेकिन पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने दिल्ली सेवा बिल पर बहस के दौरान संविधान के मूल ढाँचे पर सवाल उठा कर गढ़े मुर्दे उखाड़ दिए हैं| संसद की सर्वोच्चता या सुप्रीमकोर्ट की सर्वोच्चता का सवाल केशवानंद भारती के फैसले के बाद से उठता रहा है| जस्टिस रंजन गोगोई जब चीफ जस्टिस थे तो उनकी राय संविधान की सर्वोच्चता की थी, लेकिन अब जबकि वह राज्यसभा के सदस्य हैं, तो अब उनकी राय संसद की सर्वोच्चता की है|
जस्टिस रंजन गोगोई ने अपने भाषण में कहा कि केशवानंद भारती केस पर पूर्व अटार्नी जनरल टीआर अन्ध्यारुजिना की एक किताब है, उस किताब को पढ़ने के बाद उनका विचार यह बना है कि संविधान के मूल ढांचे पर चर्चा हो सकती है और यह मूल ढांचा न्यायशास्त्रीय आधार है, इससे ज्यादा वह कुछ नहीं कहना चाहते| दिल्ली सेवा बिल पर चर्चा के दौरान संविधान के मूल ढांचे का सवाल इसलिए खड़ा हुआ, क्योंकि दिल्ली सेवा अध्यादेश को चुनौती देने वाली दिल्ली सरकार की याचिका के दो हिस्सों पर संवैधानिक पीठ फैसला करेगी कि यह संविधान के मूल ढांचे से छेड़छाड़ है या नहीं|
अब यहां राजनीति शुरू होती है। इंदिरा गांधी केशवानंद भारती केस के फैसले से खफा थी, लेकिन अब जब मनोनीत सांसद जस्टिस गोगोई ने सवाल उठाया है, तो मौजूदा कांग्रेस तिलमिला उठी है| हालांकि पूर्व चीफ जस्टिस की टिप्पणी भारतीय जनता पार्टी का स्टैंड नहीं है, वह मनोनीत सदस्य हैं, लेकिन कांग्रेस ने उनके इस स्टैंड पर भारतीय जनता पार्टी को कटघरे में खड़ा करते हुए पूछा है कि क्या उसका सेक्यूलरिज्म में विश्वास नहीं है| हालांकि इंदिरा गांधी ने केशवानंद भारती केस के फैसले के बाद संविधान की प्रस्तावना में सेक्युलर शब्द संविधान संशोधन के जरिए आपातकाल में जोड़ा था|
जस्टिस रंजन गोगोई की संसद में की गई टिप्पणी की गूंज सुप्रीमकोर्ट में भी दिखाई दी, जब अगले दिन कांग्रेस के पूर्व नेता और राज्यसभा के मौजूदा निर्दलीय सांसद कपिल सिब्बल ने सुप्रीमकोर्ट में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के खिलाफ चल रही बहस के दौरान रंजन गोगोई की राज्यसभा में की गई टिप्पणी का उल्लेख किया| इस पर चीफ जस्टिस डी.वाई. चन्द्रचूड ने कहा कि पूर्व चीफ जस्टिस की वह व्यक्तिगत राय हो सकती है, कोर्ट उससे सहमत नहीं है| हालांकि चीफ जस्टिस डी.वाई. चन्द्रचूड के पिता जस्टिस वाई.वी. चंद्रचूड़ उन छह जजों में शामिल थे, जो केशवानंद भारती केस में फैसले के खिलाफ थे|
आज कांग्रेस की कोई भी राय हो, यह सबको पता है कि इंदिरा गांधी केशवानंद भारती केस के फैसले से बेहद खफा थी। उन्होंने फैसले के पक्ष में मत देने वाले तीन वरिष्ठ जजों को चीफ जस्टिस बनने से रोकने के लिए फैसले के खिलाफ मत देने वाले चौथे जज ए.एन. राय को वरिष्ठता न होने के बाद भी चीफ जस्टिस बना दिया था|
लेकिन बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि रंजन गोगोई ने यह सवाल अपने आप खड़ा किया है या प्रधानमंत्री से सलाह मशविरे के बाद किया है| क्योंकि इंदिरा गांधी की तरह नरेंद्र मोदी भी न्यायपालिका के सरकार और संसद के रोजमर्रा के कामों में बार बार दखल से खफा हैं| इंदिरा गांधी जो नहीं कर सकी, क्या मोदी वह करना चाहते हैं? क्या वह केशवानंद भारती केस की रिव्यू पीटिशन दाखिल करवाना चाहते हैं?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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