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Politics on Ram: राम नाम पर टिकी भविष्य की राजनीति

अगले साल की रामनवमी से पहले रामलला अयोध्या के राम मंदिर में विराजमान हो चुके होंगे। लेकिन इससे हिंदू मतदाता एकजुट न हों, इसके लिए रामचरितमानस को अभी से मुद्दा बनाकर हिंदुओं को बांटने की योजना पर काम शुरु हो चुका है।

ram navami 2023

इस बार की रामनवमी विशेष होने जा रही है क्योंकि अयोध्या में अस्थायी टेंट में बिराजे प्रभु श्रीराम, लक्ष्मणजी और जानकी माता के साथ अगले वर्ष की रामनवमी में नए बन रहे राम मंदिर में प्रतिष्ठित हो चुके होंगे। यह वही समय होगा जब पूरे देश में लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा चल रही होगी।

भाजपा के लिए राम मंदिर का मुद्दा राजनीतिक ही नहीं भावनात्मक भी है और प्रभु श्रीराम की उनके स्थान पर प्राण-प्रतिष्ठा निश्चित रूप से जनता को भाजपा के पक्ष में वोट करने को प्रेरित करेगी क्योंकि भाजपा एवं सहयोगी संगठनों ने इस मुद्दे पर जितना संघर्ष किया है उतना किसी अन्य संगठन से नहीं किया।

उत्तर प्रदेश में सत्तासीन भाजपा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राम मंदिर को लेकर वैसे भी सजग है और रामनवमी तथा दीपावली पर अयोध्या में आयोजित हो रहे भव्य सरकारी कार्यक्रम इसकी गवाही भी देते हैं। जनता भी इन अवसरों पर बढ़-चढ़कर अपने भावों का प्रदर्शन करती है और यही भाव निश्चित रूप से वोटों में तब्दील होकर भाजपा को मजबूती देता है।

राम से बैर नहीं किन्तु रामचरितमानस की खैर नहीं
तमाम राजनीतिक दल भी यह समझ चुके हैं कि राम के नाम पर भाजपा हमेशा से ही अग्रणी रही है और चूंकि राम का नाम जनमानस में आदर्श के रूप में स्थापित है अतः उन्होंने इस बार राम के चरित्र को स्वीकार करते हुए राम मंदिर पर चुप्पी साध ली है किंतु हाल ही में विपक्ष के पास राम नाम से जुड़ा एक ऐसा मुद्दा हाथ लगा है जिसने भाजपा की पेशानी पर भी बल ला दिया है।

दरअसल, गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस की कुछ चौपाइयों को लेकर विवाद है और उन्हें दलित व स्त्री विरोधी सिद्ध किया जा रहा है।

ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी।
सकल ताड़ना के अधिकारी।।

रामचरितमानस की इस चौपाई पर समाजवादी पार्टी से लेकर राष्ट्रीय जनता दल तक मुखर हो चुके हैं और भाजपा के मजबूत हिंदू वोट बैंक में इसी बहाने सेंध लगाने का प्रयास कर रहे हैं। बिहार के मधेपुरा से विधायक और महागठबंधन सरकार में आरजेडी के कोटे से बिहार के शिक्षा मंत्री डॉ. चंद्रशेखर सिंह ने रामचरितमानस को नफरत फैलाने वाला और दलित तथा महिला विरोधी बताया तो राजनीति में भूचाल आ गया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मूकता ने इस बात पर भी मुहर लगा दी कि अपनी जाति के वोटों की फसल काटते-काटते नीतीश बाबू भी दलित वोट बैंक को अपने पाले में लाने का स्वप्न देखने लगे हैं।

बिहार से प्रारंभ हुई यह रामचरितमानस विरोधी विकृत राजनीति उत्तर प्रदेश तक पहुंची और सपा के स्वामीप्रसाद मौर्य ने रामचरितमानस के विरोध में जिस प्रकार मोर्चा खोलते हुए इसे दलित, पिछड़ा और महिला विरोधी बताया उससे भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग पर भी संकट के बादल छा गए।

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी स्वामीप्रसाद मौर्य के बयानों का न तो विरोध किया और न ही समर्थन किंतु विरोध करने वाली दो महिला नेत्रियों को पार्टी से बाहर करके उन्होंने यह संकेत तो दे ही दिया कि यदि बात पिछड़े और दलित वोटों को भाजपा से तोड़ने की बात है तो वे स्वामीप्रसाद मौर्य के साथ हैं। हालांकि अपने विवादास्पद बयानों के चलते स्वामीप्रसाद मौर्य पर कई एफआईआर दर्ज हुई हैं किंतु जातिगत वोटों के लिए वे अभी भी रामचरितमानस के विरोध पर डटे हैं।

राम मंदिर की काट रामचरितमानस से
लोकसभा चुनाव होने में अभी एक वर्ष का समय है किन्तु इसकी राजनीतिक बिसात बिछना प्रारंभ हो चुकी है। यह तय है कि अगला आम चुनाव राम और काम बनाम जातिवाद पर होना तय है। हाल ही में राहुल गांधी के "मोदी सरनेम" पर दिए गए विवादास्पद बयान ने भाजपा को यह अवसर दिया है कि वह कांग्रेस की ओबीसी विरोधी छवि को समुदाय तक ले जाकर उसे भुनाए ताकि राजनीतिक रूप से सक्षम यह वर्ग कांग्रेस से विमुख होकर भाजपा को लाभ दे।

हालांकि यह इतना आसान भी नहीं है क्योंकि इसी मुद्दे पर राहुल गांधी की संसद सदस्यता रद्द होने और उसके बाद उनके सरकारी आवास का आवंटन रद्द होने से जनमानस में कहीं न कहीं राहुल गांधी के प्रति सहानुभूति दिखाई दे रही है। वैसे भी आम भारतीय जनमानस पहले से दबे-कुचले किसी भी व्यक्ति को अधिक त्रास देने को स्वीकार नहीं कर पाता। राहुल गांधी का राजनीतिक उभार अब जनता तय करेगी। वैसे सही राजनीतिक बिसात तो उत्तर प्रदेश में बिछ रही है जहां लोकसभा की 80 सीटें हैं और जो दल इनमें से अधिकांश पर विजयी होगा, केंद्र में सरकार बनाने का उसका दावा उतना ही मजबूत होगा।

पिछड़े और दलित बंटे तो भाजपा को होगा नुकसान
इसलिए राजनीतिक कुश्ती का केन्द्र यूपी और बिहार ही रहने वाले हैं जो जातिवादी राजनीति के गढ़ कहे जाते हैं। यदि बिहार में आरजेडी और यूपी में सपा जैसे दल रामचरितमानस पर पिछड़े एवं दलित वर्ग का मन बदलने पर सफल होते हैं तो अब तक भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरा गरीब मतदाता उससे छिटक सकता है क्योंकि भाजपा किसी भी हालत में रामचरितमानस का विरोध नहीं कर सकती।

यदि उसने राजनीतिक लाभ-हानि के फेर में रामचरितमानस का विरोध किया भी तो उसकी राम हितकारी छवि पर कुठाराघात होगा और फिर उसके लिए "माया मिली न राम" जैसी स्थिति हो जाएगी। विपक्षी दल यही चाहते हैं और वे जानबूझकर रामचरितमानस को दलित-महिला विरोधी होने के साथ ही समाज में नफरत फैलाने वाला ग्रंथ भी बता रहे हैं।

भाजपा का इस मामले में अब तक का रवैया "देखो और विचार करो" वाला रहा है। भाजपा के रणनीतिकारों को उम्मीद है कि एक बार राम मंदिर का निर्माण पूरा हो जाए और प्रभु श्रीराम परिवार सहित गर्भगृह में प्रतिष्ठित हो जायें तो जनता अपने आप विपक्ष की इस राजनीति को ठुकरा देगी। आस्था के ज्वार में क्या ओबीसी और क्या ब्राह्मण-वैश्य; सभी गोते लगाएंगे और इस स्थिति में उसे सर्वाधिक लाभ होगा। कुल मिलाकर इस बार की रामनवमी से लेकर अगले वर्ष की राम नवमी तक देश की राजनीति की धुरी राम और रामचरितमानस ही रहने वाले हैं।

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