Andhra Pradesh: गणित के साथ केमिस्ट्री भी देख रही है भाजपा

Andhra Pradesh: कांग्रेस ने यह मान लिया है कि वह अकेले चुनाव नहीं जीत सकती| इसीलिए उसने यूपीए को नया रूप देते हुए उन दलों को भी साथ जोड़ा है जो पहले कांग्रेस और भाजपा से बराबर की दूरी का राग अलापते रहे थे| राजनीति में कोई हमेशा के लिए विरोधी नहीं होता, और कोई स्थायी दोस्त नहीं होता| सुविधा और स्वार्थ के अनुसार मित्र और विरोधी बदलते रहते हैं| पिछ्ला लोकसभा और विधानसभा चुनाव आमने सामने लड़ने वाली कई पार्टियां भाजपा को हराने के लक्ष्य से एकसाथ आ गई हैं|

इसमें कोई शक नहीं कि आज की तारीख में भारतीय जनता पार्टी को एक एक सीट पर गणित लगाना पड़ रहा है, क्योंकि तीसरी बार अपने बूते पर सरकार बनाना उसके लिए टेढ़ी खीर लग रहा है| खतरा सामने देख कर भाजपा ने भी राजग को फिर से जीवित किया है, और उसमें नए घटक जोड़कर उनकी संख्या 38 की है। लेकिन उनमें ज्यादातर पार्टियां सिर्फ नाम की ही पार्टियां है, आधे से ज्यादा दलों के तो लोकसभा या विधानसभा में भी सदस्य नहीं है| इन दलों को उसने इसलिए अपने साथ जोड़ा है, क्योंकि इनके साथ जुड़ने से भाजपा की अपनी सीटें मजबूत होंगी| इन छोटे दलों को छोटी मोटी रेवड़ियों से निपटाया जा सकता है|

politics BJP looking at chemistry Along with mathematics in Andhra Pradesh

विपक्ष ने भाजपा की खिल्ली उड़ाई है कि उसके साथ जुड़े दलों का जमीनी आधार नहीं है। यह असल में जमीनी हकीकत को समझे बिना दिया गया बयान है| ड्राईंग रूम की राजनीति करने वाले यही नहीं समझ पाते कि भाजपा में ठोस गणित के आधार पर फैसले किए जाते हैं, भाजपा की गणित और केमिस्ट्री की पाठशाला 24 घंटे काम करती है| जमीनी हकीकत को समझ कर ही भाजपा ने उन छोटे दलों को अपने साथ जोड़ा। क्योंकि जब भाजपा के सामने विपक्ष का साझा उम्मीदवार होगा, तो भाजपा के लिए अपनी पुरानी सीटों को बचाने के लिए एक एक वोट महत्वपूर्ण होगा|

इससे पहले कि ये छोटे छोटे जाति आधारित दल इंडिया गठबंधन के साथ जुड़ते, भाजपा ने भविष्य के मुकाबले को देखते हुए उन्हें अपने साथ जोड़ा है| यह बात अब इंडिया गठबंधन को भी समझ आ रही है, इसलिए एनडीए में गए दलों पर डोरे डालने की कोशिश हो रही है| एनडीए बैठक में शामिल हुए एक दो दल इंडिया गठबंधन में चले गए तो मनोवैज्ञानिक असर होगा| इसलिए भाजपा खिसकने वाले छोटे दलों की कमर कस रही है|

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जहां भाजपा उत्तर भारत की अपनी सीटों को बचाने के लिए हर छोटे बड़े दल पर डोरे डाल रही है, वहीं दहलीज पर खड़े दो मजबूत दलों को वह अपने से दूर रख रही है| इंडिया गठबंधन की पटना बैठक के समय भाजपा में खलबली मची थी, इसलिए 23 जुलाई को ही भानुमती का कुनबा जोड़ कर राजग की भी बैठक बुलाई गई थी| तब ऐसा लगा था कि खुद का कुनबा बड़ा बताने के लिए भाजपा हर किसी के लिए दरवाजा खोल कर बैठी है| लेकिन भाजपा ने अपने दो पुराने सहयोगियों अकाली दल और तेलुगु देशम के लिए अब तक दरवाजे नहीं खोले| इसका कारण यह है कि भाजपा गठबंधन भी भविष्य के गणित और केमिस्ट्री को ध्यान में रख रही है|

आंध्र प्रदेश और पंजाब में भी भाजपा का कोई जमीनी आधार नहीं है, वह किसी के साथ गठबंधन करके भी कुछ हासिल नहीं कर पाएगी| हां आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी को भाजपा से गठबंधन करके जरुर फायदा हो सकता है, इसलिए चन्द्रबाबू नायडू पिछले तीन महीनों से हाथ पैर मार रहे हैं| लेकिन नरेंद्र मोदी के बारे में कहा जाता है कि खुद की गरज हो तो वह धोखा देने वाले को भी गले लगा लेंगे, लेकिन खुद की गरज न हो तो धोखा देने वाले को नहीं बख्शते|

तेलुगु देशम और अकाली दल के साथ यही हो रहा है| अकाली दल ने किसान आन्दोलन के समय एनडीए का साथ छोड़ा था, यह नरेंद्र मोदी की दूसरी पारी का सबसे बड़ा संकटकाल था| इसी तरह चंद्रबाबू नायडू ने 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले एनडीए छोड़ दिया था, और मोदी के खिलाफ मोर्चा बनाने के लिए दिल्ली के आंध्र भवन में धरने पर बैठ गए थे, जहां सभी मोदी विरोधी दल भी उनके साथ शामिल हुए थे| उनका गणित यह था कि भाजपा का तो आंध्र में कोई आधार है नहीं, लेकिन अगर कांग्रेस और वामपंथी दल उन्हें समर्थन दे दें, तो वह फिर से सरकार बनाने में कामयाब हो जाएंगे| उन्हें कांग्रेस और वामपंथियों का साथ मिला भी, लेकिन वह 2019 का विधानसभा चुनाव बहुत बुरी तरह हार गए|

2014 के विधानसभा चुनावों में जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआरसीपी को 70 विधानसभा सीटों पर जीत मिली थी, जबकि नायडू की टीडीपी को 116 सीटें मिली थीं| इसी चुनाव में वाईएसआरपी को 27.88 प्रतिशत वोट मिले जबकि टीडीपी को 32.53 प्रतिशत वोट मिले थे| मुख्यमंत्री रहते हुए चंद्रबाबू नायडू ने भाजपा से गठबंधन तोड़ा, तो 2019 के विधानसभा चुनावों में तेलुगु देशम का पत्ता साफ़ हो गया, उसे विधानसभा में सिर्फ 23 सीटें मिलीं, जबकि वाईएसआरसीपी 151 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी|

2014 में 21 सीटें जीतने वाली कांग्रेस और 9 सीटें जीतने वाली भाजपा का सूपड़ा ही साफ़ हो गया था| वोट प्रतिशत में भी वाईएसआरसीपी को बड़ा फायदा हुआ और ये बढ़कर 49.95 प्रतिशत हो गया| भाजपा और कांग्रेस के सफाए के कारण वोट तो तेलुगु देशम के भी बढ़कर 39.17 फीसदी हुए, लेकिन ये सीटों में नहीं बदले|

तेलुगु देशम को सत्ता से बाहर होना पड़ा, लेकिन भाजपा को उसके गठबंधन तोड़ने का फायदा हुआ| उसे आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस के रूप में ऐसा सहयोगी मिल गया, जो पर्दे के पीछे रह कर पिछले साढ़े चार साल तक राज्यसभा में मोदी सरकार का पालनहार बना रहा| भाजपा की प्राथमिकता दक्षिण राज्यों में कांग्रेस की बढ़ती ताकत को रोकना है|

पिछले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को 53 में से 24 सीटें दक्षिण से मिली थीं| इनमें से 15 केरल से, आठ तमिलनाडु से, एक कर्नाटक से| कर्नाटक से भाजपा को 25 में से 23 सीटें मिलीं थी। कर्नाटक में अब कांग्रेस सरकार होने और कांग्रेस के पक्ष में दलित-मुस्लिम गठबंधन के कारण लोकसभा चुनावों में भाजपा की सीटें घटना और कांग्रेस की बढ़ना स्वाभाविक है| आंध्र प्रदेश से कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली थी, और भाजपा चाहती है, इस बार भी उसका खाता न खुले| चन्द्रबाबू नायडू को मजबूत करके वह चुनावों को त्रिकोणीय नहीं बनाना चाहती, ऐसे होने से कांग्रेस को दो-चार सीटों पर फायदा हो सकता है|

आंध्र प्रदेश में आज भी वाईआरएस कांग्रेस का पलड़ा भारी है। न सिर्फ विधानसभा, बल्कि लोकसभा में भी वाईआरएस कांग्रेस के ही ज्यादा सीटें जीतने के चांस हैं| सत्रहवीं लोकसभा और राज्यसभा में खासकर वह भाजपा की पालनहार रही| भाजपा भविष्य में भी जगन मोहन रेड्डी को अपने पालनहार के रूप में देखती है| 2019 के लोकसभा चुनाव में वाईएसआर कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश की 22 सीटों पर कब्जा जमाया था और तेलुगु देशम को सिर्फ 3 सीटें मिलीं थी|

वाईएसआर कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों में भी एकतरफा जीत हासिल की थी| उसकी बढ़त आज भी साफ़ दिखाई दे रही है| इसलिए भाजपा मानती है कि लोकसभा चुनावों के सीधे मुकाबले में भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, तो जगन मोहन रेड्डी जिस तरह चार साल से राज्यसभा में मोदी के संकटहार बने हुए थे, उसी तरह अठाहरवीं लोकसभा में भी नरेंद्र मोदी के संकटकाल का सहारा हो सकते हैं| लेकिन अगर मोदी अब चन्द्रबाबू नायडू को एनडीए में शामिल कर लेते हैं, तो चुनाव से पहले या चुनाव के बाद जगन मोहन रेड्डी इंडिया गठबंधन के साथ जा सकते हैं| अब जब चुनावी गणित साफ़ दिखाई दे रहा है कि जगन मोहन रेड्डी की आंध्र प्रदेश में बढ़त बनी हुई है, तो मोदी अपने गले में सांप क्यों बांधें|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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