Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

ध्यान करते हुए भी ध्यान खींच रहे हैं मोदी

Modi Meditation: चुनाव प्रचार समाप्त हो चुका है। नेताओं की यात्राएं भी ठहर गयी हैं, परंतु पीएम मोदी की कन्याकुमारी की यात्रा और विपक्ष का उस यात्रा के खिलाफ शोर, चुनाव की गहमागहमी को कम नहीं होने दे रहा।

बीजेपी के खिलाफ लड़ रही सभी पार्टियों का एक सुर में कहना है कि एक जून को चुनाव वाले दिन भी मोदी अपने अलग अंदाज में चुनाव प्रचार करते हुए ही नजर आएंगे। क्योंकि अपनी साधना के दौरान भी पूरे दिन वह टीवी स्क्रीन पर ही रहेंगे। भारत और दुनिया भर के तमाम मीडिया चैनल रामेश्वरम पहुँच चुके हैं, और वे सभी पीएम मोदी के हर पल की रिपोर्टिंग 1 जून की शाम तक करने वाले हैं।

Modi Meditation

नरेंद्र मोदी के बारे में अब एक आम धारणा बन भी गई है कि वह एक चुनाव मशीन की तरह काम करते हैं। 2002 से लेकर आज तक अपना कोई चुनाव नहीं हारने वाले मोदी बीजेपी के लिए एकदम अपरिहार्य बन गए हैं। वह हैं तो एक व्यक्ति, लेकिन कई भूमिकाएँ निभाते हैं। पिछले 10 सालों से वह हर चुनाव में बीजेपी के लिए सलामी बल्लेबाज बन कर सबसे आगे उतरते हैं। मोदी सुनिश्चित करते हैं कि पार्टी हर हाल में जीते।

बीजेपी के चुनाव में जीतने के आधार पर वह अपनी योजनाएँ बनाते हैं। यह देखा गया है कि जब कभी किसी राज्य में बीजेपी चुनाव हार भी जाती है, तो भी मोदी रक्षात्मक नहीं होते। वह अगली पहल के लिए खुद को तैयार कर लेते हैं। वह सत्ता प्राप्त कर के भी कभी आराम नहीं करते। शायद वह अपने विरोधियों को उम्मीद की कोई किरण नहीं देना चाहते।

मोदी अपने ही जाल में विपक्ष को फंसाना जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि विरोधियों द्वारा उनकी साधना पर बात करना या कटाक्ष करना भी उनके प्रति मीडिया का ध्यान आकर्षित करने में सहायता प्राप्त करेगा। जो अंततः उनके चुनावी अभियान के लिए बहुत बढ़िया सिद्ध होने वाला है।

लगभग ढाई महीने के सघन चुनावी अभियान में विभिन्न पार्टियों ने अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया, कुछ वर्ग की भावनाओं को चोट पहुंचाने की कोशिश की, कुछ राजनीतिज्ञों ने लोगों को धमकाया भी। उसके बाद भी मतदाताओं ने शांति पूर्वक वोट दिया और अपनी पसंद के उम्मीदवार के चयन की प्रक्रिया पूरी की।

प्रायः चुनाव प्रचार समाप्त होने के बाद राजनीतिक लोग अपने पुराने दिनों की ओर लौट जाते हैं। लेकिन कुछ नेता उसके बाद भी संकेतों और भावों से लोकतंत्र निर्णयकर्ताओं को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। विपक्ष मोदी पर इसी तरह की कोशिश करने का आरोप लगा रहा है और मोदी के हर अभियान को ट्रैक करता है और यही मीडिया के आकर्षण का कारण भी है। कुछ लोग इसे चुनावी कानून का उल्लंघन भी बता रहे हैं। वे मोदी की साधना को इवेंट बता रहे हैं। इसकी तुलना टीवी विज्ञापन से कर रहे हैं।

चुनावी अभियान पर हर पार्टी अपनी रणनीति बनाती है। अब पार्टियों की अपनी चतुराई और योजनाओं पर निर्भर करता है कि वह किस तरह की रणनीति बना रहे हैं। चुनावी सर्वेक्षणों से पता चलता है कि परस्पर विरोधी दलों के बीच कीचड़ उछालने, विरोधियों के बारे में झूठी खबरें या भय फैलाने वाले वाले अभियानों को लोग ज्यादा पसंद नहीं करते।

लेकिन यह भी सत्य है कि भारतीय चुनावों में गंदे खेल की भी खुली छूट मिलती रहती है। प्रायः हम सभ्य तरीकों का उपयोग नहीं करते। राजनीतिक संबद्धता ज्यादा मायने रखती है। नकारात्मकता या लोगों का अपमान करना चुनाव प्रचार का हिस्सा माना जाता है। पीएम जैसे पद के लिए अपमान जनक शब्दों का प्रयोग इस चुनाव में भी खूब हुआ है। वहीं प्रधानमंत्री के भी कुछ शब्दों पर भी मर्यादा की कसौटी कसी गई।

चुनाव में जीत ही अंतिम लक्ष्य है। विपक्ष ने भी चुनाव के अंतिम घंटे तक खुद को खबरों में बनाए रखने की जुगत लगाई है। इंडिया गठबंधन ने चुनाव वाले दिन ही अपनी बैठक बुलाई है। अभी से ही यह दावा भी कर रहे हैं कि उनको 300 से अधिक सीटें आ रही हैं। वे 1 जून को देश में अपनी सरकार बनाने के एजेंडे पर बात करने वाले है, ताकि अंतिम दौर के चुनाव के दिन भी उनका संदेश नीचे कार्यकर्ताओं तक पहुँच सके। यह भी प्रचार का ही एक तरीका होगा। आम मतदाता और अपने लोगों को अंतिम घंटे तक अपने साथ जोड़कर रखना ही तो चुनाव प्रचार का उद्देश्य है।

इसी तरह टीमसी की नेता ममता बनर्जी भी 1 जून को बंगाल में चक्रवात राहत के नाम पर लोगों से जुड़ी रहेंगी। भले ही उन्होंने अपनी दिल्ली यात्रा टाल दी हो, पर चुनावी अभियान को विराम नहीं दिया है।

लेकिन नरेंद्र मोदी की अपनी विशिष्ट शैली है। वह अधिक से अधिक समय तक टेलीविजन के लाइव प्रसारित कार्यक्रमों में बने रहने की कला बाकी लोगों से ज्यादा जानते हैं। वह कभी राम की मूर्ति के सामने नतमस्तक हो जाते हैं और पूरे दिन देश की जनता उन्हें ही देखती रह जाती है, तो कभी किसी निर्माण साइट पर मजदूरों के साथ बात करते, साथ में भोजन करते हुए लाइम लाइट चुरा लेते हैं।

मोदी ने कोशिश की है कि भारत के 140 करोड़ लोगों को अपनी चेतना और राष्ट्र सेवा से लोगों को जोड़े रखें। इसलिए वह हजार साल के बाद की पीढ़ियों के लिए भारत के निर्माण की बात करते हैं। वह स्वयं का सार्वजनिक रूप से शुद्धिकरण अनुष्ठान करते हैं। फर्श पर सोते हैं। केवल नारियल या नीबू पानी के सहारे रहने का व्रत लेते हैं। यही वह रामेश्वरम में भी कर रहे हैं। मोदी के लिए राजनीति का अस्तित्व धर्म से अलग नहीं है। यही उन्हें दुनिया के बाकी राजनीतिज्ञों से अलग भी करता है और शायद लोकप्रिय भी बनाता है।

भारत में चुनाव परिणाम बेहद अप्रत्याशित होते हैं। चुनाव-पूर्व सर्वेक्षणों में यह दिख रहा है कि इस बार भारतीय जनता पार्टी कई जगह फंसी हुईं है। 4 जून को बहुमत का फैसला भी हो जाएगा। लेकिन उसके पहले 1 जून का मतदान ज्यादा महत्वपूर्ण है। मोदी स्वयं इसी दिन के परिणाम के अनुसार आगे भारत का नेतृत्व कर पाएंगे। उनके 10 साल का शासन यदि आगे बढ़ेगा तो हर सीट का अपना महत्व होगा। कोई कुछ भी कहे, मोदी यह सुनिश्चित करना चाहेंगे कि अंतिम वोट भी बीजेपी को मिले।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+