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स्वातंत्र्य, साधुत्व और संन्यास का संगम जगद्गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती

By Shastri Kosalendradas
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स्वातंत्र्य, साधुत्व और संन्यास की त्रिवेणी स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का चले जाना हिंदू धर्म की बड़ी क्षति है। वे दशकों तक सनातन धर्म ध्वजा के वाहक रहे हैं। उनके नहीं रहने से आचार्य परंपरा में जो खालीपन आया है, उसका भरना मुश्किल है। वे देश की आजादी के साक्षी हैं, जिन्होंने आजादी के 75 वर्षों का भारत देखा है। उनके भीतर परतंत्रता की बेचैनी थी और आजादी के बाद बने भारत के प्रति आश्वस्ति भी। वे एक युगद्रष्टा थे, जिन्होंने धर्म, राष्ट्र और राजनीति को नजदीक से देखा है।

passing away of Swami Swaroopanand Saraswati is a loss to Hinduism

देश जब गुलामी की बेड़ियों से जकड़ कर छटपटा रहा था, तब 19 साल का एक संन्यासी 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' का नारा सुनकर देश को आजाद करवाने की लड़ाई में कूद पड़ा। जबलपुर के दिघोरी गांव में पंडित धनपति उपाध्याय और गिरिजा देवी के यहां जन्मे पोथीराम ने 9 साल की छोटी-सी आयु में अपने घर की देहरी ऐसी लांघी कि फिर कभी लौटकर उस देहरी पर चढ़ा ही नहीं। वह बालक जगद्गुरु शंकराचार्य के अद्वैत ज्ञान में ऐसा डूबा कि ब्रह्म, जीव और माया के सिद्धांत ने उसकी अलौकिक मनीषा को अपनी ओर आकर्षित किया। साथ ही, देश की पराधीनता की छटपटाहट उस तेजस्वी संन्यासी के भीतर ज्वाला के समान चमचमा रही थी। 9 साल की उम्र में घर छोड़ने और 19 साल की उम्र में 'क्रांतिकारी साधु' कहलाने वाले द्वारका और शारदा पीठ के आचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने रविवार 11 सितंबर को अपना शरीर त्याग दिया।

9 साल की उम्र में पोथीराम उपाध्याय ने अपना घर छोड़ काशी का आसरा लिया। यहां अद्वैती दीक्षा पाकर वे पोथीराम से स्वामी स्वरूपानंद बने। काशी में उन्होंने ब्रह्मलीन स्वामी श्री करपात्री जी महाराज के सान्निध्य में वेद, वेदांग और वेदान्त दर्शन की शिक्षा हासिल की। इस दौरान एक दशक तक काशी में शास्त्रों के अध्ययन करने के बाद उन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया। दरअसल जब 1942 में देश में अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा बुलंदियों पर था तब स्वरूपानंद सरस्वती देश की आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय स्वरूपानंद सरस्वती को उन दिनों दो बार जेल जाना पड़ा था। पहले वे नौ महीनों तक काशी और बाद में 6 महीनों तक मध्यप्रदेश में कारावास में रहे।

स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती उनके समय के सबसे बड़े संन्यासी और धर्माचार्य स्वामी हरिहरानंद करपात्री महाराज के सर्वाधिक सन्निकट रहे। करपात्री जी महाराज ने राजनीति के शास्त्रीकरण और रामराज्य की भावना के अनुरूप राम राज्य परिषद की स्थापना की थी। स्वरूपानंद सरस्वती उसके अध्यक्ष बने। उन्होंने परिषद की सफलता के लिए देश भर की यात्राएं की। अनेक लोगों को परिषद से जोड़ा और साथ में हिंदू धर्म के विस्तार का कार्य भी करते रहे।

1940 ईस्वी में वे दंडी संन्यासी बने। 1950 में शारदा पीठ शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती से दंड संन्यास की दीक्षा ली। 1981 में उन्हें शंकराचार्य के पद पर प्रतिष्ठित किया गया। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती हिंदू धर्म के सेतु थे। विश्व कल्याण आश्रम का निर्माण उन्होंने आदिवासियों के लिए किया। गोरक्षा आंदोलनों के माध्यम से गो हत्या पर प्रतिबंध लगवाने के लिए उन्होंने कई आंदोलन किए। गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करवाने में उनकी भूमिका असाधारण रही।

स्वरूपानंद सरस्वती ने राम मंदिर के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी थी। वे राम मंदिर निर्माण के लिए बने रामालय ट्रस्ट से जुडे़ रहे। इस ट्रस्ट में शृंगेरी पीठ के शंकराचार्य स्वामी भारती तीर्थ और उडुपी के मध्वाचार्य स्वामी विश्वेश तीर्थ सदस्य थे। रामानंद संप्रदाय की काशी में स्थित प्रधान आचार्य पीठ श्रीमठ के जगद्गुरु रामनरेशाचार्य रामालय ट्रस्ट के अध्यक्ष थे।

यह कम दुख की बात नहीं कि अयोध्या में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों जब राम मंदिर का शिलान्यास हुआ तब इनमें-से एक भी आचार्य उस कार्यक्रम में उपस्थित नहीं थे। हालांकि मध्वाचार्य स्वामी विश्वेश तीर्थ का निधन इस शिलान्यास से पहले हो चुका था। यह राजनीति का अपना समुद्र मंथन है, जिससे निकले विष को पचा पाना किसी महादेव के ही बस की बात हो सकती है।

स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती अपनी बात बेबाकी से रखने के लिए भी जाने जाते थे। साल 2015 में उन्होंने आमिर खान की फिल्म पीके पर सवाल उठाए थे। उन्होंने मांग की थी कि सीबीआई को इस बात की जांच करनी चाहिए कि आखिर इस फिल्म को सर्टिफिकेट कैसे मिल गया जबकि सेंसर बोर्ड के अधिकांश सदस्यों ने मांग की थी कि इसकी समीक्षा होनी चाहिए।

उन्होंने जम्मू कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने की मांग भी की थी। उन्होंने कहा था कि आर्टिकल 370 हटने से घाटी के लोगों को काफी फायदा होगा। उन्होंने यह भी कहा था कि कश्मीर घाटी में हिंदुओं के लौटने से राज्य की देश विरोधी ताकतें कमजोर होंगी। यूनिफॉर्म सिविल लॉ की वकालत करने वाले स्वरूपानंद सरस्वती ने उत्तराखंड में गंगा नदी पर हाइड्रो प्रोजेक्ट्स का विरोध किया था।

अब जब स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती नहीं है तो उन धर्माचार्यों की जिम्मेदारी ज्यादा बढ़ गई है जो हिंदुओं की मूल आचार्य पीठों पर बैठे हैं। निश्चित ही वो सनातन धर्म के ध्वजवाहक थे जिन्हें इस बात का भय कभी नहीं रहा कि उनकी किस बात से क्या विवाद पैदा हो जाएगा। धर्महित में जब जो उचित लगा, उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा।

यह भी पढ़ेंः एलिजाबेथ का निधन और कोहिनूर हीरे की भारत वापसी

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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passing away of Swami Swaroopanand Saraswati is a loss to Hinduism
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