Pakistan Elections: इमरान खान से बल्ला छिना, हुए चुनाव से ‘रन आउट’

इमरान खान के बनने और बिगड़ने की कहानी लगभग दो दशक पहले शुरू हुई, जब 2002 में वह पहला चुनाव लड़े थे। एक समय था जब वह पाकिस्तान के तानाशाह जनरल मुशर्रफ के भी करीबी थे।

क्रिकेटर से प्रधानमंत्री बने इमरान खान फिल्हाल चुनावी मैदान में 12वें खिलाड़ी बन गए हैं। ना तो उनकी पार्टी चुनावी मैदान में उतर सकती है, ना ही उनका चुनाव चिन्ह बल्ला उनके साथ रहा और ना ही उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति ही मिली है। फिलहाल उनके सामने अंधेरा ही अंधेरा है। खुद जेल में हैं और उनकी पार्टी की मान्यता पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने खत्म कर दी है।

इमरान खान किक्रेट के मैदान से राजनीति में छलांग लगाकर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने और फिर राजनीति के हाशिये पर धकेल दिए जाने वाले पहले वे शख्स हैं जिन्होंने खुलकर पाकिस्तान के दो-दो सेना प्रमुखों से लोहा लिया और यह कोशिश की कि परदे के पीछे से सत्ता चलाने वाली फौज सीमा और बैरकों तक सीमित रहे, लेकिन अपने इस प्रयास में ना सिर्फ वह फेल हुए, बल्कि खुद का ही सत्यानाश कर डाला। पाकिस्तान का मुकद्दर लिखते लिखते खुद ही बेचारे बन गए। आज वह 100 से ज्यादा मुकदमों का सामना कर रहे हैं।

Pakistan elections: Imran Khan faces China, runs out from elections

इमरान खान के बनने और बिगड़ने की कहानी लगभग दो दशक पहले शुरू हुई, जब 2002 में वह पहला चुनाव लड़े थे। एक समय था जब वह पाकिस्तान के तानाशाह जनरल मुशर्रफ के भी करीबी थे। नवाज शरीफ का तख्तापलट कर जब मुशर्रफ 2001 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने तो उन्होंने इमरान खान को अपनी केबिनेट का हिस्सा बनाना चाहा। लेकिन तब इमरान ने मना कर दिया।

पाकिस्तान के लिए क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीतने वाले इमरान युवा पीढ़ी के हीरो बन कर उभरे और उस छवि को उन्होंने राजनीति में भुनाने का कोई अवसर जाने नहीं दिया। उन्होंने पाकिस्तान में भ्रष्टाचार और चुनावी बेइमानी का मुद्दा जोर-शोर से उठाया और अवाम को एक नया पाकिस्तान बनाने के लिए उन्हें अवसर देने के लिए कहा।

पाकिस्तान की सेना को भी शरीफ और जरदारी परिवार के बीच सत्ता बंटवारे के बदले किसी नए विकल्प पर विचार करने का ख्याल आया और इमरान के लिए जनरल कियानी के मन में विशेष प्यार जग गया और फिर येन केन प्रकारेण इमरान खान को सत्ता सौंपने का निर्णय सेना ने कर लिया। 2018 में पाकिस्तान में आम चुनाव होना था और उसके पहले इमरान खान के लिए मैदान तैयार करना जरूरी था, लिहाजा सेना और पाकिस्तान की अदालतों ने मिलकर सबसे पहले नवाज शरीफ को ना सिर्फ प्रधानमंत्री पद से हटवाया, बल्कि उन्हें पनामा केस के एक मामले में फंसाकर आजीवन चुनाव लड़ने के अयोग्य भी ठहरा दिया।

सेना की तमाम कोशिशों के बावजूद इमरान खान की पार्टी तहरीक ए इंसाफ को बहुमत नहीं मिला तो स्पेशल प्लेन करके तब के सेना प्रमुख जनरल बाजवा ने अलग अलग जीते पार्टियों के सांसदों को इस्लामाबाद लाकर इमरान खान को समर्थन दिलवाया और आखिर उन्हें प्रधानमंत्री पद पर बिठा ही दिया।

नया पाकिस्तान बनने के बजाय इमरान खान के काल में पाकिस्तान डूबने लगा। एक तरफ एफएटीएफ ने पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में बनाए रखा और दूसरी तरफ कोरोना और अन्य कारणों से अर्थव्यवस्था बैठने लगी। हालात दिवालिएपन की हो गई। जो इमरान खान यह कह कर सत्ता में आए थे कि मर जाएंगे, लेकिन आईएमएफ से कर्ज नहीं लेंगे, उन्हीं इमरान खान ने कर्ज के लिए अपने वित्त मंत्री बदल दिए, स्टेट बैंक आफ पाकिस्तान का प्रमुख बदल दिया और कर्ज की शर्तों को पूरा करने के लिए आवाम को मिलने वाली गैस और बिजली के दाम बेतहाशा बढ़ा दिए। अब सेना का इमरान खान से मोह भंग हो गया था। जनरल बाजवा ने सत्ता की बागडोर अपने हाथ मे ले ली। जाहिर है इमरान खान से टकराव शुरू हुआ और उसके परिणामस्वरूप खान की प्रधानमंत्री के पद से विदाई तय हो गई।

इमरान ने सत्ता में बने रहने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। नेशनल एसेम्बली में अपने खिलाफ आए अविश्वास प्रस्ताव को गैर कानूनी करार करवा दिया। लेकिन जब बात नहीं बनी तो इमरान खान ने जनरल बाजवा के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया। सबसे पहले यह बयान दिलवाया कि अमेरिका की शह पर उनकी सरकार गिरवाई गई है। पाकिस्तान में एक इम्पोर्टेड सरकार बनवाई जा रही है।

इसके लिए उन्होंने अमेरिका से पाकिस्तान दूतावास द्वारा भेजा गया एक साइफर का हवाला दिया। जनता के बीच में कोरे कागज को लहराकर उसे साइफर होने और उसमें उनके खिलाफ साजिश की बात को मुद्दा बनाया। परंतु जब इमरान की कैबिनेट बैठक में साइफर को लेकर कुछ एतराज का ऑडियो सामने आया तो इमरान खान ने उसे अमेरिका के बजाय जरनल बाजवा का षडयंत्र बता दिया।

मार्च 2021 में इमरान को आखिर सत्ता छोड़नी पड़ी और वहीं से उनके दुर्दिन शुरू हो गए। इमरान खान इस समय अडियाला जेल में हैं। उनके खिलाफ तीन बड़े मामले हैं। एक तो साइफर का मामला है, जिस पर अडियाला जेल में ही सुनवाई हो रही है। दूसरे उन पर पाकिस्तान के सरकारी खजाने से सामान चुराकर बेचने का मामला है, जिसे पाकिस्तान में तोशाखाना का केस कहते हैं। इस मामले में ही उन्हें चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराया गया है और तीसरा सबसे बड़ा मामला इस साल 9 मई को पाकिस्तानी सेना के प्रतिष्ठानों पर हमले का है।

तीसरे मामले को सीधे पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर देख रहे हैं और इस मामले में वे इमरान खान और उनके पार्टी के नेताओं को किसी भी सूरत में बख्शने के लिए तैयार नहीं है। इमरान खान की लाख कोशिश है कि जनरल असीम मुनीर से सुलह हो जाए, लेकिन दूर दूर तक इसकी संभावना नजर नहीं आ रही है।

फौज और इमरान की पार्टी के बीच दुश्मनी इतनी बढ़ गई है कि यदि अदालत किसी मामले में इमरान के साथियों को रिहा करने का हुक्म देती है तो दूसरे ही पल किसी और मामले में उनको गिरफ्तार कर लिया जाता है। इमरान खान की कैबिनेट में रहे तमाम नेता या तो इमरान खान को छोड़ चुके हैं या फिर जेल में हैं।

पाकिस्तान में 8 फरवरी को चुनाव होने वाला है। जो भी इमरान की पार्टी की ओर से पर्चा जमा करने जाता है या तो उससे पर्चे छीन लिए जा रहे हैं, या फिर उम्मीदवारों को गिरफ्तार कर लिया जा रहा है। पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने 22 दिसंबर को देर शाम तहरीक ए इंसाफ के आंतरिक चुनाव में गड़बड़ी का आरोप लगाकर पार्टी का वजूद समाप्त कर दिया है।

ऐसे में अब इमरान खान के पास ना पार्टी रही और ना चुनाव चिन्ह। स्थिति कमोबेश 2018 वाली हो गई है। बस किरदार बदल गए हैं। तब नवाज शरीफ को चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराकर इमरान खान को जितवाया गया था और अब इमरान खान को जेल में डालकर और अयोग्य ठहराकर नवाज शरीफ के लिए रास्ता आसान किया जा रहा है। अब इमरान की आखिरी उम्मीद अदालत से है, देखना यह है कि पाकिस्तान में कभी सबसे लोकप्रिय व्यक्ति रहे इमरान का अब क्या हश्र होता है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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