Economic Crisis in Pakistan: क्या पाकिस्तान की कंगाली के लिए इस्लामीकरण जिम्मेवार है?
इस समय पाकिस्तान से कंगाली की ऐसी खबरें आ रही हैं कि आम मुसलमान के लिए दो वक्त की रोटी खाना मुश्किल हो गया है। पाकिस्तानी रूपया रिकार्ड स्तर पर टूट गया है और वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं।

Economic Crisis in Pakistan: मस्जिद की मीनार पर चढ़कर अजान देने वाला मुअज्जिम जब अजान देता है तो चिल्लाकर कहता है कि "हय्या अलफलाह।" अरबी के इस फलाह का अर्थ होता है कि 'अपनी समृद्धि के लिए आओ और नमाज पढो'। मतलब, इस्लाम मुसलमानों को इस बात की गारंटी देता है कि अगर तुम नमाज पढ़ोगे तो तुम्हारे पास समृद्धि आयेगी।
इस्लाम के नाम पर भारत को तीन टुकड़े में तोड़कर बने पाकिस्तान ने अपने बनने के बाद सबसे ज्यादा इस्लाम के सही पालन पर ही जोर दिया। 75 सालों में जहां भारत ने अपनी अलग अलग प्राथमिकताएं तय की और उन्हें प्राप्त किया वहीं पाकिस्तान ने सिर्फ एक प्राथमिकता तय की। वह थी, सही और सच्चे अर्थों में इस्लाम को पाकिस्तान में लागू किया जाए। जिन्ना को पाकिस्तान बनाने की प्रेरणा देने वाले अल्लामा इकबाल ने मरने से पहले जिन्ना को बहुत साफ शब्दों में समझाया था कि सिर्फ इस्लामिक सिद्धांतों से ही मुसलमानों को आर्थिक रूप से समृद्ध बनाया जा सकता है।
1937 में जिन्ना को लिखी चिट्ठी में इकबाल ने जोर देकर समझाया था कि नेहरु का समाजवाद तो हिन्दुओं का ही भला नहीं कर सकता। इसलिए मुसलमानों की आर्थिक समृद्धि के लिए तुम्हें (जिन्ना को) पाकिस्तान बनाने से पीछे नहीं हटना है। पाकिस्तान बनने से पहले ही इकबाल मर गये। पाकिस्तान बनते ही जिन्ना भी मर गये। लेकिन पाकिस्तान को समृद्ध बनाने का इस्लामिक उद्देश्य अभी भी अधूरा ही था।
1947 में जब पाकिस्तान बना था तब भारत और पाकिस्तान दोनों को लगभग शून्य से शुरुआत करनी थी। बंटवारे में उसकी जनसंख्या के अनुपात में पाकिस्तान को अपना औद्योगिक हिस्सा मिला था। शुरुआत में हिन्दुओं से अलग होने का जो जोश और जूनून था वह साठ के दशक तक बना रहा। साठ के दशक में पाकिस्तान की विकास दर 6.8 प्रतिशत रही। लेकिन अस्सी के दशक में जिया उल हक के आने के साथ ही विकास दर गिरनी शुरु हो गयी।
जिया उल हक ही वह पहले तानाशाह थे जिन्होंने पाकिस्तान की हर व्यवस्था को इस्लामिक तौर तरीकों से गढ़ना शुरु किया। आप कह सकते हैं कि जिया उल हक ने पहली बार हैय्या अलफलाह की अजान के जरिए पाकिस्तान की समृद्धि को सुनिश्चित किया। अल्लामा इकबाल ने जिन्ना को जिस इस्लामिक आर्थिक समृद्धि का स्वप्न दिखाया था उसे पूरा करने का काम सही मायने में जिया उल हक ने ही शुरु किया। उन्होंने जो कानूनी और सामाजिक सुधार किये, उसने पाकिस्तानी अर्थव्यस्था को भी हलाल और हराम में बांट दिया।
जिया उल हक के समय और उसके बाद पाकिस्तान में सामान्य स्कूली शिक्षा से ज्यादा जरूरी मदरसा और दीनी तालिमात हो गये। पाकिस्तान बनने के बाद से ही मुल्ला मौलवी बिरादरी पाकिस्तान को जिस तरह से अपने कब्जे में लेना चाहती थी, उसकी शुरुआत जिया उल हक के जमाने से ही हुई। उसके बाद तो जैसे पूरा पाकिस्तान मुस्लिम बनाम गैर मुस्लिम तथा हराम बनाम हलाल में बंटता चला गया।
आज अगर पाकिस्तान में औद्योगीकरण नदारद है, कृृषि उपज नकारात्मक है और सेवाओं का अभाव है तो उसका सिर्फ एक कारण है और वह है पाकिस्तान का इस्लामीकरण। जिया उल हक के बाद बेनजीर भुट्टो, शरीफ परिवार और फौजी शासकों ने भी उदार अर्थव्यवस्था बनाने का प्रयास किया। 1995 में वो विश्व व्यापार संगठन में भी शामिल हुए लेकिन पाकिस्तान इस्लामीकरण की ऐसी राह पर आगे बढ़ चुका था जहां इन उपायों का भी कोई महत्व नहीं रह गया था।
जिया उल हक के जमाने में आईएसआई के चीफ रहे हामिद गुल ने मरने से कुछ समय पहले तक एक मुहिम चला रखी थी कि पाकिस्तान को प्योर इस्लामिक स्टेट में कैसे बदला जाए। इसके लिए उन्होंने मुल्ला मौलवियों का एक जमावड़ा भी इकट्ठा किया था और उनको समझाया था कि अगर पाकिस्तान भारत पर हमला करके बंगलौर और बॉम्बे को तबाह कर दे तो उसकी आर्थिक स्थिति अपने आप भारत से बेहतर हो जाएगी। जिया उल हक और हामिद गुल ने इस्लामीकरण की जो राजनीतिक मुहिम शुरु की थी उसका असर अब पाकिस्तान के जनजीवन और अर्थव्यवस्था पर दिख रहा है।
आज पाकिस्तान का रूपया एक डॉलर के मुकाबले 228 रूपये में बिक रहा है। वह भारत जिसकी आर्थिक राजधानी मुंबई पर हमला करके पाकिस्तान ने हामिद गुल की इच्छा को पूरा करने का प्रयास किया था, उसके मुकाबले पाकिस्तानी रूपया आधा भी नहीं बैठता। आज एक भारतीय रूपया पाकिस्तानी रुपये के 2 रूपये अस्सी पैसे के बराबर हैसियत रखता है। पाकिस्तान का फॉरेक्स रिजर्व घटकर 5 अरब डॉलर पहुंच गया है। यानि उनकी आर्थिक हैसियत इतनी भी नहीं बची कि महीने भर आयात निर्यात के बिल को क्लीयर कर सके।
पाकिस्तानी रूपये के कमजोर होने का सीधा असर वहां की खान पान की वस्तुओं की कीमतों पर हुआ है। आटा 150 रूपये किलो तो चावल 320 रूपये प्रति किलो से ऊपर है। लगातार टूटता पाकिस्तानी रूपया न केवल विश्व में पहले से अविश्वयनीय पाकिस्तान की हैसियत को और अधिक कमजोर कर रहा है बल्कि पाकिस्तान के भीतर असंतोष को बढ़ावा भी दे रहा है।
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पाकिस्तान की यह हालत न होती, अगर वह सच्चे इस्लाम की तलाश में भटक न गया होता। उसकी इस्लामियत उसकी बर्बादी का कारण बन गई है जिससे निजात पाना फिलहाल पाकिस्तान के लिए संभव नहीं है। आने वाले समय में पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति और खराब होगी। इसे ठीक करने के लिए अरब मुल्कों की तरह पाकिस्तान को भी सच्चे इस्लाम को धक्का मारकर पिछली सीट पर बिठाना होगा। लेकिन पाकिस्तान में यह करने की हिम्मत किसमें है? पाकिस्तान में कौन है जो कमाल अतातुर्क बनेगा, अभी तो वहां सबके मन में एर्तगुल गाजी बनने की तमन्ना पल रही है।
यह भी पढ़ें: Protests in Gilgit Baltistan: गिलगित-बाल्टिस्तान में पाकिस्तान के खिलाफ क्यों बढ़ रहा गुस्सा?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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