OPS vs NPS: फिर उठी पुरानी पेंशन स्कीम की मांग

OPS vs NPS: विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं और आसन्न लोकसभा चुनाव को देखते हुए पुरानी पेंशन योजना बहाल करने की मांग फिर से जोर पकड़ रही है। रविवार को दिल्ली के रामलीला मैदान में भारी संख्या में जुटे सरकारी कर्मचारियों ने एक स्वर से सवाल उठाया कि अर्थशास्त्र का ऐसा कौन सा सिद्धांत है जिसमें नेताओं को पेंशन देने से देश प्रगति करता है और कर्मचारियों की पेंशन से देश को घाटा हो जाता है? यह भी कहा गया कि जब देश गरीब था, उस समय भी कर्मचारियों को पेंशन दी जा रही थी। आज जब भारत दुनिया का पांचवा आर्थिक महाशक्ति बन चुका है तो पेंशन क्यों बंद की जा रही है?

मालूम हो कि वित्तीय सुधार एवं वित्तीय सुशासन को मूर्त रूप देने के लिए वर्ष 1999 में ओएएसआईएस की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी। कहा गया था कि केंद्र और राज्य सरकारों को अनावश्यक खर्चों में कटौती करने की जरूरत है ताकि खर्च और कमाई के बीच संतुलन बनाकर रखा जा सके। इस रिपोर्ट को आधार बनाकर वित्त वर्ष 2003 के बजट भाषण में तत्कालीन वित्त मंत्री ने केंद्रीय कर्मचारियों के लिए ओपीएस की जगह एनपीएस का प्रारूप पेश किया था, जिसे 2004 में एनडीए शासन काल के दौरान लागू किया गया। यूपीए के सत्ता में आने के बाद कर्मचारियों ने पुरानी पेंशन व्यवस्था बहाल करने की मांग की, तब कांग्रेसनीत यूपीए सरकार ने इसे खारिज कर दिया।

OPS vs NPS: Demand for old pension scheme arises again in delhi

यूपीए सरकार में योजना आयोग के अध्यक्ष रहे मोंटेक सिंह अहलूवालिया जैसे अर्थशास्त्री उन दिनों सभी राजनीतिक दलों और राज्यों के सत्ताधारी पार्टियों को सीख दे रहे थे कि वह सभी व्यवस्था को ऐसे कदम उठाने से रोके। अहलूवालिया ने तो ओपीएस को सबसे बड़ी रेवड़ी तक करार दे दिया था। अब जब कांग्रेस विपक्ष में है तो इसे चुनावी मुद्दे के रूप में विभिन्न राज्यों में उछाल रही है और जहां उसे सफलता मिली वहां ओपीएस को बहाल भी कर दिया। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और हिमाचल प्रदेश सहित झारखंड और पंजाब में पुरानी पेंशन योजना लागू है। पूरी संभावना है कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल आगामी चुनावी राज्यों और लोकसभा चुनाव में भी पुरानी पेंशन योजना का मुद्दा जोर-जोर से उठाएंगे।

दरअसल भाजपा ने लाभार्थी नामक जो एक पक्का वोट बैंक तैयार किया है, उससे सभी डरे हुए हैं, और उसकी काट के लिए कांग्रेस रास्ता तलाश रही है। यूपीए शासनकाल में पुरानी पेंशन योजना को रेवड़ी बताने वाली कांग्रेस अब सरकारी कर्मचारियों को वोट बैंक के रूप में देख रही है।

पुरानी पेंशन योजना के तहत सेवा निवृत कर्मचारियों को मासिक पेंशन के रूप में उनके अंतिम आहरित वेतन का 50% और महंगाई भत्ता दिया जाता है, जबकि नई पेंशन योजना के तहत कर्मचारियों को हर महीने अपने वेतन का 14% अंशदान करना होता है, उसी अनुपात में सरकार भी अंशदान करती है, जो पूंजी बाजार में निवेश होता है। इसी पूंजी निवेश की कमाई सेवानिवृत्ति के बाद कर्मचारियों को पेंशन के रूप में दी जाती है। एनपीएस ट्रस्ट के अनुसार दिसंबर 2022 तक राज्य सरकार के 59.78 लाख कर्मचारी नई पेंशन योजना अपना चुके थे और इसकी कुल परिसंपत्ति 4.7 लाख करोड़ रुपए थी। तत्कालीन सरकार ने वित्त वर्ष 2003 के बजट में एनपीएस लागू करने की घोषणा की थी, बावजूद इसके इसे अपनाना या नहीं अपनाना राज्यों की मर्जी पर छोड़ दिया था।

केंद्र सरकार की तरफ से इस मामले में कोई जबरदस्ती नहीं की गई थी। फिर भी 2005 तक 27 राज्यों ने नई पेंशन योजना अपना ली थी। हालांकि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल ने इस योजना को अभी तक लागू नहीं किया है। वर्ष 1998 से पहले अधिकांश प्रदेशों में पुरानी पेंशन योजना प्रचलित थी, लेकिन सरकारों की बढ़ती देनदारी और आबादी की औसत आयु में बढ़ोतरी के कारण सरकारों को पुरानी पेंशन योजना को अपने यहां ज्यादा समय तक चलाने में मुश्किलें आने लगी और अर्थशास्त्री सलाह देने लगे कि इसे बंद करके कोई दूसरी योजना लागू की जाए ताकि सरकार वित्तीय रूप से अनुशासित रह सके। विश्व बैंक ने भी अपनी एक रिपोर्ट में पुरानी पेंशन योजना को ज्यादा खर्चीला बताते हुए कहा कि आबादी के बढ़ने के साथ ही सरकार की देनदारी में भी अकूत बढ़ोतरी होगी।

एक अनुमान के मुताबिक 2050 तक भारत की आबादी 164 करोड़ होगी और इनमें से 60 साल वाले लोगों की संख्या 32 करोड़ होगी। बुजुर्गों की बड़ी संख्या होने की वजह से पुरानी पेंशन योजना पर सरकार को बहुत ज्यादा पैसा खर्च करना होगा। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार वित्त वर्ष 2022-23 के बजट अनुमानों के मुताबिक राज्यों का पेंशन वर्ष 22-23 में 16% की वृद्धि के साथ 4 लाख 63 हजार 436 करोड़ रुपए हो जाएगा, जबकि पिछले वर्ष यह 3 लाख 99 हजार 813 करोड़ रुपए था।

ब्याज, वेतन और पेंशन भुगतान को प्रतिबद्ध व्यय माना जाता है, क्योंकि इन मदों में हर महीने खर्च होना निश्चित है। इन मदों में वित्त वर्ष 2021 तक औसतन 56 प्रतिशत व्यय राज्यों के राजस्व से किया जा रहा था, लेकिन इस वर्ष में राज्यों की औसत राजस्व प्राप्ति 100% थी जबकि व्यय 125 प्रतिशत। पंजाब राज्य का खर्च कमाई की तुलना में 80% अधिक था जबकि केरल तथा पश्चिम बंगाल का खर्च उसकी कमाई से 74% और आंध्र प्रदेश का खर्च उसकी कमाई से 72% अधिक था।

इसमें कोई दो राय नहीं कि पुरानी पेंशन योजना अपनाने से राज्यों पर भारी आर्थिक बोझ बढ़ जाएगा और उन्हें अपना खर्च चलाने के लिए ज्यादा कर्ज लेना पड़ेगा। भारत में आबादी की औसत आयु बढ़ने के कारण ओपीएस पर होने वाले भारी भरकम खर्चे से पीछा छुड़ाने के लिए केंद्र तथा राज्य की सरकारों ने नई पेंशन योजना का विकल्प पसंद किया है। लेकिन हमें यहां ठहर कर सोचना ही होगा कि भारत में आर्थिक सामाजिक ढांचा पश्चिमी देशों से बिल्कुल अलग है। भारतीय समाज के करोड़ों निम्न और मध्यवर्गी लोगों के पास जमीन और व्यवसाय की कोई खास संभावनाएं नहीं होती और न ही उनके पास कोई जमा पूंजी होती है। लिहाजा वे अपनी संतान को पढ़ा लिखा कर सरकारी नौकरी दिलवाना चाहते हैं।

सरकारी नौकरियों से देश के तमाम गरीब परिवारों के जीवन बदले हैं और वह अपनी भावी पीढ़ी के लिए भी आस्वस्त हुए हैं कि उन्हें गुरबत के उस दौर में नहीं लौटना पड़ेगा, जहां कड़ी मेहनत और शोषण से बेहाल रहना पड़ता था। वहीं दूसरी तरफ वरीय नागरिकों को परिवार और समाज के लिए बोझ माना जाता है और अमूमन उनके साथ उनके बच्चे अच्छा व्यवहार नहीं करते। कई लोगों को ओल्ड एज होम में रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है। उम्र बढ़ने पर इंसान शारीरिक रूप से कमजोर हो जाता है और कई तरह की बीमारियों के गिरफ्त में होता है। ऐसे में उसे पैसों की ज्यादा जरूरत होती है।

देश का संविधान भारत को एक कल्याणकारी राज्य के रूप में प्रस्तुत करता है। अस्तु, बुजुर्गों के लिए बेहतर सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना सरकार का कर्तव्य है। लेकिन विडंबना है कि भारत में बुजुर्गों को सामाजिक सुरक्षा तभी मिलती है, जब वे सरकारी नौकरी में होते हैं। बाकी करोड़ों बुजुर्ग बिना किसी पेंशन या सुविधा के अपना बुढ़ापा जैसे तैसे काटते हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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