Opposition Parties: मणिपुर से मुम्बई के बीच बिहार, बंगाल और अयोध्या की राजनीति
राहुल गांधी की न्याय यात्रा मणिपुर से चल पड़ी है। मुम्बई तक पहुंचेगी। लेकिन राहुल गांधी के मणिपुर से रवाना होते ही मुम्बई में धमाका हो गया। मिलिंद देवड़ा का कांग्रेस छोड़ना, उसी दिन हुआ जिस दिन राहुल गांधी ने भारत जोड़ो न्याय यात्रा शुरू की। कांग्रेस इससे इतनी जल भुन गई कि जयराम रमेश ने इसका ठीकरा नरेंद्र मोदी के सिर फोड़ दिया। उन्होंने कहा कि मिलिंद देवड़ा के कांग्रेस छोड़ने की टाईमिंग नरेंद्र मोदी ने तय की है।
वैसे इस बयान का कोई लोजिक नहीं है। मिलिंद देवड़ा की कांग्रेस छोड़ने की टाईमिंग मोदी ने तय की होती, तो वह भाजपा में जाते, शिवसेना में क्यों गए। मिलिंद देवड़ा कांग्रेस की दूध देने वाली गाय थी। उनका कांग्रेस छोड़ना कोई छोटी मोटी घटना नहीं है। उन्होंने कांग्रेस छोड़कर कांग्रेस की रीढ़ पर हथौड़ा मारा है।

1991 में जब उदारीकरण की शुरुआत हुई, तब से पहले उनके पिता मुरली देवड़ा और बाद में मिलिंद कांग्रेस और कॉरपोरेट घरानों के बीच कड़ी का काम कर रहे थे। कांग्रेस सरकारों के समय कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुँचाने वाली नीतियों के बदले चंदा उगाहने की भूमिका इन दोनों के पास थी। उनके पिता मुरली देवड़ा इसीलिए 22 साल तक मुम्बई प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। मिलिंद देवड़ा भाजपा के साथ गठबंधन वाली शिव सेना में शामिल हुए है, जिसे हाल ही में असली शिवसेना का प्रमाण पत्र मिला है। यह संयोग ही है कि उनके पिता मुरली देवड़ा 1980 में शिवसेना की मदद से ही मुम्बई के मेयर बने थे।
मिलिंद देवड़ा के कांग्रेस छोड़ने की भूमिका डेढ़ साल पहले ही तय हो गई थी। 2019 में वह लोकसभा चुनाव हार गए थे। मिलिंद देवड़ा की कांग्रेस को कितनी जरूरत थी, इसका अंदाज इस से लगाया जा सकता है कि उन्हें ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी का सह कोषाध्यक्ष बनाया गया था। इसके बावजूद कांग्रेस ने जून 2022 में उनकी उपेक्षा करके उत्तर प्रदेश के इमरान प्रतापगढ़ी को महाराष्ट्र से राज्यसभा में भेज दिया था।

अब जब वह दक्षिण मुम्बई की अपनी पुरानी सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे, तो कांग्रेस ने वह सीट समझौते में उद्धव ठाकरे की शिवसेना को देने का फैसला कर लिया। मिलिंद देवड़ा का कांग्रेस छोड़ना ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, आरपीएनसिंह और सुष्मिता देव जैसा ही महत्वपूर्ण है। ये पाँचों कांग्रेस की नई पीढी के नेता थे। हमउम्र होने के कारण राहुल गांधी की कोटरी के सदस्य थे।
इनमें से चार मनमोहन सरकार में मंत्री थे, सुष्मिता देव महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष थी। पाँचों अपने पिता की विरासत से कांग्रेस में आए थे। यानी पाँचों का कांग्रेस से दो तीन पीढ़ियों का रिश्ता था। पहले इस कोटरी की वजह से कई सीनियर कुंठित हो कर कांग्रेस छोड़ गए थे। अब उस कोटरी में से सिर्फ सचिन पायलट ही कांग्रेस में बचे हैं।
राहुल गांधी की यात्रा का श्रीगणेश अपशकुन से हो गया है। इस मौके पर दो नेताओं के बयान बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि जिसे जाना है, जाओ, कांग्रेस को कोई फर्क नहीं पड़ता। उधर मल्लिकार्जुन खड़गे ने नरेंद्र मोदी के लिए "राम नाम सत्य" बोल दिया। इन दोनों बयानों में 2024 की पटकथा लिखी जाएगी।
राहुल गांधी ने ऐसे मौके पर न्याय यात्रा शुरू की है, जब श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा हो रही है। देश के अस्सी फीसदी हिन्दुओं के लिए यह अवसर अति महत्वपूर्ण है, जिसे उन्होंने पांच सौ साल के जमीनी और अदालती संघर्षों के बाद हासिल किया है। पहले रामजन्मभूमि मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा का बायकाट और उसके बाद प्राण प्रतिष्ठा का प्रभाव कम करने के लिए राहुल गांधी की यह यात्रा।
22 जनवरी को जिस दिन प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम हो रहा होगा, उस दिन राहुल गांधी असम में होंगे। असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा भी राहुल गांधी से खफा हो कर कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गए थे। हेमंत बिस्व सरमा की नई हिंदूवादी छवि ने असम में करिश्मा किया है। 35 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले इस प्रदेश में भाजपा का जीतना करिश्मे से कम नहीं। असम में कांग्रेस अभी भी मुस्लिम भरोसे बैठी है। इसलिए राहुल गांधी की असम यात्रा बहुत ही संवेदनशीलता का मामला है। उनकी यात्रा के दौरान हिन्दू मुस्लिम दंगों की आशंका बनी हुई है। उद्धव ठाकरे पहले ही कह चुके हैं कि 22 जनवरी को प्राण प्रतिष्ठा के बाद दंगे हो सकते हैं।
राहुल गांधी की बंगाल यात्रा से ममता बनर्जी बेहद कुपित हैं, क्योंकि वह मुस्लिम प्रभाव वाले क्षेत्रों से गुजरेंगे। ममता बनर्जी ने इंडी एलायंस की 13 जनवरी की वर्च्युल बैठक में न तो खुद हिस्सा लिया, न अपने किसी महासचिव को मीटिंग में हिस्सा लेने का निर्देश दिया। हालात ऐसे बन रहे हैं कि संभवत बंगाल में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस में गठबंधन नहीं होगा। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने ममता बनर्जी पर हमले तेज कर दिए हैं।
ममता बनर्जी समझती हैं कि राहुल गांधी उनके प्रभाव वाली सीटों में सेंध मारने आ रहे हैं। बंगाल के बाद राहुल जब यूपी बिहार में आएँगे, तो ये दोनों राज्य राममय हो चुके होंगे। इन दोनों राज्यों में राहुल गांधी की यात्रा का मार्ग भी अति संवेदनशील है। वह मुस्लिम प्रभाव वाले इलाकों से गुजरेंगे, तो उतेजना हो सकती है।
कांग्रेस लालू यादव और नीतीश कुमार से बिहार में दस से बारह सीटें मांग रही है। लालू यादव 4-5 से ज्यादा देने की स्थिति में नहीं है। 2019 में जब जेडीयू गठबंधन में नहीं थी, तब लालू यादव ने कांग्रेस को 9 सीटें लड़ने को दी थी, लेकिन कांग्रेस मुस्लिम बहुल किशनगंज ही जीत पाई थी। जबकि लालू यादव की आरजेडी तो एक सीट भी नहीं जीत पाई थी।
इसलिए नीतीश कुमार इंडी गठबंधन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। उनके बिना लालू और राहुल दोनों ही जीरो हैं। लेकिन नीतीश कुमार नाराज हुए बैठे हैं। भले ही सार्वजनिक तौर पर एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी नहीं हो रही, लेकिन एक दूसरे पर तंज कसने वाली भाषा का इस्तेमाल हो रहा है।
13 जनवरी की मीटिंग में जब राहुल गांधी ने संयोजक पद के लिए नीतीश कुमार का नाम प्रस्तावित किया, तो उन्होंने प्रस्ताव ठुकराते हुए कहा कि लालू प्रसाद यादव को संयोजक बना दीजिए। अब सब जानते हैं कि चारा घोटाले में सजायाफ्ता और जॉब फॉर लैंड घोटाले में चार्जशीट लालू यादव को संयोजक बना कर इंडी एलायंस अपना राम नाम सत्य नहीं करना चाहेगा। इसलिए जैसे ही नीतीश कुमार ने लालू यादव का नाम लिया, मीटिंग में सन्नाटा छा गया।
नीतीश कुमार और लालू यादव में शीत युद्ध शुरू हो गया है। नीतीश कुमार इशारों इशारों में अभी भी राजग के प्रति झुकाव के संकेत दे रहे हैं। कांग्रेस की तरह उन्होंने प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के बायकाट का एलान नहीं किया है। चर्चा है कि वह संजय झा, विजय चौधरी या अशोक चौधरी को अपना दूत बनाकर भेज सकते हैं।
दूसरा प्रमाण यह है कि सोमवार को जब नीतीश कुमार ने एक लाख शिक्षकों की भर्ती के अप्वाइंटमेंट लेटर दिए तो होर्डिंग में तेजस्वी का फोटो हटा दिया गया। जबकि 15 लाख नौकरियों का वादा करने वाले तेजस्वी यादव नौकरियों का श्रेय ले रहे हैं। मंच पर भाषण देते हुए नीतीश कुमार के मंत्री विजय चौधरी ने कहा कि पिछली सरकार (एनडीए सरकार) में जब वह शिक्षा मंत्री थे, तभी इन नौकरियों की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। जबकि इन नियुक्ति पत्रों के वितरण के बाद आरजेडी ने एक प्रेस कांफ्रेंस की। जिसमें श्रेय लेते हुए कहा गया कि पिछले पन्द्रह महीने की गठबंधन सरकार बिहार का स्वर्णिम काल है।
इसका मतलब यह हुआ कि इससे पहले जब नीतीश कुमार की एनडीए सरकार थी, तब स्वर्णिम काल नहीं था। जबकि सुशासन बाबू के रूप में मशहूर हुए नीतीश के 2005 से 2015 के कार्यकाल को बिहार का स्वर्णिम युग कहा जाता है। इस तरह जेडीयू और आरजेडी में एक दूसरे पर हावी होने की होड़ लगी हुई है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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