Opposition Meeting: नीतीश की नाव पर आखिरकार सवार हुई कांग्रेस
Opposition Meeting: नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद से हटाने के लिये महागठबंधन बनाने को व्याकुल बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहला पड़ाव सफलतापूर्वक पार करते दिख रहे हैं। नीतीश कुमार की पहल पर भाजपा विरोधी दलों की 23 जून को पटना में होने वाली बैठक में कांग्रेस समेत कई राज्य के क्षत्रपों के शामिल होने की संभावना हैं। बीते कुछ महीनों से कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के नेतृत्व में बनने वाले गठबंधन से दूरी बनाकर रखे हुए थी, लेकिन नीतीश कुमार की जोरदार पहल के बाद कांग्रेस भी इस बैठक में शामिल होने को तैयार हो गई है। विपक्षी एकता का संदेश देने वाली इस बैठक में कांग्रेस के शामिल होने से निश्चित ही भाजपा की परेशानी बढ़ेगी।
पटना बैठक में जदयू, राजद के अलावा कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी, झारखंड मुक्ति मोर्चा, शिवसेना उद्धव गुट, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, डीएमके, सीपीआई, सीपीएम, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी और सीपीआई (एम) के शामिल होने की संभावना है। नीतीश कुमार की कोशिशों के बीच कांग्रेस द्वारा दूरी बनाये रखने से गठबंधन के मजबूत होने की संभावना न्यूनतम मानी जा रही थी। अब जब कांग्रेस ने भी इस बैठक में शामिल होने की हामी भर दी है, तब निश्चित रूप से भाजपा को अब नई रणनीति पर विचार करना होगा।

हालांकि विपक्ष के लिये दिल्ली अभी दूर है, क्योंकि गठबंधन की राह में कई रोड़े हैं, जिनसे बैठक में शामिल होने वाले सभी दलों को पार पाना होगा। पटना की बैठक में भाग लेने वाले कई क्षेत्रीय दलों की राजनीति भाजपा के साथ कांग्रेस विरोध पर भी टिकी हुई है। इस स्थिति में सहजता से गठबंधन बन पाना संभव नहीं है। मोदी विरोध के नाम पर सभी विपक्षी दल भले ही एक मंच पर आने को तैयार तो हो गये हैं, लेकिन उन्हें अपनी राजनीति भी संभालनी है। पहली मीटिंग में गठबंधन की कोई रूपरेखा तय होगी इसकी संभावना बहुत कम है। नीतीश कुमार की पहली कोशिश है कि इस बैठक के जरिए जनता को संदेश दिया जाये कि विपक्षी दल एकमत हैं और उनमें एकता है।
ऐसा कहा जा रहा है कि बैठक में शामिल होने वाले समस्त दल एकता दिखाने के लिये आपसी टकराव वाले मुद्दों पर बातचीत से परहेज बरतेंगे। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हों या फिर दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल, दोनों की राजनीति भाजपा के साथ कांग्रेस विरोध पर टिकी हुई है। हाल ही में ममता बनर्जी ने कांग्रेस के खिलाफ बयान दिया है, वहीं दिल्ली सरकार के अधिकारों पर अध्यादेश लाने के बाद अरविंद केजरीवाल मोदी सरकार पर हमलावर हैं, जबकि कांग्रेस इस मुद्दे पर केजरीवाल का समर्थन नहीं कर रही है। माना जा रहा है कि ऐसे तमाम मुद्दों पर इस बैठक में बातचीत या चर्चा नहीं होगी। इस बैठक में चर्चा केवल मोदी सरकार को हटाने तथा गठबंधन के संभावित स्वरूप को लेकर होगी।
नीतीश कुमार की बैठक में शामिल होने वाले दलों की प्राथमिकता भाजपा सरकार को यह संदेश देना है कि समूचा विपक्ष उसकी तानाशाही के खिलाफ एकजुट है। 23 जून को कांग्रेस से राहुल गांधी एवं मल्लिकार्जुन खड़गे के पटना पहुंचने की संभावना है। राहुल की मौजूदगी सुनिश्चित करने के लिए ही 12 जून की बैठक को टालकर 23 जून किया गया है। इनके अलावा पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी, तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन, झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन, दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल, यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे, एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार, जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला एवं महबूबा मुफ्ती, वामदलों से डी राजा, सीताराम येचुरी तथा दीपांकर भट्टाचार्य भी बैठक में सम्मिलित होंगे।
नीतीश कुमार ने उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी तथा बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती को भी बैठक में शामिल होने का निमंत्रण दिया था, लेकिन चारों नेताओं ने इससे किनारा कर लिया। नवीन पटनायक के बैठक में शामिल ना होने के चलते कुछ दल उनकी आलोचना शुरू कर चुके हैं, जबकि केसीआर एवं जगन मोहन रेड्डी को लेकर ये दल उतने हमलावर नहीं हैं। माना जा रहा है कि भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए ही केसीआर एवं जगन मोहन की आलोचना से परहेज किया जा रहा है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में होने वाली इस बैठक पर भाजपा भी अपनी नजर बनाये हुए है। बैठक सफल रही तो फिर भाजपा के सामने बड़ी चुनौती होगी।
माना जा रहा हैं कि पहली ही बैठक में गठबंधन का कोई खाका तैयार नहीं होगा, लेकिन आगे के लिए राह जरूर खुल जायेगी। आगामी लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को हराने के लिये नीतीश इतने व्यग्र हैं कि उनकी कोशिश है कि भाजपा के सामने हर सीट पर विपक्ष का केवल एक उम्मीदवार खड़ा किया जाए। विपक्षी दलों का मजबूत गठबंधन तैयार करने के लिये उन्हें पीएम पद की दावेदारी से भी अपने पैर पीछे खींच लिये हैं, पर सबसे बड़ा सवाल नेतृत्व करने को लेकर है। कौन इस गठबंधन का नेतृत्व करेगा यह अभी तक स्पष्ट नहीं है। अगर यह मान लिया जाए कि जदयू, राजद, झामुमो जैसे कुछ दल कांग्रेस के नेतृत्व में लड़ने को तैयार होंगे, परंतु क्या समस्त विपक्षी दल कांग्रेस के नेतृत्व में आने को तैयार होंगे? विशेषकर तृणमूल कांग्रेस, पीडीपी एवं आम आदमी पार्टी, जिनकी राजनीति ही कांग्रेस के विरोध पर टिकी है?
भविष्य में कांग्रेस की कश्ती में कौन सवार होता है और कौन नहीं ये तो आनेवाले महीनों में पता चलेगा लेकिन फिलहाल तो कांग्रेस खुद नीतीश की कश्ती में सवार हो गयी है। 23 जून को होनेवाली पटना वाली बैठक की यही सबसे बड़ी उपलब्धि भी कही जाएगी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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