Opposition: नीतीश को किनारे कर कांग्रेस ने संभाल ली कमान
Opposition: विपक्षी दलों का गठबंधन इस आधार पर बना था कि कोई बड़ा भाई नहीं होगा, कोई छोटा भाई नहीं होगा| बराबरी के आधार पर गठबंधन बनाने की बात हुई थी|

जो जिस राज्य में भारी होगा, वहां की सीट बंटवारे की कमान वही संभालेगा| कांग्रेस के पी. चिदंबरम ने यह एलान सार्वजनिक तौर पर किया था कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के प्रभाव वाले राज्यों में उनका नेतृत्व स्वीकार करने को तैयार है|
कांग्रेस के बदले हुए इस रवैये से साफ़ हो गया था कि लगातार दो बार 50-52 सीटों पर अटकने के बाद उसे अपनी हैसियत का अहसास हो गया है| नीतीश कुमार शुरू से कहते रहे थे कि भाजपा को हराना है, तो कांग्रेस को साथ लिए बिना कोई गठबंधन नहीं बन सकता| कांग्रेस के जमीन पर उतरने से नीतीश कुमार को उन क्षेत्रीय दलों को मनाने में सहायता मिली, जो कांग्रेस के साथ गठबंधन को तैयार नहीं थे|

कांग्रेस के लिए इससे बढिया बात हो ही नहीं सकती थी, क्योंकि जो भाजपा विरोधी दल तीसरे मोर्चे की तैयारी कर रहे थे, उन्हें मनाने का काम उन्हीं में से एक नेता करने जा रहा था| ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और केजरीवाल जैसे भाजपा विरोधी नेताओं को कांग्रेस के साथ मिलकर गठबंधन बनाने के लिए नीतीश कुमार ने ही राजी किया|
इसीलिए कांग्रेस ने भाजपा विरोधी दलों की पहली बैठक का जिम्मा भी नीतीश कुमार को सौंप दिया, ताकि किसी को यह न लगे कि कांग्रेस लीड रोल में रहना चाहती है| कायदे से नीतीश कुमार को पटना बैठक में ही खुद को संयोजक बनवा लेना चाहिए था| उस समय लालू यादव के साथ उनका प्यार मोहब्बत का राजनीतिक रिश्ता बना हुआ था| लालू यादव चाहते ही थे कि नीतीश कुमार को राष्ट्रीय जिम्मेदारी दिलाकर बेटे तेजस्वी के लिए मुख्यमंत्री पद खाली करवाया जाए, लेकिन नीतीश कुमार उस बैठक में चूक गए, या फिर कांग्रेस की चिकनी चुपड़ी बातों में आ गए|
23 जून को हुई पहली बैठक के बाद पिछले साढ़े पांच महीनों में क्या बदला है| बदला यह है कि बेंगलुरु बैठक में सोनिया गांधी ने खुद शामिल हो कर यूपीए को भंग करके खुद को यूपीए चेयरपर्सन के पद से मुक्त कर लिया| संकेत यह दिया गया कि अब नया गठबंधन बने, जिसमें सभी भाजपा विरोधी दलों को शामिल करवाया जाए, और गठबंधन का नया नाम, नया संगठनात्मक ढांचा बने| गठबंधन का नया नाम भी खुद राहुल गांधी ने रख लिया, जबकि नीतीश कुमार ने दूसरा नाम सुझाया था|
इस बैठक में भी नीतीश कुमार को संयोजक बनाने का प्रस्ताव नहीं आया| मुम्बई बैठक में तो कांग्रेस ने खुद को लीड रोल में लाना शुरू कर दिया था| नीतीश कुमार ने जाति आधारित जनगणना को एजेंडे में रखने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन वह ममता, केजरीवाल और उद्धव ठाकरे के विरोध के कारण पास नहीं हुआ| नीतीश कुमार को संयोजक बनाने के बजाए 14 सदस्यीय कमेटी बना दी गई, जिस की अब तक सिर्फ एक ही बैठक हुई है|
इस कमेटी में शरद पवार और हेमंत सोरेन ने जरुर खुद को रखा, अन्य किसी दल के अध्यक्ष ने खुद को इस कमेटी में नहीं रखा| यानी छोटे नेताओं की कमेटी बना दी गई, जो कोई फैसला लेने में सक्षम नहीं थी| नीतीश कुमार ने प्रस्ताव रखा था कि 31 दिसंबर तक सीटों का बंटवारा कर लिया जाए, सभी ने हामी भी भरी, लेकिन कांग्रेस ने किसी से बात शुरू नहीं की| अब तो कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने संयोजक के सवाल को कौन बनेगा करोड़पति जैसा सवाल बताकर नीतीश कुमार के नाम पर ही सवाल खड़ा कर दिया है|
कांग्रेस ने गठबंधन के जनक नीतीश कुमार को कमजोर करके कमान अपने हाथ में ले ली है| शुरू में कहा गया था कि जो जिस राज्य में मजबूत होगा, उस राज्य में सीटों के बंटवारे का नेतृत्व वही करेगा| दिल्ली में शरद पवार के घर पर हुई को-आर्डिनेशन कमेटी की मीटिंग के बाद भी मीडिया को यही बताया गया था| लेकिन कांग्रेस ने क्षेत्रीय दलों से सीटों का बंटवारा करने के लिए मुकुल वासनिक की अध्यक्षता में राष्ट्रीय स्तर की एक हाई पावर कमेटी बना ली| जिसमें अशोक गहलोत, भूपेश बघेल और सलमान खुर्शीद को सदस्य बनाया गया|
जबकि अगर राष्ट्रीय स्तर पर कोई कमेटी बननी थी, तो उसकी रहनुमाई नीतीश कुमार को दी जानी चाहिए थी, ताकि जिस तरह उन्होंने गठबंधन बनाया, उसी तरह वह कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों में पंच की भूमिका निभाते| नीतीश कुमार ने खुद भी एनडीए में लौटने की हवा बनाकर खुद को कमजोर किया, इसलिए ममता बनर्जी और केजरीवाल ने 19 दिसंबर को दिल्ली में हुई बैठक में मल्लिकार्जुन खड़गे को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने का प्रस्ताव तो रखा, लेकिन गठबंधन का संयोजक बनाने का कोई प्रस्ताव नहीं आया|
अब बिना किसी प्रस्ताव के कांग्रेस गठबंधन की सरपंच बन कर बैठ गई है और क्षेत्रीय दलों को सीटों के बंटवारे पर बातचीत करने के लिए दिल्ली तलब किया जा रहा है| जबकि सीटों के बंटवारे की कमान राज्य स्तर पर क्षेत्रीय दलों के हाथ में होनी थी| नतीजा यह निकला कि बिहार की सीटों के बंटवारे के लिए हुई 7 जनवरी की बैठक में नीतीश कुमार तो क्या, जेडीयू से ही कोई शामिल ही नहीं हुआ| कांग्रेस का रवैया देख कर नीतीश कुमार ने कह दिया कि जेडीयू तो 17 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, बाकी बची 23 सीटें आपको जैसे बांटनी है, बाँट लो| हाँ सीटों की अदला बदली हो सकती है| सीटों की अदला बदली की बात भी नीतीश कुमार कांग्रेस से नहीं करेंगे, बल्कि लालू यादव से ही करेंगे|
बिहार के बाद दिल्ली और पंजाब को लेकर आम आदमी पार्टी के साथ बैठक हुई, तो उसकी कमान भी मुकुल वासनिक ने अपने हाथ में रखी हुई थी, जबकि शुरुआती शर्त के मुताबिक़ कमान अरविन्द केजरीवाल के हाथ होनी चाहिए थी| आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा सांसद संदीप पाठक, आतिशी मार्लिना और सौरभ भारद्वाज को भेज दिया| इनमें से फैसला कोई भी नहीं ले सकता, सिर्फ बातचीत कर सकते हैं| कांग्रेस की वही पुरानी शैली इन बैठकों में भी बरकरार रही| किसी राज्य को लेकर कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है|
दोनों बैठकों के बाद यही बताया गया कि चर्चा जारी रहेगी, अभी सीटों को लेकर कोई फैसला नहीं हुआ है| बैठक के बाद मुकुल वासनिक ने कहा कई मुद्दों पर चर्चा हुई, हम फिर मिलेंगे, तब सीटों के बंटवारे पर चर्चा करेंगे| इस बैठक में पंजाब का कोई भी नेता शामिल नहीं हुआ, यानी बैठक सिर्फ दिल्ली पर हुई और उसमें भी कोई सहमति नहीं बनी क्योंकि केजरीवाल भी पांच सीटों पर दावा ठोक रहे हैं, और काग्रेस भी पांच सीटों पर दावा ठोक रही है, जबकि सीटें सिर्फ सात हैं|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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