Opposition Alliance: क्या कांग्रेस की हार से खुलेगा इंडिया गठबंधन की मजबूती का रास्ता?

Opposition Alliance: उत्तर भारत के तीन प्रमुख राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में मिली करारी हार के बाद कांग्रेस पार्टी के कस-बल थोड़े ढीले हुए है। पार्टी ने आगामी लोकसभा चुनाव में सत्ताधारी भाजपा को आईएनडीआईए (इंडिया) गठजोड़ के जरिए चुनौती देने के लिए जो ब्लूप्रिंट तैयार किया था, उसे लेकर भी असमंजस बढ़ता जा रहा है। गठबंधन में शामिल दलों के दबाव में कल यानी 6 दिसंबर 2023 को इंडिया गठबंधन की बैठक बुलाई गई है लेकिन कई क्षेत्रीय दलों की बेरुखी को भांपते हुए कांग्रेस पार्टी को इसे अनौपचारिक बैठक की संज्ञा देनी पड़ी है।

हालांकि इंडिया गठबंधन के मजबूत पैरोकार शरद पवार ने पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद कहा है कि गठबंधन पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। लेकिन परिणाम के तत्काल बाद हो रही बैठक में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री तथा गठबंधन में शामिल बड़े क्षेत्रीय दल तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने व्यक्तिगत व्यस्तता का हवाला देते हुए बैठक में शामिल होने से इंकार किया है। वहीं इंडिया गठबंधन के सूत्रधार बिहार के मुख्यमंत्री जदयू नेता नीतीश कुमार के भी बैठक में शामिल होने को लेकर संदेह है।

Opposition Alliance Will defeat of Congress way for strengthening the India Alliance?

दरअसल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव को देखते हुए गठबंधन में शामिल सभी क्षेत्रीय दल कांग्रेस पार्टी से दो टूक बात कर सीटों का बंटवारा सुनिश्चित कर लेना चाहते हैं। क्षेत्रीय दलों को यह लग रहा है कि कांग्रेस पार्टी का जिन राज्यों में जनाधार कमजोर है, उन राज्यों में भी आधिकाधिक सीट हथियाना चाहती है। लेकिन क्षेत्रीय दल 2020 में हुए विधानसभा चुनाव का उदाहरण देते हुए सीट बंटवारे का मसला हल किए जाने हेतु लगातार दबाव बनाते रहे हैं।

कांग्रेस पार्टी क्षेत्रीय दलों के इस दबाव से वाकिफ है। इंडिया गठबंधन के भीतर कांग्रेस पार्टी को सर्वाधिक चुनौती उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, पंजाब और दिल्ली के क्षेत्रीय दलों की ओर से लगातार मिलती रही है। इन सात राज्यों में लोकसभा की कुल 269 सीटें आती हैं। इन सातों राज्यों में भारतीय जनता पार्टी के विरोध में जो क्षेत्रीय दल हैं, उनकी राजनीतिक हैसियत कांग्रेस पार्टी से कई गुना अधिक है। खासकर उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार और तमिलनाडु में तो कांग्रेस 'न' के बराबर है। उत्तर प्रदेश में भाजपा के विरोध में सपा और बसपा हैं तो बंगाल में तृणमूल कांग्रेस। तमिलनाडु और बिहार में कांग्रेस परजीवी की तरह है, तो 48 सीटों वाले महाराष्ट्र में एनसीपी और शिवसेना की पिछलग्गू है।

पंजाब और दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस की खटिया खड़ी कर रखी है। इन सभी राज्यों के क्षेत्रीय दलों के नेता समय-समय पर यह बताते रहे हैं कि उनके राज्य में उनकी मर्जी के खिलाफ उन्हें कुछ भी स्वीकार नहीं है। मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में सीटों को लेकर जब सपा और कांग्रेस के बीच गतिरोध बढ़ा तो लखनऊ लौटते ही सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने दो टूक शब्दों में कह दिया था कि समाजवादी पार्टी सीटें मांगने वाली पार्टी नहीं बल्कि सीट बांटने वाली पार्टी है। मध्य प्रदेश में कांग्रेस पार्टी को करारी शिकस्त मिलने के बाद समाजवादी पार्टी और अधिक हमलावर हो रही है।

सपा प्रमुख की तरह ही ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने भी विभिन्न मौकों पर यह कहा है कि गठबंधन में कांग्रेस पार्टी को एक सीमा से अधिक तवज्जो देने का मतलब है, भारतीय जनता पार्टी का रास्ता आसान करना। कमोबेश यह सभी क्षेत्रीय दल कांग्रेस पार्टी के विरोध में जनमत तैयार कर अपनी जगह बनाए हुए हैं। इन क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस पार्टी की कार्य संस्कृति का भी पूरी तरह से ज्ञान है।

ज्ञात हो कि भाजपा को पूरे देश में चुनौती देने की गरज से जब इंडिया का गठन हुआ था तब कांग्रेस पार्टी का रवैया अपेक्षाकृत मिलनसार था। लेकिन पहले हिमाचल और फिर कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के बाद कांग्रेस के नेताओं के सुर बदलने लगे थे। कांग्रेस के बदलते तेवर देखते हुए गठबंधन में शामिल सभी दल जल्द से जल्द सीटों का बंटवारा और इसकी औपचारिक घोषणा के लिए लगातार दबाव बना रहे थे। गठबंधन में शामिल एक बड़े राज्य के क्षेत्रीय दल के नेता ने तो यहां तक कहा था कि अगर 15 दिसंबर तक गठबंधन की मीटिंग नहीं होती तो इस गठजोड़ का भविष्य अंधकारमय मान लिया जाना चाहिए।

कांग्रेस पार्टी भी भली प्रकार यह जानती है कि उसकी ही जमीन पर अपनी राजनीति चमकाने वाले क्षेत्रीय दल अवसर आने पर कांग्रेस को कमजोर करने का हर संभव प्रयास करेंगे। इसीलिए प्रारंभ से ही कांग्रेस पार्टी भाजपा विरोध के साथ-साथ सत्ता संतुलन को भी साधने की नीति पर काम करती रही है। इसी नीति के तहत माहौल अपने पक्ष में होने तक कांग्रेस सीट बंटवारे को लेकर गठबंधन की बैठक को टालती रही।

पार्टी को उम्मीद थी कि जिन पांच राज्यों में हाल में विधानसभाओं के चुनाव हुए उसमें पार्टी अगर बेहतर प्रदर्शन कर पाती तो उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, पंजाब और दिल्ली के क्षेत्रीय दलों की ओर से जो दबाव लगातार बनाया जा रहा है उसकी आंच कमजोर होगी। लेकिन चुनाव में कांग्रेस पार्टी चारों खाने चित हो गई। हालांकि इन चुनाव में कांग्रेस पार्टी सीटों के मामले में भले पीछे है, लेकिन मत प्रतिशत को बरकरार रखने में उसने कामयाबी हासिल की है।

लेकिन सौ टके की बात यह है कि पांच राज्यों में नतीजे अगर कांग्रेस के पक्ष में गए भी होते तब भी शरद पवार, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल, तेजस्वी यादव, एमके स्टालिन सरीखे नेता कांग्रेस पार्टी के आगे नतमस्तक हो जाते यह असंभव, हास्यासपद और बेसिर पैर की बातें हैं। यह सभी नेता उन दलों की अगुवाई करते हैं जो दल कांग्रेस को पटकनी देकर अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। यह सभी दल कभी भी और किसी भी कीमत पर अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस को बढ़ते हुए फूटी आंख भी देखना नहीं चाहेंगे।

पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आ जाने के बाद गठबंधन में शामिल सभी क्षेत्रीय दल अब लोकसभा चुनाव में अपनी हिस्सेदारी जल्दी से जल्दी पुख्ता करना चाहते हैं। वहीं कांग्रेस पार्टी अपनी देशव्यापी मौजूदगी तथा हाल के चुनाव में प्राप्त मत प्रतिशत को आगे कर गठबंधन की ड्राइविंग सीट पर खुद को कायम रखना चाहती है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गाहे बगाहे अब यह कहने लगे हैं कि हालिया चुनाव परिणाम से यह संकेत मिल रहा है कि देश की जनता खिचड़ी सरकारों से ऊपर उठना चाहती है। यह भी बताना नहीं भूलते कि उत्तर भारत के जिन तीन राज्यों में चुनाव हुए वहां छोटे दलों की दाल नहीं गली। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सपा, बसपा, जदयू और आप पार्टी का खाता भी नहीं खुला।

कुल मिलाकर गठबंधन में शामिल सभी दल सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी को गद्दी से बेदखल करने के लिए एकजुटता की बात तो कर रहे हैं, लेकिन गठबंधन में अपनी बड़ी भूमिका और बड़ी हिस्सेदारी के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहते। क्षेत्रीय दल कांग्रेस की भूमिका को सीमित करते हुए जल्द से जल्द सीट का फार्मूला तय करने के लिए दबाव बना रहे हैं, वहीं कांग्रेस पार्टी अब भी पार्टी के पक्ष में माहौल बनने तक निर्णयों को टालने के पक्ष में है। यही कारण है कि गठबंधन की कल होने वाली बैठक को कांग्रेस अध्यक्ष ने अनौपचारिक बैठक कहा है, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि बैठक में किन-किन बातों पर सहमति बनती है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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