Opposition Alliance: कांग्रेस ने अखिलेश और केजरीवाल का मुंह बंद किया
कैग रिपोर्ट के बाद कैग अधिकारियों के तबादलों के बहाने कांग्रेस ने मोदी सरकार के साथ अन्ना हजारे को भी कटघरे में खड़ा किया है और अरविन्द केजरीवाल को भी। कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कांग्रेस की आधिकारिक प्रेस कांफ्रेंस में कहा है कि दस साल पहले यूपीए शासनकाल में 2-जी और कोयला खदान आवंटन पर आई कैग रिपोर्ट के बहाने दिल्ली के रामलीला मैदान में नाटक खड़ा किया गया था।
कांग्रेस ने कैग रिपोर्ट के बहाने आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल को इसलिए निशाने पर लिया है क्योंकि उन्होंने विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को हराने के लिए बड़ी तादाद में उम्मीदवार खड़े कर दिए हैं। कांग्रेस को एहसास हो गया है केजरीवाल ज्यादा दिन इंडी गठबंधन में नहीं रहने वाले। नीतीश कुमार के बीच बचाव के बावजूद केजरीवाल ने मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा चुनावों में बड़े पैमाने पर उम्मीदवार खड़े करने शुरू कर दिए हैं।

इन तीनों राज्यों में कांग्रेस के लिए जीवन मरण का सवाल है। खासकर मध्य प्रदेश जहां भाजपा और कांग्रेस में मुकाबला हमेशा ही कड़ा रहता है, कांग्रेस के लिए भाजपा विरोधी एक एक वोट मायने रखता है, इसलिए कांग्रेस चाहती थी कि आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी उसके लिए मैदान खुला छोड़ दें।
पिछले विधानसभा चुनाव में भले ही कांग्रेस को 5 सीटें भाजपा से ज्यादा मिल गई थी, लेकिन उसे भाजपा से लगभग एक लाख वोट कम मिले थे। भाजपा को 1.56 करोड़ और कांग्रेस को 1.55 करोड़ वोट मिले थे, जबकि आम आदमी पार्टी के एक को छोड़ कर बाकी सभी 207 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी, लेकिन उसे कुल मिलाकर 2,53,106 वोट मिले थे, जो निश्चित ही भाजपा विरोधी वोट थे।

समाजवादी पार्टी मध्यप्रदेश में कांग्रेस के लिए आम आदमी पार्टी से थोड़ा ज्यादा मायने रखती है। भले ही 1998 के बाद से उसका वोट बैंक लगातार घटा है, लेकिन कम से कम दस सीटों पर अभी भी उसका प्रभाव बना हुआ है। पिछले चुनावों में सपा को आम आदमी पार्टी से दुगुने वोट मिले थे और एक सीट भी जीती थी।
सपा 2003 में मध्यप्रदेश में सात सीटें जीती थी, 2008 में सिर्फ एक, जबकि 2013 में सपा का खाता नहीं खुला, लेकिन 2018 के पिछले चुनाव में सपा एक सीट जीत गई थी, और पांच सीटों पर वह दूसरे नंबर पर रही थी। सपा को 2003 में 5.26 प्रतिशत, 2008 में 2.46 प्रतिशत, 2013 में 1.70 प्रतिशत और 2018 में 1.30 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे। लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि पिछले चुनावों में पांच सीटों पर उसके उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे थे।
अखिलेश यादव वही छह सीटें चाहते थे। उनकी कमलनाथ और दिग्विजय सिंह से बातचीत भी हुई थी। इन दोनों से सपा के प्रादेशिक नेताओं की भी लंबी बातचीत हुई थी, लेकिन कांग्रेस ने छह तो क्या एक भी सीट पर सपा का दावा मंजूर नहीं किया। इस पर अखिलेश यादव ने यहाँ तक कह दिया है कि अगर उन्हें पहले पता होता कि कांग्रेस सिर्फ 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन करना चाहती है, तो वह गठबंधन में जाते ही नहीं।
अखिलेश यादव कांग्रेस के व्यवहार से बेहद खफा हैं, क्योंकि एक तो उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय ने मध्यप्रदेश को लेकर टिप्पणी की, जिस पर अखिलेश यादव ने उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश की भाषा में चिरकुट कह दिया। अजय राय पहले भाजपा में रहे हैं, इसलिए अखिलेश यादव ने कहा कि कांग्रेस में भाजपाई भरे पड़े हैं। लेकिन कांग्रेस और सपा में खटास सिर्फ अजय राय के बयान के कारण नहीं आई है।
मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने उन्हें अखिलेश वखिलेश कह कर जिस तरह खारिज किया, उससे वह खुद को अपमानित महसूस कर रहे हैं। अखिलेश यादव भी कमल नाथ की तरह एक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, जबकि कमल नाथ सिर्फ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हैं। अपने से बड़े प्रदेश के एक बड़े नेता के लिए कमलनाथ की टिप्पणी उनके घमंडी होने का आभास दिलाने वाली थी।
कमल नाथ की अपमानजनक टिप्पणी से भड़के अखिलेश यादव ने भी यूपी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की परफोर्मेंस को आधार बना कर कह दिया है कि लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का यूपी में एक सीट पर भी दावा नहीं बनता। यानी उन्होंने सोनिया गांधी की सीट पर भी कांग्रेस के दावे को नकार दिया है। जबकि 2019 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन नहीं होने के बावजूद सपा और बसपा ने रायबरेली और अमेठी में अपने उम्मीदवार खड़े नहीं किए थे।
कांग्रेस को आईना दिखाते हुए अखिलेश यादव ने यह भी कह दिया कि विधानसभा चुनाव में भी उसका दो ही सीटों पर दावा बनता है। जिस प्रेस कांफ्रेंस में कांग्रेस ने अरविन्द केजरीवाल को आईना दिखाने का काम किया, उसी प्रेस कांफ्रेंस में अखिलेश यादव के भड़कने पर कांग्रेस ने भी दो टूक कह दिया है कि इंडी एलायंस 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए बना है, अगर कोई दल विधानसभा चुनाव लड़ना चाहता है, तो लड़े, मैदान खुला है।
नीतीश कुमार को ठिकाने लगाने के बाद कांग्रेस ने एक एक कर क्षेत्रीय दलों के अन्य नेताओं के साथ भी बदसलूकी शुरू कर दी है। इसलिए यह स्पष्ट दिखाई देने लगा है कि कांग्रेस अगर पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों में तीन राज्य भी जीत जाती है, तो उसके तेवर और तीखे हो जाएंगे। हालांकि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी या बहुजन समाज पार्टी में से किसी एक का साथ चाहिए।
अखिलेश को जिस तरह अपमानित किया गया है, उससे यह भी लगता है कि कांग्रेस चुपचाप बसपा से बात कर रही हो। क्योंकि उत्तर प्रदेश के कांग्रेस नेता अखिलेश के बजाए मायावती से गठबंधन के ज्यादा समर्थक रहे हैं। वैसे भी तीनों ही हिन्दी भाषी राज्यों में बसपा का वोट सपा से कई गुना ज्यादा है।
मध्य प्रदेश में ही बसपा का कम से कम तीन दर्जन सीटों पर प्रभाव है। पिछले चुनाव में उसे 19 लाख से ज्यादा वोट मिले थे, जो कुल मतों का 5 फीसदी था, बसपा दो सीटें भी जीती थी। उसी के साथ से कमलनाथ की सरकार बनी थी। बसपा ने सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है और अब तक 111 उम्मीदवारों की घोषणा भी कर दी है। लेकिन सपा और बसपा में अंतर है कि बसपा का वोट कांग्रेस को नही पड़ता, अगर बसपा का उम्मीदवार नहीं हो, तो बसपा का वोट भाजपा को जाता है। पिछले आठ दस साल में दलित समुदाय का काफी वोट कांग्रेस और बसपा से भाजपा की तरफ शिफ्ट हुआ है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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