Old Pension Scheme: लोकसभा चुनाव से पहले लागू हो सकती है पुरानी पेंशन योजना?

नई पेंशन योजना का खाका उस समय बना था जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी, लेकिन अप्रेल 2005 में यह लागू तब हुई, जब केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार बन चुकी थी। उस समय हिमाचल प्रदेश में भी कांग्रेस की सरकार थी।

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यह एक सच्चाई है कि नई पेंशन योजना भारतीय जनता पार्टी के गले की फांस बन गई है। हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का यह एक बड़ा मुद्दा बना और अब गुजरात में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया है।

हिमाचल प्रदेश के 12 नवंबर को सम्पन्न हुए चुनावों में 2 लाख सरकारी कर्मचारियों को यह मुद्दा प्रभावित कर चुका है और गुजरात में साढ़े सात लाख कर्मचारियों के 20-22 लाख पारिवारिक वोट इस मुद्दे से प्रभावित हो रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश के भाजपा नेता यह कबूल करते हैं कि कांग्रेस की और से पुरानी पेंशन योजना को लागू करने के वायदे ने चुनावों को प्रभावित किया है। अगर यह मुद्दा न होता तो चुनाव में ऐसी कांटेदार टक्कर नहीं होती, जैसी देखने को मिली। अगर इस मुद्दे ने हिमाचल में टक्कर को कांटेदार बना दिया तो गुजरात में भी भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी होना लाजिमी है।

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नई पेंशन योजना का खाका उस समय बना था जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी, लेकिन अप्रेल 2005 में यह लागू तब हुई, जब केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार बन चुकी थी। उस समय हिमाचल प्रदेश में भी कांग्रेस की सरकार थी, जिसके मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह थे।

इसलिए भारतीय जनता पार्टी ने यह कह कर मुद्दे को कमजोर करने की कोशिश की कि यह योजना कांग्रेस ने ही लागू की थी। भारतीय जनता पार्टी ने हार के डर से यह भी कहा कि अगर कोई पुरानी पेंशन योजना को बहाल करेगा, तो वह भाजपा ही होगी, लेकिन इसे चुनावी वायदे के रूप में पेश नहीं करके भाजपा नैतिक लड़ाई हार गई।

यह दूसरी बार है, जब भाजपा ने चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान की गलती को सुधारने की कोशिश की। पिछली बार यानि 2017 में भाजपा ने किसी को मुख्यमंत्री का चेहरा प्रोजेक्ट नहीं किया था, चुनाव के अंतिम दिनों में भाजपा को एहसास हुआ कि प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट नहीं करके गलती की।

तब आख़िरी दिनों में धूमल को प्रोजेक्ट किया गया, धूमल खुद भले ही चुनाव हार गए, लेकिन उनके कारण भाजपा चुनाव जीत गई थी। इसी तरह इस बार भाजपा ने पुरानी पेंशन योजना का बचाव करने की बजाए यह कहा कि जब भी कभी बहाल करेगी, भाजपा करेगी।

राजनीतिक गलतियों को सुधारने में कोई बुराई नहीं, सरकारों को समाज के लिए कल्याणकारी होना चाहिए, भले ही उस का खामियाजा सरकारी खजाने पर बोझ से चुकाना पड़े।

खुद कांग्रेस सरकारों की ओर से लागू की गई नई पेंशन योजना को कांग्रेस की राज्य सरकारें अब बदलना चाहती हैं। हिमाचल और गुजरात में कांग्रेस ने इसे चुनावी वायदे के रूप में पेश किया है, जबकि अपनी प्रतिबद्धता दिखाने के लिए राजस्थान और छतीसगढ़ में कांग्रेस सरकारों ने केबिनेट से प्रस्ताव पास कर के केंद्र सरकार को भेजा है।

हालांकि पुरानी पेंशन योजना को लागू करना राज्य सरकारों के लिए आसान नहीं। नई पेंशन योजना केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच एक अनुबंध के तौर पर लागू हुई है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य सरकारी खजाने पर पेंशन का बोझ घटाना और पेंशन को बाज़ार आधारित बनाना है। योजना में केंद्र सरकार का पैसा लगा है और अनुबंध में यह शर्त है कि अगर राज्य सरकार अनुबंध से पीछे हटती है तो केंद्र सरकार की ओर से लगाया गया पैसा केंद्र सरकार को वापस चला जाएगा।

राज्य सरकारें अगर पुरानी योजना को लागू करना चाहेंगी, तो उस पर इतना बोझ आ जाएगा कि कर्मचारियों का वेतन देना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए कांग्रेस की राजस्थान और छतीसगढ़ सरकारें पुरानी योजना को फिर से लागू करने के लिए केंद्र सरकार से पैसा मांग रही हैं, जबकि केंद्र सरकार अनुबंध की शर्त का हवाला देकर पैसा जब्त करने की बात कर रही है। इसलिए भाजपा ने कहा तो सही है कि पुरानी पेंशन योजना को जब भी लागू करेगी भाजपा ही करेगी, क्योंकि केंद्र में भाजपा की सरकार है और अनुबंध की शर्त को वही खत्म कर सकती है।

अगर गुजरात और हिमाचल ने भाजपा को चोट पहुंचाई, या चुनाव जीतने के बावजूद भाजपा इस नतीजे पर पहुंची कि लंबे समय तक इस योजना को ढोना महंगा पड़ेगा, तो लोकसभा चुनाव आते आते केंद्र सरकार पुरानी पेंशन योजना लागू करने की बात कर सकती है।

मोदी सरकार ने भारत के संवैधानिक ऑडिटर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानि कैग को पुरानी पेंशन स्कीम से राज्यों की वित्तीय स्थिति पर पड़ने वाले बोझ का पता लगाने के लिए कहा है। सीएजी की एक डिवीजन लंबी अवधि के और अल्पकालिक प्रभावों का पता लगाने के लिए पुरानी पेंशन योजना पर वापस लौटने से जुड़े विभिन्न पहलुओं को देख रहा है।

पुरानी पेंशन एक सुरक्षित पेंशन योजना है। इसका भुगतान सरकारी खजाने से होता था। नई पेंशन योजना शेयर बाजार आधारित है, बाजार की चाल के आधार पर ही पेंशन का भुगतान होता है।

पुरानी पेंशन योजना में रिटायरमेंट के समय अंतिम बेसिक सैलरी के 50 फीसदी तक निश्चित पेंशन मिलती थी। इसके अलावा महंगाई दर बढ़ने के साथ महंगाई भत्ता भी बढ़ता था। जब सरकार नया वेतन आयोग लागू करती है तो भी इससे पेंशन में बढ़ोतरी होती थी। इस योजना में 20 लाख रूपए तक ग्रेच्युटी मिलती थी और जीपीएफ का भी प्रावधान था। रिटायर्ड कर्मचारी की मौत के बाद उसके परिजनों को भी पेंशन का प्रावधान था।

पुरानी पेंशन स्कीम में पेंशन के लिए कर्मचारी के वेतन से कोई पैसा नहीं कटता था। अप्रैल 2005 के बाद नियुक्त होने वाले कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन स्कीम को बंद कर दिया था। इसकी जगह नई पेंशन योजना लागू की गई थी। जिसे राज्यों ने केंद्र सरकार से अनुबंध के आधार पर अपना लिया था।
नई पेंशन स्कीम में कर्मचारी की बेसिक सैलरी और डीए का 10 प्रतिशत हिस्सा कटता है। कुछ हिस्सा राज्य सरकार और बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार भी इस स्कीम में अपनी हिस्सेदारी के तौर पर लगाती है। कर्मचारी को रिटायरमेंट के समय पेंशन पाने के लिए 40 प्रतिशत निवेश करना होता है और बाकी 60 प्रतिशत एकमुश्त मिल जाता है।

नयी योजना शेयर बाजार आधारित है, इसलिए यह पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। रिटायरमेंट के बाद निश्चित पेंशन की गारंटी नहीं होती। एक तो बाज़ार आधारित होने पर पेंशन पर टेक्स लगता है, तो दूसरी ओर डीए का लाभ खत्म हो गया। सरकारों ने एक तरह से रिटायर्ड कर्मचारियों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्ति पा ली। अब रिटायर्ड कर्मचारियों और मौजूदा कर्मचारियों को यह योजना बुढापे की दुश्वारियों का सामना करने में असमर्थ नजर आ रही है।

सरकारों को भी इस बात का एहसास है कि 35-40 साल तक अपनी पूरी जवानी सरकारी सेवा में खपाने वाले का बुढापा मुश्किल भरा हो गया है, लेकिन केंद्र सरकार को अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि एनपीएस से पुरानी पेंशन योजना में वापस जाना राज्यों के वित्त के लिए विनाशकारी परिणाम ला सकता है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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