Old Parliament Building: जिस भवन को बनाने का कोई प्लान नहीं था, वही बन गया भारत के लोकतंत्र का साक्षी
Old Parliament Building: जब अंग्रेजों ने नई दिल्ली बसाने की योजना बनाई थी, तो उस वक्त किसी ऐसे भवन के बारे में सोचा तक नहीं गया था जो विधायी कार्य के लिए इस्तेमाल हो सके। एक वॉयसराय हाउस बनाना था, जहां से सरकार चलनी थी, जो आज राष्ट्रपति भवन है। अपने सेनापति का भवन बनाना था, जिसको बाद में नेहरूजी ने पीएम आवास बना लिया, अब वो प्रधानमंत्री म्यूजियम है। सचिवालय के तौर पर आज भी नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक मौजूद ही है।
लॉर्ड हार्डिंग तो लेजिस्लेटिव असेम्बली और चैम्बर्स ऑफ प्रिंसेज को अलग से कोई भवन देने के लिए राजी ही नहीं था। वो चाहता था कि गर्वनमेंट हाउस यानी वॉयसराय हाउस में ही काउंसिल को जगह दी जाए, ताकि ये संदेश जाए कि वायसराय ही सरकार है और सर्वशक्तिमान है।

लंदन के हाउस ऑफ कॉमन्स में 1912 में ही आर्थर मुरे ने ये सवाल उठाया था कि काउंसिल वायसराय हाउस से अलग होनी चाहिए। लेकिन उसकी मांग को खारिज कर दिया गया। 1919 के एक्ट में जब ये प्रावधान हुआ कि इंडिया का वायसराय अब एक काउंसिल की सलाह पर काम करेगा, तब जाकर ये मुमकिन हो पाया कि काउंसिल के लिए अलग भवन हो जो वॉयसरॉय हाउस से कुछ दूरी पर हो।
फिर जब काउंसिल बिल्डिंग बनाने की योजना बनी तो दोनों आर्किटेक्ट्स यानी हरबर्ट बेकर और एडविन लुटियंस के बीच मतभेद हो गए। 1920 में हरबर्ट बेकर ने जो डिजाइन बनाई, उसमें बीचों-बीच एक केन्द्रीय हॉल के ऊपर डोम था और तीन विंग बनाई गई, जबकि एडविन लुटियंस ने इसे गोलाकार रूप दिया। काउंसिल के सदस्यों के लिए ईस्टर्न कोर्ट, वेस्टर्न कोर्ट में हॉस्टल बने, विंडसर पैलेस में क्वार्टर बने। फिर बाद में उसमें भी सुधार हुए, क्योंकि शुरूआत में कोई योजना ही नहीं थी।
संसद भवन में जगह की समस्या शुरू से ही पड़ने लगी, जैसे ही नेहरूजी की सरकार ने आजादी के बाद काम करना शुरू किया, उनकी समझ में ये आने लगा था। तभी तो 1956 में जो संसद भवन केवल एक मंजिल का था, उस पर 2 मंजिलें और खड़ी की गईं। चूंकि डिजाइन भी शायद सहेज कर रखी नहीं गई थीं, और ना ही कभी ऊपर की मंजिलें बनाने के बारे में सोचा गया था तो वो काम भी बस जैसे तैसे हो गया। संसद भवन का जो केन्द्रीय गुम्बद है, वो भी थोड़ा छुप गया।
जब ये इमारत बनाई गई थी, तब ना भूकम्परोधी उपाय किए गए थे और न ही आज की तरह अत्याधुनिक कम्युनिकेशन सुविधाओं के बारे में सोचा गया था। यहां तक कि आज भी फायर डिपार्टमेंट वालों को इस भवन में मुश्किलें आती हैं। संसद भवन पर आतंकी हमले के बाद सुरक्षा उपकरण लगाने की जरूरत हो या फिर आधुनिक तकनीकी सुविधा का विस्तार, संसद भवन का पुराना भवन इन सबके लिए डिजाइन ही नहीं किया गया था।
6 साल लगे इस भवन के निर्माण में
इस भवन की अभिकल्पना दो मशहूर वास्तुकारों एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर ने तैयार की थी, जिन्हें तत्कालीन अंग्रेज वायसराय हॉर्डिंग ने नई दिल्ली को डिजाइन करने का काम सौंपा था। नई दिल्ली के ले आउट, साइट आदि के बारे में फैसले के लिए भारत सचिव ने जो कमेटी बनाई, उसमें कैप्टन स्विंटन चेयरमेन थे और जेए ब्रॉडी और एडविन लुटियंस सदस्य। हार्डिंग को लुटियंस के नाम पर ऐतराज था कि अभी तक उसने कुछ बड़ा नहीं बनाया है, जबकि उसके चाहने वाले कहते थे कि महंगी इमारतें बनाने में उसे महारत हासिल है।
हार्डिंग चाहता था नई राजधानी की इमारतों में भारतीयता दिखे, जबकि हार्डिंग पेपर्स में जानकारी मिलती है कि लुटियंस इटेलियन आर्किटेक्चर से काफी प्रभावित था। उसने ताजमहल तक को 'रबिश' बता दिया था। फिर भी हार्डिंग के दवाब में लुटियंस को मांडू, आगरा, फतेहपुर सीकरी आदि जगह जाना पड़ा। उसने संसद भवन के लिए मुरैना के 64 योगिनी मंदिर के स्वरूप को पसंद किया।
लुटियंस के सुझाव पर उसके एक सीनियर हरबर्ट बेकर को बुलाया गया, ताकि बाकी महत्वपूर्ण इमारतों जैसे साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक को बनाया जा सके। डिजाइन के मामले में हार्डिंग को स्विंटन जैकब पसंद था, लेकिन लुटियंस और बेकर ने उसे इतना परेशान कर दिया कि इस रिटायर्ड इंजीनियर ने उनकी टीम में शामिल होने से ही मना कर दिया था।
सबसे बड़ा झगड़ा हुआ हरबर्ट बेकर और एडवर्ड लुटियंस में, वायसराय हाउस (राष्ट्रपति भवन) को लेकर। बेकर को काम दिया गया था राष्ट्रपति भवन से पहले सचिवालय की दोनों बिल्डिगों यानी नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक बनाने का। बेकर ने तय किया कि मुख्य भवन 400 गज पीछे होना चाहिए और बिना लुटियंस को जानकारी दिए उसने वायसराय को भी राजी कर लिया। इन दोनों इमारतों और बीच की सड़क के हाई प्वॉइंट पर होने के चलते वायसराय हाउस छुप गया। लुटियंस की बेकर से बिगड़ गई, लुटियंस ने ये भी आरोप लगा दिया कि बेकर ये सब पैसे के लिए कर रहा है। एक कमेटी भी बनाई गई, लेकिन 1916 में उसने लुटियंस के तर्क को खारिज कर दिया।
आज इतिहास बन रहे संसद भवन की आधारशिला काउंसिल हाउस के रूप में 12 फरवरी, 1921 को डय़ूक ऑफ कनॉट ने रखी थी। इसको बनाने में 6 साल लगे और इसका उद्घाटन समारोह भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इर्विन ने 18 जनवरी, 1927 को आयोजित किया। इसके निर्माण पर 83 लाख रूपये की लागत आई।
संसद भवन एक विशाल गोलाकर भवन है जिसका व्यास 560 फुट (170.69 मीटर) और परिधि एक मील की एक तिहाई 536.33 मीटर है तथा यह लगभग छह एकड़ (24281.16 वर्ग मीटर) क्षेत्रफल में फैला हुआ है। इसके प्रथम तल पर खुले बरामदे के किनारे-किनारे क्रीम रंग के बलुई पत्थर के 144 स्तंभ हैं और प्रत्येक स्तंभ की ऊंचाई 27 फुट (8.23 मीटर) है। भवन के 12 द्वार हैं जिनमें से संसद मार्ग पर बना द्वार नंबर 1 मुख्य द्वार है।
अब पुराने हो रहे संसद भवन परिसर में तीस महापुरुषों की मूर्तियां हैं। इसमें चंद्रगुप्त मौर्य से लेकर छत्रपति शिवाजी तक, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से लेकर बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर तक, नेताजी बोस से लेकर सरदार पटेल तक, महाराजा रणजीत सिंह से लेकर महात्मा फुले तक, बिरसा मुंडा से लेकर जयप्रकाश नारायण तक। ऐसे में ये जानना दिलचस्प होगा कि इन मूर्तियों में 10 फीसदी मूर्तियां नेहरू परिवार की हैं, जिसमें मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी की मूर्तियां शामिल हैं।
शुरू में केन्द्रीय कक्ष का उपयोग पूर्ववर्ती केन्द्रीय विधानसभा और राज्य सभा के ग्रन्थागार के रूप में किया जाता था। 1946 में इसका स्वरूप बदलकर कर इसे संविधान सभा कक्ष कर दिया गया। 9 दिसम्बर, 1946 से 24 जनवरी, 1950 तक वहां संविधान सभा की बैठकें हुईं। नए संसद भवन के बनने से पहले केन्द्रीय कक्ष का उपयोग दोनों सभाओं की संयुक्त बैठकें आयोजित करने के लिए किया जाता रहा है।
केन्द्रीय कक्ष में भी मंच के ऊपर मेहराब में गांधीजी के चित्र के अलावा 23 महापुरुषों के चित्र हैं- मालवीय जी से लेकर सरदार पटेल तक, रविन्द्र नाथ टैगोर से लेकर राम मनोहर लोहिया तक, श्यामा प्रसाद मुखर्जी से लेकर वीर सावरकर तक। लेकिन यहां भी गांधी परिवार का ही सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व है, चार चित्र उनके परिवार के है। मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी।
दीवारों पर उभरा इतिहास
जैसे ही कोई व्यक्ति संसद भवन में आता है तो वह बाह्य गोलाकार गलियारे में भित्ति चित्रों को देखकर ही मंत्रमुग्ध हो जाता है। ये चित्र भारत के प्रतिष्ठित कलाकारों की कलाकृतियां हैं, जिनमें वैदिक काल से लेकर ब्रिटिश काल से होते हुए वर्ष 1947 में आजादी मिलने तक के इस देश के लम्बे इतिहास को कुछ चित्रों के जरिए दर्शाया गया है।
इन भित्ति चित्रों के पैनल में योगी रूप में भगवान शिव से लेकर मोहनजोदड़ो से प्राप्त नर्तक बालिका की धातु प्रतिमा तक, राम राज्य की स्थापना से लेकर महाराज जनक द्वारा बुलाई प्रथम भारतीय दर्शन शास्त्रियों की सभा तक का दृश्य, आदिनाथ और पार्श्वनाथ के साथ भगवान महावीर से लेकर विधि चक्र को घुमाते भगवान बुद्ध तक, पाणिनी और चाणक्य से लेकर सिकंदर और राजा पोरस तक, विदेशी दरबारों में सम्राट अशोक के भेजे दूतों से लेकर कलिंग के राजा खारवेल के समय होने वाली जैन परिषद तक, कनिष्क के समय होने वाली बौद्ध परिषद से लेकर चरक और सुश्रुत जैसे महान चिकित्सकों तक, जनता द्वारा चुना गया राजा गोपाल का दृश्य भी इन भित्ति चित्रों में उकेरा गया है।
शंकराचार्य और रामानुचार्य जैसे विद्वानों के चित्र भी, पृष्ठभूमि में अशोक स्तम्भ के साथ फिरोज शाह तुगलक है तो अपने दरबारी रत्नों के साथ अकबर के दरबार का दृश्य भी है, चोल, मराठे, मुगल, सातवाहन, कन्नौज आदि के शासकों के चित्र भी हैं तो गुरुनानक, रामदास, मीराबाई, दयानंद सरस्वती के चित्र भी हैं। कोणार्क सूर्य मंदिर, सांची स्तूप, गोल गुम्बज और लाल किला जैसी इमारतों के चित्र भी हैं तो स्वतंत्रता संग्राम की घटनाएं भी जैसे डांडी मार्च, भारत छोड़ों संकल्प और आजाद हिंद फौज का दिल्ली चलो अभियान आदि भी।
यादगार रहे ये विशेष सत्र
जैसे आज एक विशेष सत्र से पुराने संसद भवन की विदाई हो रही है वैसे ही स्वतंत्र भारत में संसद प्रवेश भी एक विशेष सत्र के जरिए हुआ था। पहला विशेष सत्र संसद में तब लाया गया, जब बिना जनता के वोट के आजादी के बाद पहली सरकार बनी। 14-15 अगस्त 1947 की रात ये विशेष सत्र आयोजित हुआ था जिसमें नेहरू ने ऐलान किया था कि आधी रात को जब दुनिया सो रही है तब भारत स्वतंत्रता की नयी सुबह के साथ जाग रहा है।
1962 के चीन युद्ध के दौरान ही 8 व 9 नवम्बर को भी विशेष सत्र आयोजित किया गया, जबकि शीतकालीन सत्र आगे बढ़ा दिया गया था। पहले विशेष सत्र में नेहरूजी का आत्मगौरव चरम पर था और दूसरे तक आते आते रसातल में चला गया था।
तीसरा विशेष सत्र 1972 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान हुआ, मौका था आजादी की 25वीं वर्षगांठ का। 15 अगस्त को ही ये विशेष सत्र आहूत किया गया था। इसी तरह 1992 में जब भारत छोड़ो आंदोलन की पचासवीं वर्षगांठ आई तो नरसिम्हाराव सरकार ने 9 अगस्त को विशेष सत्र आयोजित किया। 15 अगस्त 1997 को फिर एक विशेष सत्र आयोजित किया गया, सरकार थी इंद्र कुमार गुजराल की और अवसर था आजादी की 50वीं वर्षगांठ का। इसी महीने में उसी साल पांच दिन का एक और विशेष सत्र आयोजित किया गया, 26 अगस्त से 1 सितम्बर तक। इस सत्र में आजादी के बाद के 50 सालों की समीक्षा की गई थी।
मोदी सरकार में ये तीसरा विशेष सत्र है जो नए संसद भवन में प्रवेश के लिए आहूत किया गया है। मोदी सरकार ने पहला विशेष सत्र 26 नवम्बर 2015 को बुलाया और इस तारीख को संविधान दिवस के तौर पर मनाए जाने का ऐलान भी किया गया। मोदी सरकार ने दूसरा विशेष सत्र 30 जून 2017 को आहूत किया जिसमें कोई बहस नहीं की गई। ये अनोखा था, केवल जीएसटी को लागू करने के लिए इसे बुलाया गया था। आधी रात को आयोजित इस सत्र में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने जीएसटी को एक बटन दबाकर लागू कर दिया था। अब ये तीसरा पांच दिनों का विशेष सत्र बुलाया गया है जो पुराने संसद भवन के आखिरी विशेष सत्र के तौर पर इतिहास में लिख दिया जाएगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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