Offensive Comments: रमेश विधूड़ी दोषी तो मनोज झा निर्दोष कैसे?
Offensive Comments: संसद के विशेष सत्र में दो सांसद अपनी अपनी टिप्पणियों के कारण विवाद का कारण बने। एक आरजेडी के मनोज झा और दूसरे भाजपा के रमेश विधूड़ी। आरजेडी सांसद मनोज झा ने जहां एक जाति विशेष "ठाकुर" को एक कविता के जरिए शोषक ठहराया तो रमेश विधूड़ी ने एक दूसरे सांसद दानिश अली को "उग्रवादी" करार देकर चुप रहने के लिए कहा।
लेकिन दोनों की अशोभनीय और अमर्यादित टिप्पणियों के बाद एक को जहां दोषी करार दे दिया गया वहीं दूसरे की कविता सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए उसके समर्थक वर्ग ने वाह वाह किया। ऐसा क्यों हुआ? अगर किसी एक सांसद को उग्रवादी कहने पर उसे लाक्षणिक रूप से एक समुदाय से जोड़ दिया गया तो फिर एक पूरे समुदाय को भरी संसद में "शोषक" घोषित कर देने को महिमामंडित क्यों किया गया? अगर रमेश विधूड़ी दोषी हैं तो मनोज झा निर्दोष कैसे हो सकते हैं?

इस सरल से सवाल का जवाब बहुत जटिल है। इसे जानने के लिए भारत में लंबे समय से चले आ रहे उस राजनीतिक विमर्श को परखना पड़ेगा जिसके तहत किसी एक समुदाय या फिर अलग अलग समुदाय की निंदा करना प्रगतिशीलता कही जाती है और समुदाय विशेष के बारे में कुछ भी बोल देने पर हंगामा हो जाता है। सारा विपक्ष राजनीतिक मतभेद भुलाकर उसके साथ खड़ा हो जाता है।
आरजेडी के कोटे से राज्यसभा सांसद मनोज झा का राजनीतिक इतिहास ऐसा नहीं है कि उनके किसी योगदान की चर्चा हो। दिल्ली यूनिर्सिटी में समाज विज्ञान पढ़ाते थे और 2018 में आरजेडी के कोटे से राज्यसभा पहुंच गये। लेकिन वैचारिक रूप से मनोज झा उस बुझी हुई बत्ती को संसद में फिर से जलाने का प्रयास जरूर करते रहते हैं जिससे वर्ग संघर्ष का रास्ता साफ साफ दृष्टिगोचर हो जाता है।
कहने की जरूरत नहीं कि वो राजनीति में साम्यवादी विचारधारा की बुझती लौ के आखिरी चश्मो चिराग बनकर टिमटिमाना चाहते हैं। संसद के भीतर सत्तर, अस्सी और नब्बे का वह स्वर्ण युग बीत चुका है जब साम्यवादी सांसद इतनी बड़ी संख्या में हुआ करते थे कि वो संसद के भीतर ही नहीं संसद के बाहर की राजनीतिक विचारधारा को भी नियंत्रित और निर्देशित किया करते थे। बदलते समय के साथ बुर्जुआ और सर्वहारा की उनकी बहुप्रचारित विचारधारा का 'आर्थिक सुधारों' की सुनामी में लोप हो गया।
इसके बाद भी लगातार मजबूत होती भाजपा को देखकर उन्होंने सांप्रदायिकता और फासीवाद जैसे जुमलों को बनाकर रखा लेकिन तथ्यहीन आरोप जब कोर्ट कचहरी में साबित नहीं होते तो समाज में भला कैसे स्थापित हो जाएंगे? बंगाल में ममता बनर्जी की आंधी में पहले ही अधिकांश कामरेड संसद के बाहर चले गये थे। 2014 में नरेन्द्र मोदी के विकासवादी उफान में न केवल ये दोनों जुमले बह गये बल्कि बचे खुचे कॉमरेड भी संसद से बहकर बाहर चले गये।
विचारधारा के तौर पर कम्युनिस्टों के कमजोर होते ही उन्होंने अपने वजूद को बचाये रखने का दूसरा रास्ता खोज निकाला। दूसरे दलों और संगठनों में प्रवेश कर जाओ। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में एसएफआई और आइसा जैसे संगठनों में सक्रिय रहनेवाले कॉमरेड अब जब बाहर निकलते हैं तो नयी जिम्मेदारी लेने अजय भवन और एके गोपालन भवन नहीं जाते। अब वो कांग्रेस और अन्य समाजवादी कहे जानेवाले दलों की ओर रुख करते हैं जो घोषित तौर पर जाति की राजनीति करते हैं। वर्ग संघर्ष के अपने बुनियादी सिद्धांत को अमल में लाने के लिए इससे बेहतर जगह उनके लिए भला और हो भी क्या सकती है?
इसलिए ठीक ठीक कहा जाए तो कॉमरेड इस समय राजनीतिक बहुरूपिये बन गये हैं। वो गांधीवादियों के बीच गांधीवादी हैं, समाजवादियों के बीच समाजवादी हैं, कांग्रेसियों के बीच कांग्रेसी हैं और बौद्धिक बिरादरी में सेकुलर लिबरल का जामा तो ओढे ही हुए हैं। लेकिन यह सब होते हुए भी वो भीतर से वही हैं जिसकी सघन वैचारिक ट्रेनिंग ले चुके हैं। वो वर्ग संघर्ष के उसी बुनियादी सिद्धांत को अब अलग-अलग मंचों से पुश करते हैं जिसकी बात करते करते कम्युनिस्ट पार्टियां भारत में अप्रासंगिक हो गयीं।
वर्ग संघर्ष के लिए जरूरी होता है कि वर्ग विभाजन सुनिश्चित किया जाए। भारत के कम्युनिस्टों ने बहुत मेहनत से यह वर्ग विभाजन चिन्हित किया है। इसमें मोटे तौर पर दो वर्ग हैं। एक जातीय वर्ग और दूसरा धार्मिक वर्ग। यह भी भारत के कम्युनिस्ट युग का एक कटु सत्य रहा है कि समाज में बुर्जुआ और सर्वहारा के दो बुनियादी समूह माननेवाले कम्युनिस्टों ने यहां मॉइनॉरिटी और मेजोरिटी के सिद्धांत को माना। जो मॉइनॉरिटी है वह अपने आप शोषित है और जो मेजोरिटी है वह अपने आप शोषक। इसी सिद्धांत पर वो बहुसंख्यक हिन्दुओं को शोषक तथा अल्पसंख्यक मुस्लिमों को शोषित वर्ग घोषित करते हैं।
परंतु अगर इसी सिद्धांत को जातियों के विभाजन पर लागू करें तो? फिर तो वह ब्राह्मण, ठाकुर, लाला ही सबसे बड़ा शोषित पाया जाएगा जिसे मनोज झा जैसे बहुरुपिये कॉमरेड संसद में खड़े होकर शोषक घोषित कर रहे हैं? लेकिन जब वो जातियों पर आते हैं तो अपने ही बनाये सिद्धांत को पलट देते हैं। जातियों में जो अल्पसंख्यक है वो शोषक हो जाता है तथा जो बहुसंख्यक है वो शोषित बना दिया जाता है। वो अपने ही बनाये सिद्धांतों को अपनी सुविधा अनुसार अलग अलग वर्गों पर अलग अलग प्रकार से लागू करते हैं।
इस मतिभ्रम के कारण ही उन्हें या उनके वैचारिक धरातल पर राजनीति करनेवालों को दानिश अली शोषित दिखते हैं जिसके लिए राजनाथ सिंह माफीनामे का प्रस्ताव तक कर देते हैं। लेकिन कोई मनोज झा जब 'ठाकुर' जैसे जातिवादी शब्द का इस्तेमाल करते हुए एक जाति पर हमला करते हैं तो वही राजनाथ सिंह यह भी नहीं कह पाते कि ऐसी अशोभनीय टिप्पणी के लिए मनोज झा को माफी मांगनी चाहिए। उन्हें डर होगा कि ऐसा कहने भर से उनका शोषक होना सिद्ध हो जाएगा।
यही वो विरोधाभास है जिसे भारत के लोकतंत्र में 75 वर्षो में स्थापित किया गया है। हम सब इस विरोधाभास को स्वीकार कर चुके हैं, इसलिए हमें रमेश विधूड़ी तो दोषी नजर आते हैं लेकिन मनोज झा प्रगतिशील विचार के वाहक बताकर निर्दोष करार दे दिये जाते हैं। जबकि दोनों अलग अलग संदर्भों में वही काम कर रहे हैं। संसद में खड़े होकर भारत के किसी न किसी समुदाय या जाति विशेष पर राजनीतिक हमला।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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