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Collegium System: कोलिजियम व्यवस्था के खिलाफ अब भीतर से ही उठी आवाज

Collegium System: सोमवार 17 जुलाई को दिल्ली हाईकोर्ट में अजीब घटना हुई, जब हाईकोर्ट की बार एसोसिएशन ने सुप्रीमकोर्ट कोलिजियम के खिलाफ हड़ताल कर दी| जबसे कोलिजियम सिस्टम शुरू हुआ है, उसके बाद से यह पहली घटना है, जब कोलिजियम के खिलाफ बार एसोसिएशन ने बगावत का झंडा उठाया हो| हुआ यह कि सुप्रीमकोर्ट कोलिजियम ने 12 जुलाई को तीन अलग हाईकोर्ट के तीन जजों का ट्रांसफर किया था| इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस दिनेश कुमार सिंह को केरल हाईकोर्ट, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस मनोज बजाज को इलाहाबाद हाईकोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस गोरांग कंठ को कलकत्ता हाईकोर्ट में ट्रांसफर किया गया था| तीनों जजों ने अपनी ट्रांसफर का विरोध किया|

जस्टिस बजाज ने कहा कि उन्हें चंडीगढ़ में ही रहने दिया जाए, उनकी ट्रांसफर का कोई कारण नहीं है| इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस दिनेश कुमार सिंह ने अनुरोध किया कि उन्हें दिल्ली, पंजाब, राजस्थान या मध्य प्रदेश जैसे उत्तर प्रदेश के करीबी राज्यों में से किसी में ट्रांसफर कर दिया जाए| दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस कंठ ने मध्य प्रदेश या राजस्थान या किसी अन्य पड़ोसी राज्य के हाईकोर्ट में ट्रांसफर का अनुरोध किया| लेकिन कोलिजियम ने तीनों के आग्रह को ठुकरा दिया| जस्टिस दिनेश कुमार सिंह और जस्टिस गोरांग कंठ बहुत ही तेजी से काम करने वाले जज माने जाते हैं, इन दोनों ने जल्द फैसले करने का रिकार्ड बनाया है, इसलिए दोनों अपने हाईकोर्टों में बहुत ही लोकप्रिय हैं|

Now the voice against the Collegium system has been raised from internal

जस्टिस दिनेश कुमार सिंह की छवि एक ऐसे जज की है, जिन्‍होंने माफियाओं के खिलाफ सख्‍त फैसले सुनाए हैं| हाल ही में उनकी सबसे ज्‍यादा चर्चा माफिया मुख्‍तार अंसारी और उसकी गैंग के खिलाफ सख्‍त आदेश पारित करने से हुई है| माफिया मुख्तार अंसारी को 22 सितंबर 2022 से 29 अप्रैल 2023 के बीच चार मामलों में सजा मिल चुकी है| 22 सितंबर 2022 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने मुख्तार को सात साल की सजा सुनाई थी, ठीक अगले ही दिन 23 सितंबर को जस्टिस दिनेश कुमार सिंह की अदालत ने गैंगस्टर मामले में पांच साल की सजा सुना दी थी| जस्टिस दिनेश सिंह ने मुख्‍तार अंसारी की वह अपील भी ठुकरा दी थी जिसमें उसने जेल में विशिष्‍ट सुविधाओं की मांग की थी|

Now the voice against the Collegium system has been raised from internal

सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस और कोलिजियम के अध्यक्ष जस्टिस डी. वाई. चन्द्रचूड सुप्रीमकोर्ट आने से पहले तीन साल तक इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रहे हैं। वह अच्छी तरह जानते हैं कि वहां के जज गैंगस्टरों को सजा देने से कितना घबराते थे| 2012 में इसी इलाहाबाद हाईकोर्ट के दस जजों ने अतीक अहमद की जमानत याचिका पर सुनवाई से किनारा कर लिया था, ग्यारहवें जज ने सुनवाई की, तो जमानत दे दी थी|

उत्तर प्रदेश में गैंगस्टरों का आतंक खत्म करने में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलावा जिन प्रमुख जजों की भूमिका है, उनमें से दिनेश कुमार सिंह भी हैं। फिर सुप्रीम कोर्ट कोलिजियम द्वारा उनकी ट्रांसफर का क्या कारण हो सकता है| दिनेश कुमार सिंह एक लोकप्रिय जज हैं, अगर वह कोलिजियम के तानाशाहीपूर्ण ट्रांसफर के खिलाफ इस्तीफा देने का फैसला करते हैं, तो यह कोलिजियम के खिलाफ न्यायपालिका के भीतर से ही बगावत होगी|

वैसे बगावत दिल्ली में हो गई है| दिल्ली से कोलकाता ट्रांसफर किए गए जस्टिस गौरांग कंठ भी दिनेश कुमार सिंह की तरह लोकप्रिय हैं। वह सिर्फ एक साल पहले दिल्ली हाईकोर्ट के जज बने हैं| जब कोलिजियम ने किसी नजदीकी हाईकोर्ट में ट्रांसफर की उनकी अर्जी ठुकरा दी, तो दिल्ली हाईकोर्ट की बार एसोसिएशन ने सर्वसम्मति से उनकी ट्रांसफर के खिलाफ 17 जुलाई को हड़ताल और कोलिजियम के खिलाफ प्रदर्शन का फैसला किया|

हालांकि केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति से इजाजत मिलने के बाद 15 जुलाई को तीनों जजों की ट्रांसफर का नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया था, इसके बावजूद दिल्ली हाईकोर्ट के वकीलों ने कोलिजियम के खिलाफ हड़ताल की| इतना ही नहीं बल्कि दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट के वकीलों ने भी हड़ताल रखी| कहा जा रहा है कि उनके खिलाफ कोई शिकायत तब की है, जब वह वकालत करते थे, तो फिर सवाल सुप्रीमकोर्ट कोलिजियम पर ही उठता है कि उनकी जज के रूप में नियुक्ति के समय कोलिजियम ने ठीक से जांच पड़ताल क्यों नहीं करवाई थी|

प्रशांत भूषण यह शिकायत लेकर सुप्रीमकोर्ट पहुंचे कि कोलिजियम के फैसले के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में काम नहीं हो रहा| इस पर सुप्रीमकोर्ट ने बार कौंसिल आफ इंडिया के अध्यक्ष मनन मिश्रा से कहा है कि अदालत को वकीलों की हड़तालों का रिकार्ड उपलब्ध करवाया जाए| क्योंकि दिल्ली हाईकोर्ट के वकीलों की हड़ताल सुप्रीमकोर्ट कोलिजियम के खिलाफ है, इसलिए तमतमाए सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि अगर डाक्टरों की हड़ताल अनैतिक है, तो वकीलों की हड़ताल भी अनैतिक होगी|

कोलिजियम के अध्यक्ष के रूप में विवादास्पद भूमिका के साथ साथ चीफ जस्टिस डी. वाई. चन्द्रचूड की कई मामलों में व्यक्तिगत दिलचस्पी भी इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है| इनमें से एक मामला तीस्ता सीतलवाड़ की जमानत याचिका का हाल ही में चर्चा में आया| पहली जुलाई को गुजरात हाईकोर्ट ने तीस्ता सीतलवाड की जमानत रद्द करके उन्हें पेश होने को कहा था| शाम साढ़े छह बजे के करीब जब यह फैसला आया तो उस समय चीफ जस्टिस डी.वाई. चन्द्रचूड और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता सुप्रीम कोर्ट के जज केवी विश्वनाथन की बेटी सुवर्णा विश्वनाथन का चिन्मय मिशन में चल रहा भरतनाट्यम नृत्य देख रहे थे|

कपिल सिब्बल गुजरात हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ उसी समय करीब छह बजे सुप्रीमकोर्ट पहुंचे थे| शाम 6.30 बजे जस्टिस एएस ओका और प्रशांत कुमार मिश्रा के समक्ष विशेष सुनवाई होनी थी| उसी समय चिन्मय मिशन में ही कार्यक्रम देख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को सुनवाई के बारे में बताया गया| वह तुरंत गुजरात सरकार की ओर से सीतलवाड़ की अंतरिम जमानत के खिलाफ बहस करने के लिए कार्यक्रम से उठकर चले गए|

सुनवाई के अंत में दोनों जजों की राय अलग-अलग थी और मामले को तीन जजों की बड़ी पीठ के पास भेजने का फैसला लिया गया| स्वाभाविक है कि अगले दिन बेंच बैठती, लेकिन चिन्मय मिशन में कार्यक्रम देख रहे चीफ जस्टिस तुरंत फोन पर सक्रिय हो गए, उन्हें फोन कान पर लगाए कार्यक्रम से बाहर जाते देखा गया| अब यह रहस्य है कि उनके साथ फोन पर कौन बात कर रहा था|

इस बीच, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता भरतनाट्यम कार्यक्रम में लौट आए थे, क्योंकि उन्हें लगा कि बेंच अब अगले दिन बैठेगी| लेकिन नृत्य का प्रदर्शन खत्म होने और मौजूद लोगों के जाने के बाद चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने वहीं पर मौजूद जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एएस बोपन्ना को बड़ी बेंच का हिस्सा बना कर तुरंत जाकर सुनवाई करने का आग्रह किया, जिस पर वे चिन्मय मिशन से सीधे सुप्रीमकोर्ट रवाना हो गए|

जस्टिस बी आर गवई, जस्टिस ए एस बोपन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की विशेष पीठ ने देर रात साढ़े आठ बजे सुनवाई शुरू की और गुजरात सरकार को नोटिस जारी करते हुए तीस्ता सीतलवाड़ को राहत दे दी| हालांकि कपिल सिब्बल चाहते थे कि सुनवाई अगस्त में की जाए, लेकिन बेंच ने अगले महीने अन्य मामले की सुनवाई में व्यस्तता के चलते 19 जुलाई की ही तारीख तय कर दी| तीस्ता सीतलवाड़ को राहत देने के लिए देर रात सुप्रीमकोर्ट के दरवाजे खुलना देश में चर्चा का विषय बना हुआ है, क्योंकि यही सुप्रीमकोर्ट तीस्ता सीतलवाड़ के खिलाफ झूठे मुकद्दमों के षड्यंत्र रचने की टिप्पणी कर चुका है|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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