Interim Budget 2024: अंतरिम बजट में किसी के लिए कुछ खास नहीं
आम जनता को उम्मीद थी कि चुनाव से ठीक पहले पेश होने वाले अंतरिम बजट में सरकार राहत उपायों के साथ-साथ नौकरी पेशा मध्य वर्ग को भी लुभाने का प्रयास करेगी, लेकिन टैक्स स्लैब में कोई परिवर्तन नहीं कर सरकार ने उनकी आशाओं पर पानी फेर दिया है।
हालांकि केंद्र की सत्ता पर अपनी तीसरी पारी को लेकर आश्वस्त मोदी सरकार ने अंतरिम बजट में गरीब, महिला, अति पिछड़ावर्ग, अन्नदाता किसान को आगे कर अगले 5 साल में 2 करोड़ नए घर, 3 करोड़ लखपति दीदी तैयार कर वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बना देने का दावा किया है।

वर्ष 2019 के अंतरिम बजट में आयकरदाताओं को थोड़ी सहूलियत मिली थी। चुनावी साल होने के कारण इस बार भी लोगों को राहत की उम्मीद थी। वित्तमंत्री ने अंतरिम बजट में छूट न देने की परंपरा को रेखांकित करते हुए बदलाव नहीं करने की बात तो कही लेकिन लगे हाथों कॉरपोरेट टैक्स को 30% से घटाकर 22% कर दिया। मार्च 2025 तक सोवरेन फंड्स पर टैक्स छूट बढ़ा दी है, साथ ही साथ स्टार्टअप्स के लिए टैक्स छूट का दायरा भी बढ़ाया गया है।
चूंकि यह बजट आसन्न लोकसभा चुनाव की चुनौतियों के ठीक पहले पेश किया गया है इसलिए इसका फोकस और लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट दिखता है और इसमें भ्रम की कोई स्थिति नहीं दिखती। अपनी अगली पारी को लेकर पूरी तरह से तैयार मोदी सरकार ने 2047 तक के विकसित भारत के लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ने के रोडमैप को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है, और बजट के अधिकतर प्रावधान इसी लक्ष्य की पूर्ति के प्रयास जैसे हैं। चाहे बजट का आकार हो या प्रावधानों के प्रकार दोनों का फोकस इसी बात पर है कि अर्थव्यवस्था को रफ्तार कैसे दी जाए? और शासन सत्ता में बने रहने के लिए समाज के बड़े समूह को कैसे साध कर रखा जाए?
चुनावी लिहाज के हिसाब से महिलाओं, युवाओं, किसानों और गरीब तबके की बड़ी आबादी को जोड़े रखने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। इस क्रम में अगले 5 साल में 2 करोड़ नए मकानों का निर्माण, छत पर सौर प्रणाली लगाने से सीधे एक करोड़ परिवारों को जोड़ने का वादा, ज्यादा मेडिकल कॉलेज खोलने के लिए शीघ्र समिति का गठन, सर्वाइकल कैंसर से निपटने के लिए टीकाकरण पर जोर, आयुष्मान भारत योजना से आशा कार्यकर्ताओं, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायकों को जोड़ने, पशुओं को बीमारी से बचाने, मत्स्य उत्पादन के निर्यात बढ़ाने, 3 करोड़ लखपति दीदी तैयार करने को प्राथमिकता दी गई है।
इसके साथ ही अंतरिम बजट 2024 में वित्त मंत्री ने रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को आगे बढ़ाने का दावा किया है। साल 23-24 का रक्षा बजट 6.02 लाख करोड रुपए था जो वर्ष 22- 23 की तुलना में 13% अधिक था, इस बार यह बढ़कर 6.2 लाख करोड़ हो गया है, यानी रक्षा के क्षेत्र में 3.4% की बढ़ोतरी हुई है।
वहीं सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के बजट में भी वृद्धि करते हुए 2.78 लाख करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है। इसी तरह वित्त वर्ष 2023 में रेलवे बजट 2.4 लाख करोड रुपए का था इस बार इसे बढ़ाकर 2.55 लाख करोड़ रुपए कर दिया गया है। अंतरिम बजट में तीन बड़े रेलवे कॉरिडोर की घोषणा हुई है तथा यह भी कहा गया है कि 40000 रेलगाड़ी डिब्बों को वंदे भारत ट्रेन में बदला जाएगा।
बुनियादी उपभोक्ता आंदोलन को गति देने के लिए एक विशिष्ट विभाग की आवश्यकता के दृष्टिकोण से जून 1997 में एक अलग विभाग के रूप में गठित उपभोक्ता मामले और खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय को अंतरिम बजट में 2.3 लाख करोड रुपए आवंटित किए गए हैं। गृह मंत्रालय के बजट में भी वृद्धि करते हुए पूर्व के 1.96 लाख करोड रुपए की जगह अबकी बार 2.03 लाख करोड रुपए आवंटित किए गए हैं।
इसी तरह ग्रामीण विकास मंत्रालय में भी 1.57 लाख करोड रुपए की जगह अंतरिम बजट में 1.7 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। रसायन और उर्वरक मंत्रालय को 1.68 लाख करोड़ रुपए, संचार मंत्रालय को 1.37 लाख करोड़ रुपए तथा किसान कल्याण मंत्रालय को 1.27 लाख करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं।
बजट में बुनियादी संरचना पर सरकारी निवेश में वृद्धि की गई है, जो कि सही दिशा में है। वित्त मंत्री को आशा है कि कैशलेस इकोनॉमी से टैक्स की वसूली और अधिक बढ़ेगी, लेकिन हमें ठहर कर यह सोचना होगा कि अंतत यह भार आम आदमी पर ही पड़ेगा। पहले उपभोक्ता नगद में माल खरीद कर उस पर टैक्स अदा करने से बचता था, अब उसी पर टैक्स देगा। वित्त मंत्री ने परंपरा का हवाला देकर आयकर में कोई राहत तो नहीं दी है लेकिन आने वाले समय में टैक्स बढ़ाने की खिड़की खुली छोड़ रखी है।
वित्त मंत्री विदेशी निवेश को लेकर कुछ अधिक उत्साहित हैं। इसी के भरोसे उन्होंने इसमें आगे और वृद्धि की आशा भी व्यक्त की है। यह आकलन गलत भी हो सकता है। वर्तमान वैश्विक वातावरण विदेशी निवेश के प्रतिकूल है। बजट का अनुत्तरित प्रश्न है कि निवेश कहां से आएगा? घरेलू मांग के अभाव में निजी निवेश दबा रहेगा। सरकारी निवेश में वृद्धि अवश्य लाभकारी रहेगी। क्योंकि निवेश ही ग्रोथ का असली इंजन होता है। अतः ग्रोथ के कम बने रहने की आशंका अधिक है।
बजट में कुछ अच्छी घोषणाएं हैं पर उनसे हमें व्यापक स्तर पर यह उम्मीद नहीं बढ़ती कि लोगों की आजीविका व आय में सुगमता बढ़ जाएगी। ग्रोथ विद जॉब्स यानी रोजगार युक्त उत्पादन की अनुकूलता परिलक्षित नहीं होती। सरकार को बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन तथा अर्थव्यवस्था को स्थिरता व मजबूती देने पर केंद्रित होना चाहिए था। मालूम हो कि एनडीए सरकार के आरंभिक दौर में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कम कीमतों के कारण अर्थव्यवस्था को बहुत अनुकूल स्थिति मिली हुई थी। लेकिन 'सब दिन रहे ना एक समाना' और आयात निर्यात की परिस्थितियां कब अनुकूल से प्रतिकूल हो जाए कहा नहीं जा सकता।
ऐसे में वैसी अनुकूल स्थितियां भले ही हमारे हाथ में ना हो, पर अपनी घरेलू नीतियों से तो हम देश की जनता को राहत दे ही सकते हैं। किसानों ने भी बजट से बड़ी उम्मीद की थी लेकिन बहुत हद तक उनके हिस्से भी निराशा ही आई है। पहले से मिलती आ रही किसान सम्मान निधि की बात अगर छोड़ दें तो इस अंतरिम बजट में किसानों के लिए शून्य हासिल है।
किसानों की आय दोगुनी करने के दावे किए जा रहे थे लेकिन उनकी आय आधी रह गई है। किसान की समस्या है उत्पादन का उचित दाम न मिलना। जब देश में कृषि उत्पादों के दाम ऊंचे होते हैं तो सरकार आयात करके किसानों को मारती है। वही जब विश्व बाजार में दाम ऊंचे होते हैं तो निर्यातों पर प्रतिबंध लगाकर सरकार किसान को ऊंचे मूल्य का लाभ उठाने से वंचित करके फिर मारती है। सरकार को इस नीति में बदलाव करना चाहिए था, लेकिन सरकार यहां भी चूक गई।
बजट को समग्रता से देखने पर पता चलता है कि सरकार पूंजीगत व्यय के जरिए अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने की कोशिश कर रही है, इसलिए कुल व्यय में पूंजीगत व्यय की हिस्सेदारी को बढ़ाया है। वित्त मंत्री ने राजकोषीय घाटे को भी 5.1 प्रतिशत तक नियंत्रित रखने का दावा किया है। इस साल जुलाई में प्रस्तुत किए जाने वाले पूर्ण बजट के पहले का यह अंतरिम बजट संकेत दे रहा है कि आगे भी बजटीय प्रावधानों का आकार बड़ा होगा। इससे अर्थव्यवस्था को कितना फायदा पहुंचेगा यह तो आने वाले समय में पता चलेगा।
हालांकि समय पर उठाए गए कुछ कदम और नीतिगत निर्णय से हमारी अर्थव्यवस्था कई अन्य देशों की तुलना में बेहतर रही है। मैन्युफैक्चरिंग, पीएमआई, औद्योगिक उत्पादन, जीएसटी संग्रह जैसे प्रमुख संकेतक संतोष जनक स्तर पर बने हुए हैं।
इन्हीं सब को आधार मानकर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष भी भारतीय अर्थव्यवस्था की ग्रोथ और इसके ग्लोबल इकॉनमी का विकास इंजन बनने को लेकर आशान्वित दिख रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा मे उत्साहित कदमों से बढ़ रहा है, लेकिन घरेलू मोर्चे पर अंतरिम बजट से मध्य वर्ग और किसानों को फिलहाल निराशा ही हाथ लगी है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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