Fugitive Nirav Modi: आसान नहीं है भगोड़े नीरव मोदी को भारत लाना
Fugitive Nirav Modi: करीब पॉंच साल से देश से बाहर रह रहा सेलिब्रिटी भगौड़ा नीरव मोदी एक बार फिर खबरों में है। देश के लिए अच्छी और नीरव के लिए बुरी यह खबर लंदन के हाईकोर्ट के फैसले से संबंधित है। कोर्ट ने भारत में अपना प्रत्यर्पण रोकने की नीरव की अपील को खारिज कर दिया है, जिससे उसे वापस लाने का भारतीय जॉंच एजेंसियों का काम पूरी तरह तो नहीं, लेकिन कुछ हद तक आसान हो गया है।

पंजाब नेशनल बैंक से दो अरब डॉलर की धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों का सामना कर रहा डायमंड किंग नीरव मोदी फिलहाल, लंदन की वैंड्सवर्थ जेल में है। नीरव उन लोगों में से है, जो यह मानते हैं कि अपने पैसे की ताकत और तिकड़मी दिमाग के बल पर कानून को मनचाहे ढंग से अपने पक्ष में चलने के लिए मजबूर किया जा सकता है। अगर ऐसा न होता तो सीबीआई या ईडी को उसे वापस लाने के लिए इतने पापड़ न बेलने पड़ते।
नीरव मोदी कौन है?
27 फरवरी 1971 को गुजरात के जामनगर में जन्मे नीरव मोदी को भारत का लॉरेंस ग्रेफ, इंटरनेशनल हीरा कारोबारी, भी कहा जाता है। वह क्रिस्टी और सदबी कैटलॉग के कवर पर छपने वाला पहला भारतीय ज्वैलर है। कई पीढ़ियों से हीरों के कारोबार से जुड़े परिवार से ताल्लुक रखते नीरज का शुरुआती जीवन बेल्जियम के एंटवर्प में गुजरा।
लेकिन जब वह 19 साल का हुआ तो अपने चाचा के साथ काम करने के लिए मुंबई आ गया। यहॉं पर उसने व्हार्टन स्कूल में पढाई की, और फिर आगे पढ़ने के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेंसिल्वेनिया में एडमिशन लेकर अमेरिका चला गया।
डायमंड कारोबार से जुड़े सभी पहलुओं में प्रशिक्षण लेने के बाद उसने 1999 में फायरस्टोन की स्थापना की, जिसे अब फायरस्टार के नाम से जाना जाता है। 2002 में उसने कॉन्ट्रेक्ट के आधार पर आभूषण बनाने शुरू कर दिये।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीरव मोदी चर्चा में तब आया जब उसने 2005 में फ्रेडिरक गोल्डमैन और 2007 में सैंडबर्ग, सिकोरस्की तथा ए. जेफ जैसी नामचीन कंपनियों पर अपना अधिकार कर लिया। 2010 में उसने डिजाइन हीरों का पहला स्टोर दिल्ली में खोला और दूसरा मुंबई में। देखते ही देखते उसने देश भर में करीब 17 स्टोरों की श्रंखला निर्मित कर ली।
2013 में उसे भारतीय अरबपतियों की फोर्ब्स सूची में शामिल किया गया और कई साल तक वह उसमें बना रहा। उसके पतन की शुरुआत हुई चार साल पहले, जब देश के लोगों को पता चला कि उसके जगमगाते साम्राज्य के इमारत की नींव कितने काले कारनामों पर टिकी है।
बहुत उतार-चढ़ावों से भरा है नीरव मोदी का केस
इस पूरे मामले की शुरुआत हुई थी, जनवरी 2018 में। 29 जनवरी को राष्ट्रीयकृत बैंक पीएनबी ने नीरज मोदी, मेहुल चौकसी और कुछ लोगों के खिलाफ पुलिस में दो अरब अमेरिकी डॉलर की धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज करायी थी। तब पता चला कि नीरव मोदी तो एक तारीख को ही देश से बाहर भाग चुका है।
एक सप्ताह बाद इस घोटाले की जॉंच केंद्रीय जॉंच ब्यूरो को सौंप दी गयी। इधर सीबीआई अपना काम कर रही थी, उधर प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी ने अपनी कार्रवाई शुरू कर दी और 16 फरवरी को उसके घर से करीब करोड़ों रुपये के डायमंड, गोल्ड और ज्वेलरी आदि बरामद किये।
अगले ही दिन सीबीआई इस मामले में पीएनबी के दो कर्मचारियों और नीरव मोदी ग्रुप के एक अधिकारी को गिरफ्तार कर लिया। 21 तारीख को फिर से उसकी कंपनी पर दबिश देते हुए सीबीआई ने चीफ फायनेंस ऑफिसर और दो अन्य सीनियर अधिकारियों को गिरफ्तार किया। साथ ही, उसके अलीबाग स्थित फॉर्म हाउस को भी सील कर दिया गया।
अगले दिन ईडी ने नीरव और उसकी कंपनी के नाम से खरीदी गयीं नौ बेशकीमती कारें जब्त कीं। 27 फरवरी 2018 को अदालत ने नीरव के खिलाफ बेलेबल अरेस्ट वारंट जारी कर दिया। सरकार की ओर से इस धोखाधड़ी को लेकर नीरव और मेहुल के पासपोर्ट पर पहले ही चार सप्ताह के लिए रोक लगायी जा चुकी थी।
चार महीने बाद, 2 जून को इंटरपोल द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग के लिए नीरव के खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया गया। और 25 तारीख को उसके प्रत्यर्पण के लिए ईडी ने मुंबई की एक विशेष अदालत से सम्पर्क किया। 3 अगस्त को भारत सरकार ने ब्रिटिश अथॉरिटी को नीरव के प्रत्यर्पण के लिए लिखित अनुरोध भेजा।
20 अगस्त को उसके लंदन में देखे जाने की सूचना मिलने के बाद सीबीआई ने इंटरपोल से अनुरोध किया कि उसे हिरासत में लिया जाये। 27 दिसंबर को भारत को आधिकारिक रूप से नीरव मोदी के ब्रिटेन में रहने की सूचना दी गयी, जिसकी पुष्टि अगले साल 9 मार्च को ब्रिटेन के अग्रणी दैनिक टेलीग्राफ द्वारा भी की गयी।
ईडी ने देरी न करते हुए उसी दिन जानकारी दी कि ब्रिटिश सरकार ने उसके प्रत्यर्पण का अनुरोध आगे की प्रक्रिया के लिए ब्रिटेन के वेस्टमिंस्टर कोर्ट को भेज दिया है। 18 मार्च को कोर्ट ने उसके खिलाफ अरेस्ट वारंट जारी कर दिया और दो दिन बाद उसे गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया गया। उसने जमानत पाने की कोशिश की, लेकिन उसकी अपील नामंजूर हो गयी और उसे 29 मार्च तक के लिए लंदन की वेंड्सवर्थ जेल भेज दिया गया।
नीरव बार-बार जमानत की अर्जी देता रहा और बार-बार उसकी अपील खारिज होती रही। 22 अगस्त को उसकी हिरासत फिर से 19 सितंबर तक के लिए बढ़ा दी गयी और 6 नवंबर 2019 को छठी बार उसकी जमानत की अपील को खारिज किया गया।
आखिरकार, 11 मई को पीएनबी मामले में उसके प्रत्यर्पण की सुनवाई शुरू हुई और दो दिन बाद भारत ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में भी उसके खिलाफ साक्ष्य जमा कराये। 1 दिसंबर को उसकी हिरासत बढ़ा दी गयी। अदालत ने 25 फरवरी 2021 को फैसला सुनाया कि उसे फ्रॉड और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों का सामना करने के लिए भारत प्रत्यर्पित किया जा सकता है।
इस फैसले के खिलाफ नीरव ने 1 मई को लंदन हाईकोर्ट में अपील की, जिस पर 28 जून 2022 को सुनवाई शुरू की गयी। हाईकोर्ट ने 12 अक्टूबर को इस अपील पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था, जिसे कल अंतिम रूप देते हुए नीरव की अपील को खारिज कर दिया गया।
नीरव को भारत लाना अभी भी दूर
हालांकि अभी भी भारत के लिए उसे लंदन की वैंड्सवर्थ जेल से मुंबई की ऑर्थर रोड जेल में लाना बहुत आसान नहीं होगा। अभी भी उसके सामने प्रत्यर्पण से बचने या इसे लंबित करने के लिए कई विकल्प मौजूद हैं। उसके जैसा शातिर आदमी बचने का कोई भी रास्ता चुनने में कोताही नहीं बरतेगा।
अब सारा दारोमदार लंदन हाईकोर्ट पर है कि क्या वह उसे दूसरे विकल्पों का सहारा लेने की छूट देती है। अगर कोर्ट ने उसके मामले को आम सार्वजनिक महत्व के कानून के अंतर्गत माना तो वह चौदह दिनों के भीतर सर्वोच्च न्यायालय की शरण में जा सकता है।
अदालती विकल्प न चुन पाने की स्थित में वह यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमैन राइट्स से हस्तक्षेप की अपील कर सकता है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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