Nomadic Tribes: कब तक अपमानित और प्रताड़ित होती रहेंगी घूमंतू जातियां?
Nomadic Tribes: मध्य प्रदेश के छत्तरपुर में कंजर बस्ती में रहने वाले संतोष राज (नाम परिवर्तित) और कर्नाटक के हुबली में डीएनटी सेटलमेंट में रहने वाले घंटीचोर समाज के मुरली दत्तावार की कहानी समाचार पत्र में प्रकाशित हुई है। दोनों ही समाज के लोगों का दर्द एक जैसा है कि आस-पास के क्षेत्रों में कहीं कोई अपराध हो तो पुलिस बिना किसी जांच के सबसे पहले उनकी बस्ती से लोगों को उठा कर ले जाती है।
21वीं सदी के भारत में इस बात पर विश्वास करना थोड़ा कठिन है लेकिन यह सच है कि इस देश में सौ से अधिक समुदाय इस तरह के हैं, जिनके लिए खाकी वर्दी सुरक्षा नहीं, भय का पर्याय है। बिहार में माड़वारी बौरिया, धारी, ढेकरु, मघहिया डोम, छकई दूसाध, मघइया दूसाध, दोहाल, करवाल, नट और मुसहर, दिल्ली के सांसी और बावरिया, राजस्थान में बावरी, कंजर, सांसी, मीना, भील, बंजारा, बागरी, मोंगिया नट, नाईक, मुल्तानी, भाट, मुसहर, नट, ओढ़िया, पलवर, तागा, मध्य प्रदेश के बैरागी, मोघिया, बिजोरिया, कर्नाटक में घंटीचोर, हांडीजोगी, कपमार, वोड्डर आदि। इन समुदायों में पैदा होते ही व्यक्ति आधा गुनाहगार मान लिया जाता है।

विमुक्त समाज के अधिकारों के लिए लंबे समय से संघर्षरत प्रोफेसर गणेश देवी कहते हैं - "मैं नहीं जानता कि पुलिस की ट्रेनिंग अकादमियों में नए रंगरुटों को यह बताया जाता होगा कि कुछ जातियां अपराधी ही पैदा होती हैं और अपराध उनके स्वभाव और अभ्यास में होता है लेकिन यह दावे के साथ कह सकता हूं कि गुनाहगार जमात का कानून पुलिस पाठयक्रम का हिस्सा है, जिस पर लंबी चर्चाएं होती हैं।"
अंग्रेजों की दुश्मन थी घुमंतू जातियां
हाल ही में इस लेखक की ऑल इंडिया डिनोटिफाइड एंड नोमैडिक ट्राइव्स ऑर्गेनाइजेशन के अध्यक्ष लक्ष्मण गायकवाड़ से उनके मुम्बई स्थित आवास पर लंबी बातचीत हुई थी। इस बातचीत के दौरान उन्होंने कई चौंकाने वाले तथ्यों को सामने रखा। गायकवाड़ के अनुसार अंग्रेजों ने उन्हीं जातियों को इस देश में गुनाहगार बताया, जिनसे उन्हें सबसे अधिक खतरा था और जो जातियां उन्हें कड़ी टक्कर दे सकती थीं। इसलिए इन जातियों के लोगों को वर्ष 1911 में समुद्र में ले जाकर डुबाने की योजना बन चुकी थी लेकिन इंग्लैंड में बैठे इनके आकाओं ने इस नरसंहार को रोका।
गायकवाड़ के अनुसार इसी के परिणाम स्वरूप 1913 में देश के विभिन्न हिस्सों में सेटलमेन्ट (घुमंतू जातियों के लोगों की जेल) बने, जिनमें उन समुदायों के लोगों को चुनचुन कर डाला गया, जिनसे अंग्रेजों को खतरा हो सकता था। इन्हीं लोगों को बाद में पुल, सड़क और रेल निर्माण के काम में लगाया गया। हैदराबाद का निजामसागर इसी समुदाय के लोगों द्वारा तैयार किया गया था। गायकवाड़ के अनुसार मुम्बई का कमाठीपुरा इसी समुदाय के लोगों की जगह थी। बताया जाता है, शोलापुर स्थित सेटलमेन्ट मुम्बई प्रेसीडेन्सी में बने सेटलमेन्ट में सबसे बड़ा था।
घुमंतू समुदाय से आने वाले सितप्पा गायकवाड़ शोलापुर सेटलमेंट में मिले थे। उन्होंने याद करके बताया- "अंग्रेजों के जमाने में शोलापुर सेट्लमेन्ट में नौ जमात के लोग रहते थे, टकारी, कैकाड़ी, पामालारे, बेस्तर, कंजर, छप्परबंद, मांग, गाडूरी, पारधी और राजपूत भामटा। ये सभी समुदाय के लोग आन्ध्र प्रदेश से महाराष्ट्र आए थे।"
शोलापुर, बारामती, सतारा, पुणे और मुम्बई में इस समाज के बुजुर्गों से हुई बातचीत से यह जानकारी मिली कि जिन्हें अंग्रेजों ने अपराधी जातियों की संज्ञा दी, वास्तव में वे जातियां लड़ने और भिड़ने वाली जातियां थीं। उनके ऊपर समाज की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी। कुछ समुदाय के लोग नाच-गाकर लोगों का मनोरंजन करते थे, उससे मिले अनाज से अपने परिवार का गुजारा करते थे। मराठी में प्रसिद्ध पुस्तक 'पारधी' लिखने वाले गिरिश यशवंत प्रभूणे की राय भी लगभग यही है।
वे कहते हैं- "ये जातियां गुनाहगार नहीं थीं। अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाली जातियां थीं। इनमें एक जाति थी, पारधियों की। पारधियों का समाज खेतों की रक्षा करने वाला समाज रहा है। आज भी तुर्जापुर, शोलापुर, उस्मानाबाद, लातूर के गांव-गांव में आपको खेतों की रक्षा करते पारधी मिल जाएंगे।" फिर सवाल वही है कि वे तो हमारे खेतों की रक्षा कर लेंगे लेकिन इन घुमंतू जनजातियों के सम्मान और जीवन की रक्षा कौन करेगा?
मार्मिक घटना
एक लेख में 2007 की एक घटना का मार्मिक चित्रण करते हुये समाजशास्त्री अजय दांडेकर लिखते हैं- जनवरी 2007 में दो महिलाओं और कुछ पुरुषों को झारखंड के सुन्दर वनपहाड़ की पुलिस पकड़ कर ले गई। पुलिस ने महिलाओं और पुरुषों को बुरी तरह मारा। पुलिस ने महिलाओं के पास रखे 120 रुपए भी छीन लिए। बारी-बारी से उन महिलाओं के साथ थाना प्रभारी दीपनारायण मंडल और दूसरे अधिकारी महादेव उरांव ने बलात्कार किया। उसके बाद महिलाओं को नंगा कर थाने के चारों तरफ घुमाया। उन महिलाओं का अपराध मात्र इतना था कि वे एक खास समुदाय से ताल्लुक रखती थीं। यदि स्त्री घमंतू और विमुक्त समुदाय से है तो उसे समाज नगरवधू और देवदासी से अधिक कुछ नहीं समझता।
बुद्धन सबर की पुलिस कस्टडी में हुई थी मौत
पश्चिम बंग खेरिया सबर कल्याण समिति नाम की संस्था ने पुलिस कस्टडी में हुए बुद्धन सबर की मौत का मामला ना उठाया होता तो वह मामला भी उन हजारों मामलों की तरह कभी चर्चा में नहीं आता, जहां कैदी पुलिस की कस्टडी में दम तोड़ देता है। इस तरह की मौत की वजह पुलिस का टॉर्चर होती है और बताया जाता है कि आरोपी किसी बीमारी से मरा है, या फिर उसने आत्महत्या कर ली है।
बुद्धन पुरुलिया में एक साधारण दिहाड़ी मजदूर था। न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद उसका मामला सीबीआई को सौंपा गया। सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि बुद्धन का पुलिस द्वारा हिरासत में भयानक तरीके से उत्पीड़न किया गया है। 10 फरवरी 1999 को बुद्धन हिरासत में लिया गया था और 17 फरवरी 1999 को उसकी हिरासत में मौत हो गई। पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि बुद्धन ने आत्महत्या कर ली। बुद्धन को चोरी के आरोप में गिरफ्तार किया था। एक ऐसे मामले में जिसे पुलिस सुलझा नहीं पा रही थी।
बुद्धन सबर की मौत को आज बीस साल से अधिक हो गए। न्यायालय में चले लंबे संघर्ष के बाद, बुद्धन की पत्नी श्यामोली सबर के हक में फैसला सामने आया। न्यायालय ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि वह 80,000 रुपए बतौर मुआवजा श्यामोली को दे और 5,000 रुपए उसके अभिभावकों को। जिस बुद्धन को पुलिस अपनी कहानी में चोर बता रही थी, 17 जून 1994 को डाकघर में 40 रुपए से खुले उसके पासबुक में 50 रुपए से अधिक की राशि कभी नहीं रही। आज से महज 25-30 साल पहले खुले उसके खाते में एक रुपए और दो रुपए का लेन-देन भी दर्ज है।
बुद्धन खेरिया सबर आदिवासी समुदाय से था। फरवरी 1998 में पुलिस अत्याचार से हुई उसकी मौत के बाद 'बुद्धन' नाम से 'डिनोटिफायड नोमेडिक ट्राइब्स राईट एक्शन ग्रुप' ने एक पत्रिका प्रारम्भ हुई। खेरिया सबर समुदाय से आने वाले बुद्धन सबर की कहानी न्यायालय के फैसले से एक उदाहरण बनी 'विमुक्त एवं घुमंतू समुदायों' पर होने वाले पुलिसिया अत्याचार की। उसके बाद भी यह अत्याचार थम गया होता तो बुद्धन की शहादत बेकार नहीं गई, ऐसा मान लेते लेकिन इन समुदायों के साथ प्रशासनिक और सामाजिक अत्याचार का सिलसिला अब तक जारी है।
मॉडल प्रिजन एक्ट 2023 से है उम्मीद
अंग्रेजों द्वारा 1871 में जब अपराधी जमात कानून (क्रिमिनल ट्राइव्स एक्ट) लागू किया गया। उसमें उन्होंने 512 समुदायों को सूचीबद्ध किया। अगस्त 1949 में गुनाहगार जमात का कानून देश से खत्म हुआ। इस अमानवीय कानून के खत्म होने के बाद 1961 में इनमें से 313 जातियां घुमंतू समुदाय में और 198 जातियां विमुक्त समुदाय के रुप में केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा सूचीबद्ध की गई। आज भले ही आजादी के 75 सालों के बाद समाज या पुलिस प्रशासन ऑन रिकॉर्ड उनको अपराधी ना कहता हो, लेकिन 1952 में निरस्त हुए इस कानून की वजह से उन समुदायों से ताल्लुक रखने वाले लोगों के खिलाफ इस देश का कानून हमेशा इस्तेमाल हुआ है। यदि अपराधी जमात का कानून बनाने वालों की नीयत 1952 में साफ होती तो फिर सन् 1959 में आभ्यासिक अपराधियों का कानून (Habitual Offenders: Control and Reform Act) क्यों बनता?
यदि पुराना गुनाहगार जमात कानून देखें और आभ्यासिक अपराधियों के लिए बना कानून देखें तो दोनों आपको समान ही जान पड़ेंगे। ये कानून कहने के लिए तो उन लोगों के लिए हैं, जो कानून तोड़ते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि इस कानून का बेजा इस्तेमाल उन समुदायों के खिलाफ आज भी किया जाता है, जिन पर किसी जमाने में अंग्रेजों द्वारा गुनाहगार समूह का धब्बा लगाया गया था। लंबे समय से ऐसे कानूनों को खत्म करने की बात चल रही है, जो समाज के एक बड़े वर्ग के ऊपर गलत तरीके से इस्तेमाल किया जाता रहा है। अंग्रेजों के समय बना 1894 का प्रिजन एक्ट खत्म करके गृह मंत्रालय नया मॉडल प्रिजन एक्ट 2023 बनाने पर काम कर रहा है। बताया जा रहा है कि नया कानून घुमंतू जनजातियों के लिए भी राहत लेकर आएगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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