Nitin Desai: ईश्वरीय वरदान है मनुष्य जीवन, संकटों में घबराकर इसे न गंवाएं
Nitin Desai: मशहूर आर्ट डायरेक्टर नितिन देसाई की आत्महत्या के बारे में खबरें आ रही हैं कि उन्होंने कर्ज के बोझ तले दबकर आत्महत्या कर ली। लेकिन क्या आत्महत्याएं वास्तव में आर्थिक तंगी के मामलों से जुड़ी होती हैं या अन्य कारण भी हावी रहते हैं? 2021 रिपोर्ट में वैश्विक स्तर पर आत्महत्या करके जान लेने वालों की संख्या का आंकड़ा लगभग 8 लाख दर्ज किया गया, जिसमें से 20 प्रतिशत भारतीय लोग शामिल हैं। 2021 में एक लाख 64 हजार भारतीयों ने आत्महत्या का रास्ता अपनाया था।
आर्थिक बदहाली, समाज-परिवार की अपेक्षाओं पर खरा ना उतर पाना, प्रेम-रिश्तों में असफलता ये सब कारण आत्महत्या के मूल में हैं। परंतु ये सब परिस्थितियां अवसाद की तरफ ही लेकर जाती हैं जिसको सही ढंग से डील नहीं किया गया तो परिणाम आत्महत्या होती है। बाहरी दुनिया में चाहे कितनी भी चमक दमक हो मगर मन का अंधकार सब फीका कर देता है। सफलता के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति हर रूप में सक्षम है यह जरूरी नहीं।

मानसिक अवसाद और नितांत अकेलापन उम्र, पद, शोहरत, लिंग आदि का मोहताज़ नहीं होता। गत वर्षों में भय्यू जी महाराज, जग्गा जासूस' फेम बिदिशा, बालिका वधु फेम प्रत्यूषा बनर्जी, लिकिंग पार्क के मशहूर गायक चेस्टर बेनिंगटन की आत्महत्या ने बहुत कुछ सोचने पर विवश किया था। सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या ने तो पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था।
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) के मुताबिक डिप्रेशन आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह है। दुनिया में 30 करोड़ लोग डिप्रेशन (अवसाद) से तो तकरीबन 25 करोड़ लोग एन्जाइटी (दुश्चिंता) से जूझ रहे हैं। WHO के मुताबिक हर 100 में से एक मौत आत्महत्या की वजह से होती है। इतनी मौतें तो युद्ध में नहीं होती। खतरनाक बीमारी से नहीं होती। दुनिया भर में इतनी मौतें मलेरिया से भी नहीं होती जितनी कि सिर्फ आत्महत्या से हो जाती हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार, भारत में महिलाओं की आत्महत्या दर पुरुषों की अपेक्षा कम है। महिलाओं में आत्महत्या की दर जहां प्रति एक लाख पर 16.4 है वहीं पुरुषों में एक लाख में 25.8 है। व्यस्कों के साथ बच्चों में भी आत्महत्या की प्रवृत्ति घातक तरीके से बढ़ रही है। परिवार द्वारा पढ़ाई और कैरियर में सफलता का बोझ उनके कोमल मन को कितना मर्माहत कर देता है कि ज़रा सी असफलता को सहना उन्हें मुश्किल लगता है और जीवन समाप्त करना आसान। पिछले महीने एक आईआईटीयन पिता और डॉक्टर माँ ने अपने बेटे की आत्महत्या की पहली बरसी पर स्वीकार किया कि उनका बेटा कमज़ोर नहीं था बल्कि उनकी अपेक्षाओं ने उसे कमजोर बना दिया।
साल 2021 में भारत में जिन 1,64,033 लोगों ने आत्महत्या की उसमें से 25.6 प्रतिशत दिहाड़ी मज़दूर थे। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक साल 2021 में कुल 42,004 दिहाड़ी मज़दूरों ने आत्महत्या की। इनमें 4,246 महिलाएं भी शामिल थीं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल 22,372 गृहिणियों ने आत्महत्या की थी। इन आंकड़ों के अनुसार हर दिन 61 और हर 25 मिनट में एक आत्महत्या हुई है।
परिवार की बुनियाद और काम के क्षेत्र में पुरुष को अव्वल समझा जाता है। सबके सामने मजबूत दिखने के चक्कर में, कमजोरी छिपा कर रखने की कोशिश में, मन पर बोझ बढ़ाने का नतीजा आज के समय में आत्महत्या के आंकड़ों में साफ दिख रहा है। पुरुषों में आत्महत्या का प्रमुख कारण कर्ज का बोझ और बेरोजगारी है। पुरुष का अहम अपनी समस्याओं को बाहर निकलने नहीं देता। इसका मुख्य कारण यह सोच है कि पुरुष हैं तो आप किसी के सामने समस्या नहीं रख सकते। इससे व्यक्ति समस्या के समाधान के प्रति नहीं बल्कि मानसिक एकांतवास की तरफ बढ़ने लगता है।
स्त्रियों में आत्महत्या की आम वजहें हैं - कम उम्र में शादी और बच्चे, विषम से विषम परिस्थिति में विवाह को निभाने का दबाव, घरेलू हिंसा, आर्थिक रूप से निर्भरता और समाज में कमतर दर्ज़ा मिलना। कई बार लड़कियां मानसिक और शारीरिक रूप से सुदृढ़ भी नहीं होती और शादी-बच्चों की जिम्मेदारियां लाद दी जाती हैं। कम उम्र यह झेल नहीं पाता है। इसके अलावा घरेलू मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना भी महिलाओं की आत्महत्या में अहम कारण होते हैं।
हालांकि इसके बावजूद महिलाओं में आत्महत्या की दर पुरुषों के मुकाबले कम है। इसका प्रमुख कारण है कि उन पर परिवार का आर्थिक दबाव नहीं होता है। इसके अलावा ज़ेहनी तौर पर एक तरीके से महिलाएं पुरुषों से ज्यादा मजबूत होती हैं। इसके पीछे का मनोविज्ञान समझें तो ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारे सामाजिक ताने-बाने में स्त्रियों को शुरू से ही उनकी इच्छाओं को दबाकर रखने और हर परिस्थिति में भी समायोजित कर जीने की कला अनजाने में ही सही, पर सिखा दी जाती है। दूसरा, महिलाएं रो कर और अपना दुख दूसरों के साथ बांटकर अपना मानसिक बोझ हल्का कर लेती हैं।
इस तरह अगर हम आत्महत्याओं का विश्लेषण करें तो किसी भी वर्ग में और किसी भी उम्र में आत्महत्या की प्रमुख वजह है सहनशक्ति का समाप्त होते जाना और पारिवारिक तथा सामाजिक ढांचें की नींव का कमज़ोर हो जाना। विकट परिस्तिथियां विकल कर सकती हैं, परन्तु आत्म-बल तोड़ दें, यह गलत है। इसका समाधान हमारे अंदर ही है। भावनात्मक रूप से स्वयं को सबल बनाना, अत्याचार के प्रति सीमा से परे सहन शक्ति का परिचय ना देना, मित्रों और घरवालों से खुल कर बात करना, असफलता स्वीकारना, भौतिक सुखों की बजाय संतुष्टि और खुशियों की अहमियत पहचानना जीवन में जरुरी है। जीवन में हर पल, हार बात मन मुताबिक़ नहीं हो सकती है अपने लिए यह स्वीकृति बहुत जरुरी है।
इस मामले में हमें यह भी समझना और समझाना होगा कि आत्महत्या मनचाही मौत नहीं बल्कि अनचाही मौत होती है। इसके कारणों पर चाहे दोषारोपण करके मामले को रफा दफा कर दिया जाए, मगर यह कभी भी न्यायसंगत एवं नीतिसंगत नहीं होगा। कारणों पर मृत्यु का बोझ डाल कर हम इसके परिणामों से नहीं बच सकते। कई बार तो इसे येन केन प्रकारेण महिमामंडित भी कर दिया जाता है। विशेषकर भारतीय परिवेश में किसानों और दलितों की आत्महत्या को लेकर। आत्महत्या पर मुआवजा देकर क्या हम संकुचित और सीमित आर्थिक हालातों या विषम परिस्थितियों में आत्महत्या को अनजाने प्रेरित नहीं कर देते?
कई बार अप्रत्याशित आत्महत्या की घटनाएं भी दिखती हैं जिसके पीछे के मनोविज्ञान को समझना असंभव लगता है। बुराड़ी कांड को भुलाया नहीं जा सकता जहाँ मुक्ति की खोज और अमरता की चाह में एक परिवार ने नासमझी में अपनी जान दे दी थी। जीवन अनिश्चित होता है। हम इसकी लाख तैयारियां कर लें लेकिन अचानक सामने आने वाली घटनाएं आपके योजना अनुसार नहीं आती। ऐसे समय में स्व विवेक की तत्परता और अदम्य साहस ही आपके साथी होते हैं। जीवित रहने की अदम्य इच्छा शक्ति और विकट परिस्थिति से बाहर निकलने का दृढ संकल्प सबसे बड़ा हथियार होता है।
वैसे भी भारतीय धर्म दर्शन आत्महत्या को यह कहकर हतोत्साहित ही करता है कि आत्महत्या करने वाले अनिश्चित काल तक भूत प्रेत बनकर जिन्दा रहते हैं। जो मनुष्य योनि में रहकर अपने संकटों से मुक्ति नहीं पा सकता वह आत्महत्या करने के बाद भूत प्रेत बनकर सैकड़ों साल तक मुक्ति की चाह में भटकता है। कम से कम भारतीय धर्म दर्शन के मुताबिक तो ऐसा करना पूरी तरह से त्याज्य ही कहा जाएगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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