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Mosque at Nishadraj Fort: भयउ विषाद निषादहि भारी

Mosque at Nishadraj Fort: भगवान राम जब वन के लिए अयोध्या से निकले तो चित्रकूट की ओर चले। लेकिन चित्रकूट तक पहुंचने के लिए उन्हें बीच में गंगा नदी को पार करना था। यहां उनकी मुलाकात निषादराज गुह्य से हुई जो यहां के राजा थे। गोस्वामी तुलसीदास रामचरित मानस में लिखते हैं कि जब निषादराज ने राम, सीता और लक्ष्मण को रात में कुश (घास) के बिस्तर पर सोते देखा तो वो भारी विषाद से भर गये। उन्हें बहुत कष्ट हुआ कि एक सम्राट के बेटे इस तरह कुश के बिछौने पर सो रहे हैं। जैसे उस समय निषादराज को राम को कुश के बिछौने पर सोते हुए देखकर भारी विषाद हुआ था कुछ वैसा ही विषाद और दुख इस समय निषाद समाज को भी होता है जब वो श्रृंगवेरपुर में निषादराज के किले पर एक मजार को देखते हैं।

उत्तर प्रदेश में प्रयागराज से लगभग चालीस किलोमीटर दूर गंगा के किनारे श्रृंगवेरपुर या सिंगरौर एक छोटा सा प्रखंड है। श्रृंगवेरपुर एक पौराणिक स्थान है जिसका नामकरण श्रृंगी ऋषि के नाम पर हुआ है। श्रृंगी ऋषि इसी स्थान पर अपनी पत्नी के साथ निवास करते थे। भगवान राम जब अयोध्या से चित्रकूट की ओर (उत्तर से दक्षिण) वनवास के लिए जा रहे थे तो इसी श्रृंगवेरपुर में उनकी मुलाकात निषादराज गुह्य से होती है जो राम, सीता और लक्ष्मण को अपनी नाव से गंगा पार कराते हैं।

Nishad Party demand to removal mosque at Nishadraj fort in Prayagraj

उत्तर भारत में निषादराज गुह्य और भगवान राम के इस मिलन को लेकर नाना प्रकार की भावनात्मक कहानियां और प्रसंग प्रचलित हैं। इसलिए निषाद समाज आज भी अपने आप को निषादराज के जरिए राम की परंपरा से जोड़कर देखता है। ऐसे में कुछ दिन पहले 20 जून को बलिया में जब निषाद पार्टी के मुखिया संजय निषाद ने ये बयान दिया कि "अगर मुस्लिम समाज निषादराज के किले से अपनी मस्जिद नहीं हटा लेता तो आगामी नवमी के मौके पर उसे गंगा में बहा दिया जाएगा" तब प्रदेश में एक और मस्जिद को लेकर मीडिया में माहौल गर्म हो गया।

प्रदेश की राजनीति में यह पहला ऐसा मौका है जब पिछड़े वर्ग में शामिल किसी जाति ने मंदिर मस्जिद का मुद्दा उठाया है। आमतौर पर ऐसा समझा जाता है कि हिन्दुत्व की राजनीति अगड़ी जातियों का मामला है इसलिए पिछड़ी, अति पिछड़ी और दलित जातियों की राजनीतिक गोलबंदी आमतौर पर भावनात्मक मामलों की बजाय व्यावहारिक मुद्दों पर ही होती है। प्रदेश की राजनीति में बीते तीस चालीस साल में जो राजनीतिक उठा पटक हुई है उसमें एक ओर अगर राम मंदिर-बाबरी मस्जिद का मामला था तो उसकी काट के तौर पर दलित, पिछड़ी जातियों की गोलबंदी के लिए आरक्षण को प्रमुखता से सामने रखा गया और अगड़ों को मनुवादी बताकर उनसे दूर रहने के लिए प्रेरित किया गया।

लेकिन अब ऐसा पहला मौका आया है जब श्रृंगवेरपुर में मस्जिद को हटाने के लिए प्रदेश की एक प्रमुख पिछड़ी निषाद जाति ने आवाज उठाई है। संजय निषाद की राजनीतिक शुरुआत भी उसी तरह हुई थी जैसी अन्य पिछड़ी जातियों की राजनीति करने वालों की होती है। वो निषाद समाज को ओबीसी से निकालकर अनुसूचित जाति में शामिल करवाने की मुहिम के साथ 2013 में मैदान में आये। 2015 के गोरखपुर के सहजनवा गोलीकांड के बाद संजय निषाद और उनकी पार्टी पूरे प्रदेश में चर्चा में आ गयी जहां उनके आंदोलन पर गोलीबारी की गयी थी।

अपने राजनीतिक उभार को धार देने के लिए उन्होंने समाजवादी पार्टी से हाथ मिला लिया और उनके बेटे प्रवीण निषाद ने 2018 का गोरखपुर उपचुनाव जीतकर अपने राजनीतिक महत्व को भी दिखा दिया। गोरखपुर परंपरागत रूप से गोरखनाथ के महंत की सीट रही है और योगी यहां से सांसद थे। लेकिन जब वो मुख्यमंत्री बने तो उपचुनाव में निषाद पार्टी ने भाजपा उम्मीदवार को हरा दिया। इससे पहले निषाद पार्टी ने 2017 के विधानसभा चुनाव में मोहम्मद अय्यूब की पीस पार्टी से हाथ मिलाया था लेकिन विजय मिश्र की जीत के अलावा उन्हें कोई सफलता नहीं मिली।

अपने एक दशक के राजनीतिक कैरियर में संजय निषाद और उनकी निषाद पार्टी (निर्बल शोषित आम आदमी पार्टी) ने तीन दलों के साथ गठबंधन किया है। 2019 से फिलहाल उनका दल भाजपा का सहयोगी है। प्रदेश विधानसभा में उनके 6 विधायक और 1 विधानपरिषद सदस्य हैं। प्रदेश में वो निषाद/केवट/ बिन्द/मल्लाह समाज के एक बड़े नेता के तौर पर उभरे हैं। निषाद पार्टी से समझौता करके भाजपा को भी लाभ हुआ है और 2019 के लोकसभा चुनाव में मछलीशहर जैसी कुछ ऐसी सीटों पर भी जीत मिली जहां कई बार से वो हारती आ रही थी।

ऐसे में यह कहना कि संजय निषाद द्वारा श्रृंगवेरपुर में मस्जिद का मुद्दा उठाना पूरी तरह से अराजनीतिक मामला है, ठीक नहीं होगा। लेकिन यह भी नहीं कहा जा सकता कि यह मामला सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए उभाया गया है। जिस स्थान पर मस्जिद है वह निषादराज गुह्य का किला कहा जाता है। सत्तर के दशक में यहां आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने खुदाई करवाई थी जहां एक पुराने किले का अवशेष निकला है। इसमें एक बड़े से हौद जैसी आकृति महत्वपूर्ण है जिसके बारे में कहा जाता है कि इसमें गंगा से पानी लाकर जमा किया जाता था फिर दूसरी ओर से वापस गंगा में छोड़ दिया जाता था।

यह किला निषादराज का है या उनके वंशजों में किसी का है इसके बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं है। लेकिन निषादों की अपनी आस्था है कि यह किला निषादराज गुह्य का है जो तीन वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। जितने हिस्से की खुदाई हुई है वह बहुत छोटा हिस्सा है। अभी और खुदाई किये जाने की जरूरत है जो वनक्षेत्र के रुप में संरक्षित है। इसी संरक्षित वन क्षेत्र में ठीक गंगा के किनारे वह विवादित मजार है जिसे हटाने के लिए संजय निषाद ने आवाज लगायी है। यह मुख्य रुप से उस किले के लिए संरक्षित भूमि पर ही बनी हुई है जहां भविष्य में और अधिक खुदाई किये जाने की जरूरत है। हालांकि मस्जिद/मजार के केयरटेकर दावा करते हैं कि यह मजार सात आठ सौ साल पुरानी है और इसे यहां से कोई नहीं हटा सकता। मजार या मस्जिद के लिए जमीन के जो जरूरी कागजात चाहिए वो उनके पास हैं।

श्रृंगवेरपुर प्रखंड में आसपास कुछ मस्जिदें, इमामबाड़ा और मदरसा भी है। श्रृंगवेरपुर कस्बे में ही एक और मस्जिद भी है जिसे सुन्नी मस्जिद कहा जाता है। लेकिन निषादराज के किला परिसर में स्थित जिस मजार या मस्जिद को संजय निषाद गंगा में बहाने के लिए कह रहे हैं वह निषादराज किले के उसी तीन वर्गकिलोमीटर संरक्षित वन क्षेत्र में है जो निषाद समाज की आस्था का केन्द्र है। भौगोलिक परिस्थितियों को देखें तो इस जंगल में यह मजार इकलौता निर्माण है जो गंगा के ठीक किनारे होने के कारण किसी और रूप में तो महत्वपूर्ण हो सकती है लेकिन यहां मुस्लिमों का ही आना जाना कम है। मस्जिद के केयरटेकर बताते हैं कि मजार पर जुमा (शुक्रवार) के दिन लोग आते हैं। बाकी दिनों में यहां सन्नाटा ही पसरा रहता है।

कस्बे से इतनी दूर गंगा के किनारे जंगल में यह सुनसान सा ही इलाका है। इस मस्जिद के एक ओर निषादराज किला है तो दूसरी ओर निषादराज कूप है। अर्थात यह मजार या मस्जिद निषादराज के किला परिसर में ही बनी है जो कि अब एएसआई द्वारा संरक्षित क्षेत्र है। यह मजार कितनी पुरानी है इसका कोई प्रमाण नहीं है लेकिन खुदाई में मिले उस किले से पुरानी तो बिल्कुल नहीं होगी जिसकी जमीन के ऊपर इसे बनाया गया है। ऐसे में यह राजनीतिक लड़ाई से अधिक निषाद समाज की आस्था से जुड़ा हुआ प्रश्न है। संजय निषाद ने भी कोई पहली बार ये मुद्दा नहीं उठाया है जिसके कारण यह कहा जाए कि भाजपा के सहयोगी होने के बाद वो मंदिर मस्जिद की राजनीति कर रहे हैं।

निषाद पार्टी की स्थापना के समय ही संजय निषाद और उनकी पार्टी यह मुद्दा उठा चुकी है कि निषादराज के किला परिसर में स्थित मस्जिद/मजार को वहां से हटाया जाए जो हमारी आस्था पर चोट करती है। अब देखना यह होगा कि निषादराज गुह्य की जयंती के अवसर पर अगली नवमी में जब निषाद समाज के लोग यहां इकट्ठा होते हैं तो क्या करते हैं। हालांकि यह भी सिर्फ संयोग ही नहीं कहा जाएगा कि जिस तिथि पर उन्होंने मस्जिद को गंगा में बहाने की बात कही है उस समय देश में लोकसभा चुनाव चल रहा होगा। तब क्या होगा उस समय पता चलेगा लेकिन तब तक निषाद समाज ही नहीं बल्कि श्रृंगवेरपुर से आस्था रखने वाले हर रामभक्त के लिए निषादराज के किले में बनी मजार चर्चा का विषय तो बन ही गई है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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