One Nation, One Election: "एक राष्ट्र, एक चुनाव" पर चिंतन जरूरी
भारत में हर साल चुनाव का साल होता है। प्रतिवर्ष देश में कहीं न कहीं कोई न कोई चुनाव चल रहे होते हैं। इस लिहाज से 2023 में भी 9 राज्य सरकारों के लिए चुनाव होगा। क्या 2023 में एक राष्ट्र एक चुनाव पर चर्चा तेज करनी चाहिए?

One Nation, One Election: एक राष्ट्र, एक विधान। भारतीय जनता पार्टी का पुराना नारा है। 21 अक्टूबर 1951 में जनसंघ की स्थापना के दिनों से इसकी मांग चली आ रही है। उसे अमल में लाना मुश्किल था पर 6 अप्रैल 1980 को भाजपा की स्थापना के बाद से इसे मूल एजेंडा में शामिल कर लिया गया। अब जाकर भाजपा शासित कुछ राज्यों में समान नागरिक आचार संहिता लागू करने की दिशा में पहल हुई है। पिछली यानी सोलहवीं लोकसभा में तीन तलाक के खिलाफ पारित कानून और मौजूदा लोकसभा में संविधान की धारा 370 का विसर्जन इस दिशा में मील के पत्थर साबित हुए हैं।
इसी तर्ज पर "एक राष्ट्र, एक चुनाव" की मांग रह रहकर उठ रही है। इसकी बात स्वयं प्रधानमंत्री मोदी कर चुके हैं क्योंकि लोकतंत्र में निरंतर चुनावों पर होने वाला भारी खर्च मौजूदा अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती का सबब है। विकास के प्रयासों की निरंतरता से इतर चुनावों के जरिए हम हमेशा लोकतांत्रिक उत्सव चुनाव में डूबे रहते हैं। अगले साल नौ राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं। इन चुनावों को 2024 के लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल कहा जा रहा है। मतलब समूचे तंत्र को 2023 में चुनावी सेमीफाइनल के खेल में फंसे रहना पड़ेगा।
ऐसे में "एक राष्ट्र, एक चुनाव" पर गंभीर विमर्श जरूरी है। इसका सुझाव चुनाव आयोग के पास लंबित है। इस सच्चाई से सब अवगत हैं कि मंहगी चुनाव व्यवस्था पर धन्नासेठों का प्रभाव बढ़ रहा है। चुनाव खर्चीले होते जा रहे हैं। तर्क है कि आने वाले वर्षों में विश्व बैंक से कर्ज लेकर चुनाव कराने की नौबत खड़ी हो सकती है। ऊंची लागत ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ पाना सामान्य भारतीय के लिए दुर्लभ कर दिया है। वहीं निरंतर चलने वाले चुनावों ने सरकारी तंत्र को भी बेहाल कर रखा है। हर साल किसी न किसी प्रदेश के विधानसभा और अंततः लोकसभा का चुनाव चल रहा होता है। अगले वर्ष 2023 में उत्तर पूर्व के त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड और मिजोरम में चुनाव है। दक्षिण में कर्नाटक और तेलंगाना विधानसभा चुनाव होना है। फिर मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ का हंगामेदार चुनाव होगा।
मौजूदा लोकसभा के लिए 2019 में हुए चुनाव से पहले हुए इन तीनों राज्यों में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की करारी हार हुई थी। हाशिए पर जा रही कांग्रेस पार्टी की अप्रत्याशित जीत ने एक साथ चुनाव करा लेने की सोच को बड़ा झटका दिया था। इससे पहले भाजपा को 2014 से राज्य विधानसभा चुनावों में मिल रही जीत ने माहौल बना रखा था कि केंद्र की नरेंद्र मोदी की सरकार एक राष्ट्र, एक चुनाव की सोच को लागू करने की दिशा में प्रभावी कदम उठा लेगी।
देश के 29 राज्यों और दो केन्द्र-शासित प्रदेशों (दिल्ली और पुद्दुचेरी) का प्रमुख मुख्यमंत्री कहलाता है। इनमें से 15 राज्यों में भारतीय जनता पार्टी या उनके सहयोगी राजनीतिक दलों की सरकारें हैं। गुजर रहे साल के आख़िरी महीने के चुनावी नतीजे में भाजपा को गुजरात में जहां भारी जीत के साथ फिर से अपनी सरकार बना लेने में सफलता मिली, वहीं हिमाचल प्रदेश से कांग्रेस पार्टी के हाथों हारने के बाद सत्ता से बेदखल होना पड़ा है।
नए साल में चुनावी सफर की शुरुआत 6 जनवरी को दिल्ली नगर निगम के मेयर के चुनाव से होनी है। गुजरात विधानसभा चुनाव में पर्याप्त वोट प्रतिशत हासिल कर आम आदमी पार्टी ने राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल कर लिया है। चुनाव हारने के बाद दिल्ली नगर निगम में मेयर पद हासिल करने के लिए भाजपा को नई राष्ट्रीय पार्टी से मुक़ाबिल होना है। पंजाब और दिल्ली की सरकार चलाने के बाद अब राष्ट्रीय नीति में आगे की सहमति और असहमतियों में आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल की महत्वपूर्ण हैसियत रहने वाली है।
अगले साल के शुरुआती चरण में ही नवगठित केंद्र शासित प्रदेश जम्मू व कश्मीर का विधानसभा चुनाव भी होना है। इन महत्वपूर्ण चुनाव के नतीजे चुनावी खर्च के चर्चे को नई हवा देने वाले हैं। विधानसभा चुनावों से इतर सिर्फ लोकसभा चुनाव पर आने वाले खर्च की बात करें तो सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज की रिपोर्ट के मुताबिक 2019 का लोकसभा चुनाव सबसे महंगा चुनाव था। उस पर 60 हज़ार करोड़ रुपए खर्च हुए। उससे पहले 2014 के लोकसभा चुनाव पर उससे आधे यानी 30 हजार करोड़ रुपए खर्च हुए थे। इस हिसाब से अगर सुधरे नहीं तो 2024 के लोकसभा चुनाव पर एक लाख करोड़ रुपए खर्च होंगे। इस विशाल खर्च का इंतजाम 2023-24 के बजट से ही शुरू करना होगा। यह मौजूदा अर्थव्यवस्था की बड़ी चुनौतियों में से एक है।
लोकसभा चुनाव के मद्देनजर नया साल महत्वपूर्ण है। 2023 में अब संसद की कार्यवाही सेंट्रल विस्टा परियोजना में बनकर तैयार नए संसद भवन में होनी है। मौजूदा 543 सदस्यों के बैठने का इंतज़ाम रखने वाली लोकसभा की जगह नए भवन में 888 लोकसभा सदस्यों के बैठने का इंतज़ाम है। जाहिर तौर पर आगे परिसीमन के जरिए लोकसभा सीटों की कुल संख्या बढ़ाने की दिशा में सोचा जा रहा है।
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साथ ही यह भी सोचा जा रहा है कि पांच साल में एक ही बार में एकसाथ लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव कराने की दिशा में कौन कौन सी मुश्किलें हैं और उन मुश्किलों से कैसे पार पाया जा सकता है। सभी राज्यों में अलग अलग विचारधारा वाले दलों के होने से काम आसान तो नहीं लेकिन चुनावों की वजह से अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले भयंकर बोझ ने हालात में बदलाव का दबाव बढ़ तो रहा ही है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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