Frauds by NDTV: मीडिया हाउस के नाम पर आर्थिक घोटालों का अजायबघर था एनडीटीवी
NDTV के एक पत्रकार इस्तीफा देकर सहानुभूति बटोर रहे थे, तो उसी की एक पूर्व साथी ने पूछ लिया कि पहले जो 30 फीसदी शेयर अंबानी के पास थे उस समय चैनल किसी पूंजीपति का नहीं था और अंबानी से अडानी ने खरीद लिया तो पूंजीवाद आ गया।

Frauds by NDTV: भाई-भतीजावाद और पक्षपात के आरोप अक्सर विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका पर लगते रहे हैं। ऐसा बिलकुल नहीं है कि सांसद के बेटे-बेटियां संसद सदस्य, आईएएस-आईपीएस के बेटे-बेटियां अफसर, और जज साहब की संतान न्यायाधीश नहीं बनते। बात बस इतनी है कि ऐसे भाई भतीजावाद के साथ पत्रकारिता में भाई भतीजावाद का जिक्र कहीं नहीं आता।
जिस दौर में एनडीटीवी को दूरदर्शन से "द वर्ल्ड दिस वीक" का बड़ा ठेका मिला था, उस दौर में ही राजदीप सरदेसाई एनडीटीवी में अचानक नंबर दो की पोजिशन पर पहुँच गए थे। अगर आप सोच रहे हैं कि इसमें आश्चर्य की क्या बात है तो याद दिला दें कि 1988 के उस दौर में दूरदर्शन के निदेशक थे भास्कर घोष। ये सागरिका घोष के पिता और राजदीप सरदेसाई के ससुर थे। एनडीटीवी में पत्रकार रह चुके संदीप भूषण ने एक पत्रिका "कारवान" को साक्षात्कार दिया था। इस साक्षात्कार में संदीप भूषण ने एनडीटीवी में भ्रष्टाचार की पोल खोलकर रख दी थी।
जिन मासूम लोगों को एनडीटीवी में पत्रकारिता का कोई स्तम्भ होने का वहम रहा होगा, उनके लिए एनडीटीवी के बिकने के बाद की शेयर बाजार की ख़बरें भी आश्चर्यजनक होंगी। बीते हफ्ते शुक्रवार को जब एनडीटीवी के शेयर खुले बाजार में 387 रुपये के मूल्य पर बिक रहे थे, उसी समय अडानी की कंपनी वही शेयर 294 रुपये पर खरीद रही थी। सवाल है कोई प्रमोटर अपना शेयर 32 प्रतिशत का नुकसान उठाकर अडानी को क्यों बेच रहा था, जबकि वो खुले बाजार में इससे अधिक कीमत पर बेच सकता था?
इसके लिए हमें ये पता होना चाहिए कि जब कोई कंपनी का प्रमोटर दूसरी कंपनी को खरीदने की सोचता है, उसी वक्त अपने "मित्र" संगठनों को बता देता है कि भविष्य में वो इस दर पर शेयर खरीदेगा। इससे वो "मित्र" पहले से शेयर खरीदकर इकठ्ठा रखते हैं, ताकि भविष्य में लाभ उठाया जा सके।
एनडीटीवी का शेयर रखने वाली कंपनियों में कन्फर्म रियलबिल्ड, आदेश ब्रोकिंग हाउस, ग्रिड सिक्योरिटीज और ड्रोलिया एजेंसीज शामिल हैं। इनके पास एनडीटीवी के कुल करीब 7.13 प्रतिशत (46 लाख) इक्विटी शेयर हैं।
ड्रोलिया एजेंसीज और आदेश ब्रोकिंग हाउस ने करीब एक वर्ष से ये शेयर इकठ्ठा किये हुए हैं। बाकि दोनों कन्फर्म रियलबिल्ड और ग्रिड सिक्योरिटीज ने बाद में शेयर इकट्ठा करना शुरू किया था। इनके अलावा 11 विदेशी पोर्टफोलियो इन्वेस्टर (एफपीआई) भी एनडीटीवी में करीब 14.72 प्रतिशत के शेयर धारक हैं। इसमें एलटीएस इन्वेस्टमेंट फण्ड के पास 9.75 प्रतिशत है।
अब आपको अंदाजा हो गया होगा कि गौतम अडानी एनडीटीवी के शेयर लगातार इसलिए खरीदते जा रहे हैं क्योंकि उनके पास निर्णायक क्षमता अभी भी नहीं है। शेयर बाजार के हिसाब से 15.94 प्रतिशत प्रनॉय रॉय के पास और 16.32 प्रतिशत उनकी पत्नी राधिका रॉय के पास अभी भी हैं जो तीस प्रतिशत से अधिक हुए। अडानी ने विश्वप्रधान कमर्शियल प्राइवेट लिमिटेड के जरिये 29.18 प्रतिशत शेयर खरीदने के बाद भी शेयरों की खरीद इसीलिए जारी रखी हुई है। प्रनॉय-राधिका रॉय के कुल 32-33 प्रतिशत शेयर से अधिक हुए बिना एनडीटीवी पर अभी भी अडानी का नियंत्रण नहीं होगा।
पैसे, शेयर बाजार इत्यादि का ये मामला देखने के बाद अगर आप इस सोच में हैं कि प्रनॉय-राधिका रॉय तो पत्रकार थे, उन्हें बाजार के ऐसे आर्थिक मामलों से क्या लेना देना तो पूँजी और पूंजीपतियों के इस खेल को फिर से थोड़ा पीछे जाकर देखते हैं। एनडीटीवी पर नीरा राडिया टेप कांड में सरकारों को प्रभावित करने, भाई-भतीजावाद को पत्रकारिता में स्थान देने, और अनैतिक तरीकों से पत्रकारिता करने के ही आरोप नहीं लगे हैं।
इन दोनों पत्रकार पूंजीपतियों (रॉय दंपति) पर आर्थिक हेराफेरी के भी आरोप लगे और सिद्ध हुए हैं। आज जो लोग सोशल मीडिया पर फूड ब्लॉगर्स को कोसते दिखते हैं, उस फूड ब्लॉगिंग की भारत में चर्चा "एनडीटीवी गुड टाइम्स" पर आने वाले "हाईवे ऑन माय प्लेट" से हुई थी। ये जो "एनडीटीवी गुड टाइम्स" था, वो एनडीटीवी का विजय माल्या की कंपनी के साथ शुरू किया हुआ उपक्रम था। आर्थिक हेराफेरी के लिए विजय माल्या बरसों से फरार हैं।
कहा जा सकता है कि एनडीटीवी का आर्थिक अपराधियों से पुराना नाता रहा है। इसके सबूत इनकम टैक्स विभाग के हाथ पहली बार 2015 में लगे। इनकम टैक्स विभाग ने घोटालों का प्रमाण मिलते ही एनडीटीवी पर 525 करोड़ रुपये का जुर्माना ठोक दिया। ये 2008 के दौर में बरमूडा और दूसरी ऐसी ही टैक्स छूट वाली जगहों पर पैसे पहुंचा कर आयकर घोटाला करने के लिए लगाया गया था। जांच में पता चला कि प्राइसवाटरहाउस कूपर्स के साथ मिलकर एनडीटीवी के टॉप मैनेजमेंट ने ये घोटाला किया था।
इस आर्थिक घोटाले का पता चलने के बाद से केवीएल नारायण राव को सितम्बर 2015 और फरवरी 2016 में पूछताछ के लिए बुलाया गया था। विक्रम चंद्रा से भी इसी के बाद पूछताछ हुई थी। एनडीटीवी के तब के सीईओ का 33 पन्ने का हस्तलिखित कबूलनामा जिसमें उन्होंने प्रनॉय रॉय, राधिका रॉय, विक्रम चंद्रा और बरखा दत्त पर फर्जी कंपनियों के जरिये लेन-देन करने की बात की, वो अभी भी उपलब्ध है। श्री अय्यर, जिन्होंने "एनडीटीवी फ्रॉड्स" नाम से पूरी किताब लिखी है, उन्होंने इस दस्तावेज को पी-गुरुज की वेबसाइट पर डाल रखा है।
एनडीटीवी द्वारा किये गये ऐसे आर्थिक अपराधों के खुलासे 2017 से लगातार हो रहे हैं। इसलिए ये कहना कि एनडीटीवी आदर्शवादी पत्रकारिता का प्रतिनिधित्व करती है, पूरी तरह गलत होगा।
अगर इसे पत्रकारिता का प्रतिनिधित्व माना जाये तो फिर तो ये पेशा ही भाई-भतीजावाद, आर्थिक घोटालों और अनैतिकता के गंभीर आरोपों में घिर जायेगा। बेहतर होगा कि हम-आप सभी स्रोतों से इस मुद्दे पर आने वाली ख़बरों को देखें। भविष्य में पत्रकारिता को किस दिशा में नहीं जाना चाहिए, वो जरूर इस मामले से सीखा जा सकता है।
यह भी पढ़ें: NDTV Ownership: क्या एनडीटीवी में हो गया एजेंडा पत्रकारिता का अंत?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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