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NDA Expansion: तीन नए सहयोगियों के साथ एनडीए और मजबूत होगा

उड़ीसा, आंध्र प्रदेश और पंजाब में नए समीकरण इन्तजार कर रहे हैं। उड़ीसा में बीजू जनता दल का 15 साल बाद एनडीए में वापस लौटना लगभग तय है। आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की तेलगू देशम पार्टी का एनडीए में लौटना तय लग रहा है, तेलुगु देशम के साथ पवन कल्याण की प्रजा राज्यम पार्टी भी एनडीए में शामिल हो रही है। चंद्रबाबू नायडू पिछले लोकसभा चुनावों से ठीक पहले 2018 में एनडीए छोड़कर गए थे।

एनडीए छोड़ने के बाद उन्होंने भाजपा के खिलाफ उसी तरह मोर्चा बनाने की कोशिश की थी, जैसे इस बार नीतीश कुमार ने एनडीए छोड़ने के बाद इंडी एलायंस बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका बनाई थी। नीतीश कुमार को चुनावों से पहले ही समझ में आ गया कि विपक्ष कितनी भी कोशिश कर ले, वह मोदी को नहीं हरा सकता।

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लेकिन चंद्रबाबू नायडू को 2019 का विधानसभा और लोकसभा चुनाव हारने के बाद समझ में आया था कि उन्होंने एनडीए छोड़कर बड़ी गलती की। अकेले चुनाव लड़कर वह लोकसभा की सिर्फ 3 सीटें जीत पाए थे, जबकि जग्गन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस 22 लोकसभा सीटें जीत गई थी, और विधान सभा में उसे दो तिहाई से भी ज्यादा बहुमत मिल गया था।

चंद्रबाबू नायडू पिछले एक साल से एनडीए में शामिल होने की कोशिश कर रहे हैं, जब इंडी एलायंस का गठन हुआ था, उस समय भी उन्हें एनडीए में शामिल किए जाने की चर्चा थी। चंद्रबाबू नायडू की हाल ही में अमित शाह से दो बार बातचीत हो चुकी है। इस बातचीत में सीटों पर भी चर्चा हो चुकी है। चंद्रबाबू नायडू और पवन कल्याण की बातचीत कभी भी हो सकती है।

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भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा की 25 में से आठ सीटें माँगी है, जिस पर लगभग सहमति भी हो चुकी है। आंध्र प्रदेश विधानसभा के चुनाव भी लोकसभा चुनावों के साथ होते हैं, इसलिए विधान सभा की सीटों पर भी साथ ही सहमति होनी है। चंद्रबाबू नायडू भाजपा को विधानसभा की 175 सीटों में से 30 से 35 सीटें देने पर सहमत हो सकते हैं।

पवन कल्याण कापू जाति से आते हैं, जिसका ईस्ट गोदावरी, वेस्ट गोदावरी, गुंटूर, कृष्णा, कर्नूल, कल्पा आदि जिलों में अच्छा खासा प्रभाव है। गठबंधन में कापू समुदाय के प्रभाव वाली करीब 35-40 सीटों पर पवन कल्याण की प्रजा राज्यम पार्टी भी चुनाव लड़ेगी। बाकी बची करीब सौ या उससे कुछ ज्यादा सीटों पर चंद्रबाबू नायडू की पार्टी चुनाव लड़ेगी।

अगर सीटों का बंटवारा ठीक ठाक हो गया, तो एनडीए की आंध्र प्रदेश में बम्पर जीत हो सकती है। पिछली बार भाजपा का किसी के साथ गठबंधन नहीं था, इसलिए भाजपा आंध्र प्रदेश से लोकसभा की एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। तेलुगु देशम, भाजपा और प्रजा राज्यम का गठबंधन कभी भी हो सकता है। आंध्र प्रदेश की आज की राजनीतिक स्थिति ऐसी है कि चंद्रबाबू नायडू, पवन कल्याण और मोदी के गठबंधन वाला एनडीए राज्य की सभी 25 लोकसभा सीटें भी जीत सकता है।

दूसरी तरफ जगन मोहन रेड्डी भी एक समय भाजपा के साथ चुनावी गठबंधन करने के इच्छुक थे, लेकिन भारतीय जनता पार्टी का फीडबैक यह था कि उनका प्रभाव खत्म हो रहा है, और चंद्रबाबू का पलड़ा भारी है। दूसरा कारण यह था कि आंध्र प्रदेश का हिन्दू वोटर जगन मोहन रेड्डी की ईसाईपरस्त राजनीति के कारण उनसे नाराज है।

अगर भाजपा जगन मोहन रेड्डी से गठबंधन करती, तो हिन्दू वोटर भाजपा से नाराज हो जाता। बाद में जगन मोहन रेड्डी खुद ही पीछे हट गए, क्योंकि उन्हें उनके समर्थकों ने बताया कि मुस्लिम वोटर नाराज हो कर चंद्रबाबू नायडू के साथ चले जाएंगे, इसलिए चंद्रबाबू नायडू को ही भाजपा से गठबंधन करने दो।

एक समय जगन मोहन रेड्डी कांग्रेस के साथ गठबंधन पर भी विचार कर रहे थे, लेकिन कांग्रेस ने उनके परिवार में फूट डाल कर उनकी बहन शर्मिला रेड्डी को पार्टी में शामिल करवा कर उन्हें प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया। जिससे जगन मोहन रेड्डी कांग्रेस से बेहद खफा हैं। इसलिए जगन के पास कोई ज्यादा विकल्प नहीं बचा है।

उड़ीसा के सत्ताधारी बीजू जनता दल का भी 15 साल बाद एनडीए में लौटना करीब करीब तय माना जा रहा है। उड़ीसा के विधानसभा चुनाव भी लोकसभा चुनावों के साथ होते हैं। 1998 से 2009 तक बीजू जनता दल एनडीए में था। 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजू जनता दल ने एनडीए छोड़ दिया था, तब भाजपा ने गठबंधन बचाने की बहुत कोशिश की थी, लेकिन नाकाम रही थी।

बीजू जनता दल ने एनडीए छोड़ने के बावजूद भाजपा से सोहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बीजू जनता दल ने संसद में संकट की हर घड़ी में केंद्र सरकार का साथ दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के साथ संपर्क में हैं।

अभी दो दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उड़ीसा दौरे के समय नवीन पटनायक के साथ उनकी केमिस्ट्री देखने के बाद कोई और तो क्या कांग्रेस महामंत्री जयराम रमेश ने ही कहा कि बीजू जनता दल भाजपा का नया पार्टनर होगा। सरकारी कार्यक्रम में जब मुख्यमंत्री नवीन पटनायक मंच पर मौजूद थे, तब प्रधानमंत्री ने उनकी और उनके पिता बीजू पटनायक की जमकर तारीफ़ की।

इस कार्यक्रम में मोदी का भाषण सुनने के बाद चौधरी चरण सिंह की तरह बीजू पटनायक को भी भारत रत्न दिए जाने की अटकलें लगनी शुरू हो गई। अभी नहीं, तो यह तय मानिए कि मोदी की तीसरी सरकार में सबसे पहले बीजू पटनायक को ही भारत रत्न की उपाधि मिलेगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उड़ीसा दौरे के बाद नवीन पटनायक ने अपने घर पर अपने दल के नेताओं के साथ गठबंधन पर बातचीत की, जबकि उसी दिन गृहमंत्री अमित शाह ने दिल्ली में उड़ीसा के भाजपा नेताओं से मुलाक़ात की। उन्होंने भी बीजू जनता दल के एनडीए में लौटने की स्थिति में उड़ीसा की राजनीतिक स्थिति पर विचार विमर्श किया।

उड़ीसा में लोकसभा की 21 सीटें हैं, जिनमें से 12 बीजू जनता दल के पास हैं, और आठ भाजपा के पास है, जबकि बाकी बची एक सीट कांग्रेस के पास है। गठबंधन की स्थिति में भाजपा लोकसभा में आधी से ज्यादा यानी 11 सीटों की मांग कर रही है, जबकि विधानसभा में वह एक तिहाई सीटें चाहती है। अगर बीजू जनता दल भाजपा को ग्यारह सीटें देने को तैयार हो जाता है, तो उसे अपनी जीती हुई दो सीटें भी छोड़नी पड़ेंगी।

तीसरा राजनीतिक दल पंजाब का अकाली दल है, जो 2020 के किसान आन्दोलन तक एनडीए में शामिल था। एनडीए से निकलने के बाद 2022 के पंजाब विधानसभा चुनावों में अकाली दल तीसरे नंबर की पार्टी बन कर रह गया। आम आदमी पार्टी ने चुनाव जीत कर सरकार बनाई और कांग्रेस विपक्षी पार्टी बनी।

अकाली दल और भाजपा का गठबंधन 1967 से जनसंघ के जमाने से चल रहा था। अब अकाली दल वापस लौटना चाहता है, दो दौर की बातचीत भी हो चुकी है, लेकिन बात सीट शेयरिंग पर अटकी है। पहले अकाली दल और भाजपा के गठबंधन में लोकसभा की तीन अमृतसर, गुरदासपुर और होशियारपुर सीटें भाजपा लड़ती थी, बाकी 10 सीटें अकाली दल लड़ता था।

इसी तरह विधानसभा की 23 सीटें भाजपा लड़ती थी, जबकि 90 सीटों पर अकाली दल लड़ता था। अब जब एक बार गठबंधन टूट चुका है, तो भाजपा नए सिरे से सीट शेयरिंग करना चाहती है। अब भाजपा ने लोकसभा की 13 में से सात सीटों पटियाला, लुधियाना, जालन्धर, अमृतसर, गुरदासपुर, होशियारपुर और आनंदपुर साहिब की मांग रख दी है।

इनमें से गुरदासपुर को छोड़कर बाकी सभी शहरी सीटें हैं। भाजपा की आधी से ज्यादा सीटों की मांग पर बातचीत टूट गई है, लेकिन उसके दुबारा शुरू होने के आसार है, क्योंकि अकाली दल को भी पता है कि भाजपा के बिना शायद वह एक सीट भी नहीं जीत सकता।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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