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Makar Sankranti Date: क्यों बदलती रहती है मकर संक्रांति की तिथि?

मकर संक्रांति के बारे में एक आम धारणा है कि यह 14 जनवरी को पड़ती है। लेकिन इधर कुछ सालों से ये 14 और 15 जनवरी के बीच पड़ रही है। आखिर क्या कारण है कि मकर संक्रांति की तिथि इस तरह आगे की ओर बढ़ते हुए बदल रही है?

Makar Sankranti Date changing according hindu calendar date

Makar Sankranti Date: मकर संक्रांति का वैदिक खगोल शास्त्र में क्या उल्लेख है, उनके अनुसार संक्रांति क्या है? यह समझना महत्वपूर्ण है। 'संक्रान्ति' का अर्थ है सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाना, अत: वह राशि जिसमें सूर्य प्रवेश करता है, उसे संक्रान्ति कहते है। इस प्रकार मकर संक्रांति का अर्थ हुआ - सूर्य का मकर राशि में प्रवेश।

मकर संक्रान्ति का उद्गम बहुत प्राचीन नहीं है। एक हजार ईसा पूर्व के ब्राह्मण एवं औपनिषदिक ग्रंथों में उत्तरायण के छ: मासों का उल्लेख है। जिसमें 'अयन' शब्द आया है, जिसका मतलब होता है 'मार्ग' या 'स्थल। गृह्यसूत्रों में उत्तरायण के लिए उदगयन शब्द का प्रयोग किया गया है। इस काल में संस्कारों के करने की विधि वर्णित है। किंतु प्राचीन श्रौत, गृह्य एवं धर्म सूत्रों और याज्ञवल्क्य स्मृति में भी राशियों का उल्लेख नहीं है, उनमें केवल नक्षत्रों के संबंध में कालों का उल्लेख है।

'उदगयन' बहुत शताब्दियों पूर्व से शुभ काल माना जाता रहा है, अत: मकर संक्रान्ति का भी दैवीय करण इसी कारण है। मकर संक्रांति को खगोलीय घटना क्रम के रूप में समझा जा सकता है।
मकर या कैप्रिकॉर्न (Capricorn या Capricornus) तारामंडल राशिचक्र का एक तारामंडल है। पुरानी खगोलशास्त्रीय पुस्तकों में इसे अक्सर सींगों वाले जीव के रूप में, जो आधा बकरा जैसा और एक शार्क मछली जैसा, दर्शाया जाता था।

आकाश में इसके पश्चिम में धनु तारामंडल होता है और इसके पूर्व में कुम्भ तारामंडल। दूसरी शताब्दी ईसवी में टॉलमी ने जिन 48 तारामंडलों की सूची बनाई थी यह उनमें से एक है और (इंटरनेशनल एस्ट्रॉनमी यूनियन) अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ द्वारा जारी की गई 88 तारामंडलों की सूची में भी यह शामिल है। मकर तारामंडल आकाश में काफ़ी धुंधला नज़र आता है और कर्क तारामंडल के बाद राशिचक्र का दूसरा सबसे धुंधला तारामंडल है।

राशि का अर्थ पुंज समूह से है। गणित में गुणा भाग की संख्या यानी विभाजित की जाने वाली संख्या को भी राशि कहते हैं। तो खगोलीय अध्ययन में जहां तक के पिण्ड, पुंज समूह पृथ्वी पर अपना प्रभाव डालते हैं, उन्हें कृत्रिम रेखाओं के माध्यम से विभाजित किया गया है। यह कुछ विशिष्ट कारणों से बारह भागों में विभाजित है। इन्हें भी राशि कहते हैं। राशियों का प्रारंभ मेष राशि से होकर अंत मीन राशि पर होता है। इस राशि के समूह को राशि चक्र या भाग चक्र कहते हैं।

यह ग्रहों के मार्ग के हिस्सों में रहता है। यह मार्ग 360 अंश का है। इसके सम बारह हिस्से अर्थात 30-30 अंश की जगह खगोल में एक-एक राशि के हैं। अर्थात प्रत्येक राशि 30 अंश की है। इनके नाम उस स्थान की भौगोलिक आकृति के आधार पर हमारे ऋषियों ने अथवा आदि ज्योतिषियों ने दिए हैं। अर्थात प्रथम शून्य से लेकर 30 अंश तक की भौगोलिक स्थिति भाग चक्र को मेष कहा गया है। इसी प्रकार मकर दसवीं राशि है।

मकर रेखा (Tropic of Capricorn) पृथ्वी के दक्षिणी गोलार्ध में भूमध्य रेखा‎ के समानान्तर 23 डिग्री 26' 22" दक्षिण अक्षांश पर, ग्लोब पर पश्चिम से पूर्व की ओर खींची गई एक कल्पनिक रेखा हैं। 22 दिसम्बर को सूर्य मकर रेखा पर लम्बवत चमकता है। जहाँ से 30° की राशि को पार कर, 12-14 जनवरी के लगभग पुनः मकर रेखा की ओर चलायमान होता है। यह एक काल्पनिक मानक रेखा है, उसका सटीक विश्लेषण करना अत्यंत कठिन है परन्तु कालगणना के भारतीय खगोल विज्ञान के मानक के अनुसार मकर संक्रांति की तिथि इसी से तय की जाती है।

मकर रेखा या दक्षिणी गोलार्ध पांच प्रमुख अक्षांश रेखाओं में से एक है, जो पृथ्वी के मानचित्र पर परिलक्षित होती है। मकर रेखा पृथ्वी की दक्षिणतम अक्षांश रेखा है, जिस पर सूर्य दोपहर के समय लम्बवत चमकता है। यह घटना दिसंबर संक्रांति के समय होती है। जब दक्षिणी गोलार्ध सूर्य के समकक्ष अत्यधिक झुक जाता है। उत्तरी गोलार्ध में कर्क रेखा उसी भांति है, जैसे दक्षिणी गोलार्ध में मकर रेखा। मकर रेखा के दक्षिण में स्थित अक्षांश, दक्षिण शीतोष्ण क्षेत्र मे आते हैं। मकर रेखा के उत्तर तथा कर्क रेखा के दक्षिण मे स्थित क्षेत्र उष्णकटिबन्ध कहलाता है।

इसे थोड़ा और विस्तार से समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि Tropic ट्रोपिक शब्द ग्रीक से आया है (τροπικός) जिसका अर्थ है "पार्श्व भाग" या 'back'। खगोलीय क्षेत्र में, ट्रॉपिक शब्द का उपयोग उत्तर (कर्क रेखा) और पृथ्वी के दक्षिण में (मकर रेखा) से अधिक अक्षांशों को नामित करने के लिए किया जाता है, जिस पर सूर्य आकाश में इस अधिकतम ऊंचाई पर पहुँच सकता है।

इसका मतलब यह है कि वर्ष के एक निश्चित समय में, सूर्य पूरी तरह से पृथ्वी की सतह पर लंबवत रूप से मकर रेखा के ऊपर प्रभावी रहता है। इसी घटना को मकर संक्रांति कहा जाता है।

मकर रेखा के ट्रॉपिक के नाम की उत्पत्ति लगभग 2000 साल पहले से है। जब शास्त्रीय पुरातनता में, दक्षिणी गोलार्ध में संक्रांति देखी गई, तो सूर्य मकर राशि के नक्षत्र में था, इसलिए उसका नाम मकर संक्रांति कहा गया। यही पारंपरिक नाम सदियों से आज तक कायम है।

मकर रेखा (Tropic of Capricorn) एक अक्षांश से जुड़ा एक समानांतर है जिसकी शास्त्रीय प्राचीनता के बाद भी काफी प्रासंगिकता रही है। इस ट्रॉपिक द्वारा चिह्नित पृथ्वी के चारों ओर अक्षांश रेखा भूगोल और खगोल विज्ञान जैसे विषयों के लिए मौलिक है। पृथ्वी के अक्षांश में इन स्थितियों की गणना और प्रभाव को समझाने, बताने के लिए पंचांग का निर्माण किया गया था। यह त्योहार भारतीय काल गणना के नियम पर आधारित है जहां प्रतिवर्ष सूर्य का मकर राशि में प्रवेश 20 मिनट आगे बढ़ता जाता है।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारे भारतीय पंचांग के अनुसार व्रत, त्यौहार चन्द्रमा की गति को आधार बना कर निर्धारित किए जाते हैं। अर्थात्‌ वे पृथ्वी के घूमने की गति से तय होते हैं, जबकि मकर संक्रांति सूर्य की कक्षा में उसके अयन परिवर्तन के अनुसार निर्धारित होता है। सूर्य, पृथ्वी या चंद्रमा की तरह किसी पिंड की परिक्रमा नहीं करता तो इसके वर्ष में या अयन परिवर्तन के क्रम में समय का कोई विशेष अन्तर नहीं आता है।

मकर संक्रांति मनाए जाने की तारीख में परिवर्तन प्रति लीप वर्ष के कारण भी आगे पीछे हो जाता है। साथ ही, पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है जहां प्रतिवर्ष 20 मिनट का समय अन्तराल बढ़ जाता है। यह स्थिति 72 वर्षों में 1 अंश की कमी कर देता है। जो पूरे एक दिन के समय का अन्तर उत्पन्न करता है।

अभी से लगभग 1800-2000 वर्ष पूर्व मकर संक्रांति 22 दिसंबर के आसपास मानी जाती थी। इसी गति और समय अन्तराल के बढ़ते क्रम के कारण यह संक्रांति अब 14-15 जनवरी तक आ गई है। लगभग 80 से 100 वर्ष में यह संक्रांति काल 1 दिन बढ़ जाता है।

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    पिछले कुछ वर्षो से यह पुण्यकाल 15 जनवरी माना जा रहा है, जबकि उसके पहले कई वर्षो तक यह 14 जनवरी को ही मनाया जाता था। 19 वीं शताब्दी में शुरुआती समय में मकर संक्रांति 13-14 जनवरी के मध्य पुण्यकाल बदलता रहा और फिर 14 जनवरी पर कई वर्षो के लिए स्थिर हो गया। अब पुनः 14-15 जनवरी के मध्य परिवर्तित होते हुए 15 जनवरी पर स्थिर होने की ओर यह क्रम बढ़ गया है। अगले 72-80 वर्षों में संक्रान्ति की तारीख एक दिन आगे बढ़कर 15-16 जनवरी में खिसक जाएगी।

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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