NEP: स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक शुरु हुआ शिक्षा का भारतीयकरण
NEP: स्वतंत्रता के पश्चात सत्ता का हस्तांतरण तो हुआ, पर प्रशासनिक नीतियों पर कमोवेश औपनिवेशिक मानसिकता ही हावी रही। समय-समय पर भारत और भारतीयता को पोषित करने वाले विचार व स्वर सुनाई तो अवश्य देते रहे, पर परिवर्तन की निर्णायक परिणति तक वे नहीं पहुँच पाए। परिणाम यह हुआ कि शिक्षा व व्यवस्था संबंधी जिन प्रश्नों व समस्याओं से हम स्वतंत्रता के पूर्व जूझ रहे थे, उनसे आज भी दो-चार हो रहे हैं। हमारा 'स्व' कहीं विस्मृत हो गया था, जिसे पाने और पहचानने का गंभीर प्रयास व पहल भी बीते दशकों में लगभग नहीं के बराबर हुआ। राष्ट्र के 'स्व' को पहचानने, पाने एवं आत्मसात करने में शिक्षा और उसमें भी भारतीय ज्ञान-परंपरा की महती भूमिका है। भारतीय ज्ञान-परंपरा के जिन विषयों को पिछड़ा व प्रतिगामी मानकर लगभग विस्मृत कर दिया गया था, सुखद है कि अब जाकर उसकी सुधि ली गई है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान-परंपरा के अध्ययन-अध्यापन पर विशेष बल दिया गया है। नई पीढ़ी को भारतीय ज्ञान-परंपरा से जोड़ने की दिशा में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने गंभीर पहल की है। स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक के प्रत्येक विषय या कोर्स में अब भारतीय ज्ञान परंपरा से संबद्ध ऐसी बातों व अध्यायों को जोड़ा जा रहा है, जिनसे नई पीढ़ी में भारतीय होने का गौरवबोध तो जागृत होगा ही, साथ ही उस ज्ञान के बल पर उन्हें पूरी दुनिया में एक मौलिक एवं विशिष्ट पहचान भी मिलेगी।

इसके अंतर्गत यूजीसी ने भारतीय ज्ञान-परंपरा पर आधारित एक पाठ्यक्रम भी तैयार किया है, जिसमें महाभारत काल में कृषि और सिंचाई जैसी व्यवस्था, खगोल विज्ञान की वैदिक अवधारणाएँ और वैदिक गणित, सुश्रुत संहिता में वर्णित की गई प्राचीन भारतीय प्लास्टिक और मोतियाबिंद सर्जरी, रामायण काल में कृषि और सिंचाई की तकनीक आदि विषयवस्तु को भी प्रमुखता से जगह दी गई है। इसके साथ ही प्राचीन भारत में अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े उन विद्वानों का भी उल्लेख किया गया है, जिन्होंने भारतीय शिक्षा को एक नई ऊँचाई दी थी। इनमें चरक, सुश्रुत, आर्यभट, वराहमिहिर, भास्कराचार्य, ब्रह्मगुप्त, चाणक्य, पाणिनी, पतंजलि, मैत्रेयी और गार्गी आदि विद्वानों के नाम सम्मिलित किए गए हैं।
उल्लेखनीय है कि भारतीय ज्ञान परंपरा के अंतर्गत जिन विषयवस्तु को आधुनिक विषयों के रूप में पढ़ाने की संस्तुति की गई है, उनमें प्राचीन बीज गणित, ज्योतिष, भारतीय वाद्य यंत्र, भारतीय भाषा विज्ञान, भारतीय धातुशास्त्र, भारतीय वास्तुशास्त्र, भारतीय मूर्त्ति विज्ञान और प्राचीन भारत में जल प्रबंधन आदि के साथ वेद, वेदांग, भारतीय दर्शन, साहित्य, छंद, व्याकरण, निरुक्त, चिकित्सा, कृषि, अर्थशास्त्र आदि को शामिल किया गया है। यूजीसी ने भारतीय ज्ञान-परंपरा को प्रोत्साहन देने के लिए अनेक स्तरों पर प्रयास तीव्र किए हैं।
मसलन विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में पढ़ाने वाले शिक्षकों को भारतीय ज्ञान-परंपरा में प्रशिक्षित करने की योजना प्रारंभ की गई है। इसी शैक्षणिक सत्र में एक हजार शिक्षकों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया है। सभी उच्च शिक्षण संस्थानों से दो-दो शिक्षकों को इसके लिए नामित करने के लिए भी कहा गया है। उच्च शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों को यूजीसी द्वारा जारी दिशानिर्देशों के अनुसार प्रशिक्षण की कुल अवधि में से कम-से-कम दस प्रतिशत समय भारतीय ज्ञान-परंपरा के लिए सुनिश्चित किया गया है।
महत्त्वपूर्ण है कि इस पूरी प्रक्रिया में भारतीय ज्ञान को एक स्वतंत्र विषय के रूप में पढ़ाने के स्थान पर, वर्तमान में पढ़ाए जा रहे प्रत्येक विषय में उससे संबंधित प्राचीन एवं परंपरागत विषयवस्तु को जोड़ा जाएगा। उस विषय से जुड़े भारतीय विद्वानों का उल्लेख करते हुए उनके योगदान पर प्रकाश डाला जाएगा। किसी विषय को पढ़ाने के क्रम में उससे जुड़े प्राचीन भारतीय ज्ञान, उदाहरण या जानकारी छात्रों को देने के लिए शिक्षकों को प्रेरित एवं प्रोत्साहित किया जाएगा।
विद्यालयी शिक्षा के लिए तैयार किए जा रहे पाठ्यक्रम में भी भारतीय ज्ञान-परंपरा को प्रमुखता से स्थान देने की पैरवी की गई है। फाउंडेशन स्तर के पाठ्यक्रम में भी इसकी झलक देखने को मिल रही है। इस स्तर के पाठ्यक्रम में सम्मिलित किए गए खिलौनों को भी भारतीय ही रखा गया है, ताकि बच्चे उन्हें आसानी से पहचान सकें और उनके माध्यम से अपने पास-परिवेश से सहजता से जुड़ सकें। ऐसी व्यवस्था बनाई गई है कि स्नातक स्तर के कुल अनिवार्य पाठ्यक्रम में से न्यूनतम पाँच प्रतिशत क्रेडिट भारतीय ज्ञान-परंपरा के पाठ्यक्रम में से छात्रों को मिले। इससे छात्रों को इस पाठ्यक्रम को पढ़ने की प्रेरणा व प्रोत्साहन मिलेगा।
स्मरण रहे कि घोर उपेक्षा, नीतिगत भेदभाव, क्षद्म पंथनिरपेक्षता, औपनिवेशिक मानसिकता तथा अपने देश व संस्कृति के प्रति हीन भावना आदि के कारण भारतीय ज्ञान-परंपरा लगभग विलुप्ति के कगार पर खड़ी है। दुनिया का हर जागरूक एवं विकसित देश अपनी सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान-परंपरा एवं विरासत को सहेजने-संभालने का हर संभव प्रयत्न करता है। फिर भारत तो एक ऐसा देश है, जिसकी सभ्यता, संस्कृति व परंपरा आदि में दुनिया को दिशा देने वाली शाश्वत एवं मौलिक विशेषताएँ देखने को मिलती हैं। बल्कि यह कहना अनुचित नहीं होगा कि तमाम झंझावातों तथा आक्रमणों को झेलकर भी उसने अपनी मौलिकता एवं सार्वभौमिकता नहीं खोई है। हिंसा व कलह से पीड़ित विश्व-मानवता को राह दिखाने की शक्ति भारतीय ज्ञान-परंपरा में निहित है। यूरोप एवं अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसियाँ यदि प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान की स्थापनाओं के आधार पर अंतरिक्ष के रहस्यों को सुलझाने के प्रयास कर सकती हैं और पूरा विश्व यदि कोविड जैसी आपदाओं से लड़ने के लिए योग और आयुर्वेद को मज़बूत सुरक्षा-कवच मान सकता है तो इन्हें पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने पर भारत में किसी को क्यों आपत्ति होनी चाहिए?
योग, आयुर्वेद, स्थापत्य, अनुष्ठानिक कर्म, पौरोहित्य, दस्तकारी, कृषि, पशुपालन, बागवानी आदि क्षेत्रों में ऐसी अनेक प्राचीन ज्ञान परंपराएँ बिखरीं पड़ी हैं, जो रोज़गार की दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत जैसी बड़ी जनसंख्या वाले देश के लिए आजीविका के पारंपरिक स्रोतों का अपना महत्त्व है। पश्चिमी अंधानुकरण, अतिशय भौतिकता एवं भयानक यांत्रिकता आदि के कारण आज हम भारतीयों के जीवन में अनेक विसंगतियाँ देखने को मिलती हैं। भारतीय ज्ञान-परंपरा उन विसंगतियों को दूर कर मनुष्य का मनुष्य तथा प्रकृति- परिवेश- पर्यावरण आदि के मध्य बेहतर संबंध व संतुलन स्थापित करने में सहायक सिद्ध होगी। निश्चय ही यह एक स्वागत योग्य क़दम है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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