दलितों के पैर धोकर क्या चुनावी कुंभ पार कर पाएंगे पीएम नरेंद्र मोदी?
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नई दिल्ली। कुम्भ में डुबकी लगाकर राजनीति में उबरने की कोशिश का एक और उदाहरण सामने है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रयागराज कुम्भ में डुबकी लगाकर 130 करोड़ लोगों के लिए कामना की है। कह सकते हैं कि उन्होंने खुद को 130 करोड़ का पर्याय बना लेने के लिए डुबकी लगायी है। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने कुम्भ में डुबकी के बाद पांच स्वास्थ्यकर्मियों के पैर भी धोए हैं। यह घटना राजनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है और सबका ध्यान खींचती है। इसे कुम्भ का राजनीतिक इस्तेमाल भी कह सकते हैं और कुम्भ के आध्यात्मिक महत्व में सामाजिक सरोकार को जोड़ने की क्रांतिकारी कवायद भी।

गांधी के नक्शेकदम पर चलने की कोशिश
स्वच्छता को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमेशा ही महात्मा गांधी से जोड़ा है। उनके जन्म के डेढ़ सौ साल पूरे होने का यह वर्ष है। पीएम मोदी ने उन्हें मिला सोल पीस प्राइज की राशि भी स्वच्छता के नाम की और उसे नमामि गंगे परियोजना को सुपुर्द किया है। ऐसे में गांधीजी के रास्ते पर चलने की कोशिश भी नरेंद्र मोदी ने दिखलायी है।
महात्मा गांधी ने मंदिरों में प्रवेश दिलाकर दलितों को सम्मान दिलाने का प्रयास किया था। इसके लिए सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई लड़ी थी। एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छता कर्मचारियों के पैर धोकर उसी सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई को आगे बढ़ाया है। इसके लिए उन्होंने कुम्भ का इस्तेमाल किया है और यह वर्ष चुनाव का वर्ष भी है, तो यह उनकी राजनीति का तरीका भी है।
राजनीति इंदिरा गांधी ने भी की थी। कुम्भ का इस्तेमाल उन्होंने भी किया था। आपातकाल के बाद देश में चुनाव कराने की ज़रूरत उन्होंने कुम्भ में बतायी। कुम्भ में ही इंदिरा गांधी ने संकेत दिया था कि देश में चुनाव जरूरी है। लोकतंत्र का कुम्भ तो चुनाव ही होता है। एक तरह से उन्होंने कुम्भ में लोकतंत्र के कुम्भ का सम्मान करने का संकल्प जताया था।

कुम्भ में ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ का क्या औचित्य?
अब तक कुम्भ में सकारात्मक संकल्प लिए जाने की परम्परा रही है। मगर, इस बार यह परम्परा टूटी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी कैबिनेट के सदस्य जब प्रयागराज में कुम्भ के दौरान डुबकी लगा रहे थे तो एक नारा लगाया जा रहा था, ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद'। यह पुलवामा हमले के बाद नाराज़गी का प्रकटीकरण था। मगर, इसके लिए कुम्भ जैसा स्थान कतई सही नहीं हो सकता।
कुम्भ में डुबकी को पुण्य की डुबकी कहते हैं। डुबकी लगाने वालों के पाप धुलने की मान्यता है। डुबकी लगाने वाले यहां दूसरों के लिए बर्बादी की कामना नहीं करते। ऐसे में पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाना गलत है। कभी पाकिस्तान भी हिन्दुस्तान का हिस्सा था। वहां रहने वाले लोग भी कुम्भ में डुबकी लगाया करते थे। इस बात को भुलाया नहीं जाना चाहिए।

दलितों के प्रति बदलेगी सोच
प्रयागराज कुम्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सफाई कर्मचारियों के पैर धोना प्रतीकात्मक घटना जरूर है, मगर इसका महत्व क्रांतिकारी है। दलितों के प्रति सोच को बदलने के लिए जो देश में राजनीतिक घटनाएं होती रही हैं, उसकी यह कड़ी भी है और इस कड़ी में एक प्रयोग भी है।
प्रतीकात्मक घटनाएं तो वह भी होती हैं जब नेता दलितों के घर भोजन करने जाते हैं। मगर, अब उसमें विकृति आ चुकी है। सोच भी बदली है। दलितों के घर जाना, उनसे ही सत्कार कराना और वहां बिसलेरी के बोतल वाले पानी पीना या फिर होटल के खाने मंगाकर पांत में बैठकर खाना- ऐसी घटनाओं ने उस पहल की अहमियत ख़त्म कर दी है जब कभी इसकी शुरुआत की गयी थी।
प्रधानमंत्री मोदी ने दलितों के सम्मान का एक ऐसा तरीका निकाला है जिसमें मिलावट की सम्भावना बहुत कम है। अगर दलितों के पैर धोने हैं तो इसका विकल्प नहीं है। आपको पैर धोना ही होगा। कोई दिखावा करके बचा नहीं जा सकता। राजनीति में यह नरेंद्र मोदी का इनोवेशन है। इस इनोवेशन का जवाब देश में विपक्ष के पास नहीं है। ऐसा करके पीएम मोदी ने अपने विरोधियों से चुनाव वर्ष में एक मजबूत अस्त्र छीन लिया है।












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