Mukhtar Ansari: यूपी की जिन जेलों में चलती थी मुख्तार की हुकूमत, वहीं मिली मौत
Mukhtar Ansari: बात सन 1991 के दिसंबर महीने की है। सुबह के कोई साढ़े आठ बज रहे थे। एक जिप्सी मुगलसराय रेलवे ट्रैफिक अस्पताल के ठीक सामने जीटी रोड पर रुकी हुई थी। उसमें से गाड़ी चला रहा व्यक्ति उतर कर कुछ सामान खरीदने चला गया। दूसरा व्यक्ति जिप्सी की अगली सीट पर बैठा रहा।
इसी बीच रुटीन गश्त पर निकले मुगलसराय कोतवाल ननके सिंह जनवार की नजर जिप्सी पर पड़ी। जनवार ने जिप्सी की अगली सीट पर बैठे मुख्तार अंसारी को सरसरी तौर पर पहचान लिया था, लेकिन पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो पाये थे। वह मुख्तार को थाने ले जाकर पूछताछ कर उसकी पहचान पुख्ता करना चाहते थे।

कोतवाल ने अपनी जीप मुख्तार की जिप्सी के सामने लगवादी। इतने में मुख्तार का साथी भी दुकान से आकर जिप्सी की ड्राइविंग सीट पर बैठ गया। पुलिस को मुख्तार की तलाश चेतगंज थाना क्षेत्र में 3 अगस्त 1991 को हुए अवधेश राय हत्याकांड में थी। इस हत्याकांड को मुख्तार अंसारी, भीम सिंह, राकेश पांडेय एवं अन्य कई ने अंजाम दिया था।
कोतवाल नीचे उतरे तथा अपने एक हमराह सिपाही शिवजी पांडेय को मुख्तार की जिप्सी में बंदूक समेत बैठा दिया। तभी उन्हें सैयदराजा थाने में तैनात एक परिचित सिपाही रघुवंश सिंह भी नजर आ गया, जो छुट्टी से लौटकर सैयदराजा जाने के लिये वाहन का इंतजार कर रहा था। उसने वर्दी नहीं पहन रखी थी।
कोतवाल जनवार ने उसे भी अपने सिपाही के साथ मुख्तार की जिप्सी में बैठा दिया तथा जिप्सी समेत मुख्तार और उसके साथी को लेकर थाने चलने को कहा। इसके बाद कोतवाल अपनी जीप में बैठ गये। कोतवाल की जीप यू टर्न लेकर थाने की तरफ जैसे ही मुड़ी, तभी जिप्सी यूटर्न लेने की बजाय तेजी से चंदौली की तरफ भागने लगी।
तेज भागती जिप्सी चार सौ मीटर दूर जाकर रेलवे के पुल से टकरा गई। मुख्तार और उसका साथी जिप्सी से उतर कर तेजी से रेलवे यार्ड से भागते हुए गायब हो गये। कोतवाल ननकू सिंह जनवार जब अपनी जीप को वापस मोड़कर पुल पर पहुंचे तो देखा रघुवंश को गोली लगी हुई है तथा उनका सिपाही शिवजी पांडेय भी घायल है।
तत्काल वे दोनों सिपाही को लेकर रेलवे के लोको अस्पताल पहुंचे, लेकिन लोको अस्पताल में प्राथमिक उपचार के बाद बनारस में कबीरचौरा के लिये रेफर कर दिया। रघुवंश की रास्ते में ही मौत हो गई। घायल सिपाही शिवजी ने बताया कि उसने जैसे ही जिप्सी को मोड़ कर थाने चलने को कहा, गाड़ी चला रहा मुख्तार के साथी ने जिप्सी सीधे भगा दी, और मुख्तार सिपाही की बंदूक छीनने की कोशिश करने लगा तथा दूसरे सिपाही को गोली मार दी। जांच में सामने आया कि मुख्तार के साथ गाड़ी चला रहा शख्स भीम सिंह था, जो मुख्तार के अपराध की दुनिया में बराबर का साथी था। अवधेश राय हत्याकांड में भीम भी आरोपी था।
तब मुगलसराय बनारस जिले का हिस्सा था, और अवधेश राय हत्याकांड के बाद मुख्तार तेजी से उभरता हुआ माफिया। वह अपराधियों को जोड़कर अपना गिरोह मजबूत कर रहा था। उसकी नजर एशिया के सबसे बड़े चंधासी कोल मंडी तथा रेलवे स्क्रैप के कारोबार पर थी। इन दोनों कारोबार पर कब्जा जमाने की राह में उसे सबसे बड़ी चुनौती विरोधी माफिया बृजेश सिंह से मिल रही थी। बृजेश सिंह भी अपराध की दुनिया में कदम रखने के बाद अपनी आर्थिक ताकत बढ़ाने में जुटा हुआ था। बृजेश सिंह अपने पिता के हत्यारों को मारने के बाद पूर्वांचल के अपराध की दुनिया में बड़ा नाम बन चुका था।
मुख्तार अंसारी का गैंग पीडब्ल्यूडी ठेके, रंगदारी और अपहरण के जरिए पैसा जुटाने में जुटा था तो बृजेश गैंग पीडब्ल्यूडी ठेकों के अलावा रंगदारी, रेलवे स्क्रैप और कोयले के कारोबार से अपना आर्थिक साम्राज्य बढ़ा रहा था। अपहरण जैसे अपराध से पैसा बनाने के बजाय बृजेश गैंग कोयला कारोबार जैसे अपेक्षााकृत सुरक्षित रास्ते से पैसा बना रहा था। चंधासी की कोयला मंडी पर बृजेश गैंग हावी था। उसका सबसे बड़ा कारण अवधेश राय थे। अवधेश राय की चंधासी कोल मंडी के व्यपाारियों में तूती बोलती थी। इसी कोयले के कारोबार पर कब्जा करने के लिये मुख्तार अंसारी ने अवधेश राय की हत्या को अंजाम दिया था।
इस हत्याकांड के बाद बनारस जोन में इन दोनों गैंगों के बीच अनगिनत गैंगवार की घटनाएं हुई। इसमें दोनों तरफ के दर्जनों लोग मारे गये, जिनमें शूटर से लेकर इन दोनों गैंगों को पनाह देने वाले सफेदपोश भी शामिल रहे। बृजेश गैंग मुख्तार पर लगातार हावी रहा, लेकिन सन 1996 के बाद समीकरण बदलने लगे। मुख्तार ने अपराध की दुनिया से निकलकर राजनीति में भी अपने कदम रख दिये। 1996 के विधानसभा चुनाव में वह बसपा के टिकट पर जीतकर पहली बार मऊ से विधायक बन गया। अपराधी के राजनेता बनते ही बहुतेरे समीकरण मुख्तार के पक्ष में होने लगे। बृजेश सिंह का गैंग कमजोर पड़ने लगा।
यह लंगड़ी सरकारों का दौर था। सपा और बसपा को सरकार बनाने के लिये मुख्तार जैसे तमाम विधायकों की जरूरत थी। मुख्तार ऐसी सरकारों की जरूरत बन गया। अपने खौफ के बल पर सत्ताधारी दलों के लिये विधायक भी जुटाने लगा। परिणाम, मुख्तार को सत्ता के साथ पुलिस का भी साथ मिला।
मुख्तार के इशारे पर पुलिस बृजेश गैंग के अपराधियों का खात्मा करने में जुट गई। विधायक बनने के बाद मुख्तार इतना बेखौफ हो गया कि उसने 22 जनवरी 1997 को विश्व हिंदू परिषद के कोषाध्यक्ष एवं चंधासी के बड़े कोल व्यापारी नंदकिशोर रुंगटा का अपहरण करा लिया। रुंगटा के परिजनों से पांच करोड़ की रंगदारी मांगी गई। बताते हैं कि रुंगटा परिवार ने सवा करोड़ रुपये मुख्तार अंसारी को दिये, लेकिन नंदलाल रुंगटा वापस नहीं आये। आरोप है कि मुख्तार ने नंदकिशोर रुंगटा की हत्या करवा कर उनके शव को गंगा नदी में फिंकवा दिया था।
इस घटना के बावजूद सपा और बसपा की लंगड़ी सरकारें मुख्तार के साथ खड़ी रहीं। मुख्तार अपनी सहूलियत के हिसाब से कभी सपा तो कभी बसपा का दामन थामता रहा। मुख्तार अंसारी रुंगटा अपहरण कांड के बाद निर्विवाद रुप से पूर्वांचल का सबसे बड़ा माफिया बन चुका था। कोयला कारोबार पर भी उसका वर्चस्व बढ़ने लगा था। रुंगटा कांड के बाद बसपा ने मुख्तार से अपना पीछा छुड़ा लिया।
बसपा से निकाले जाने के बाद मुख्तार ने सपा से नजदीकी बढ़ाई और माफिया सरपस्त मुलायम सिंह यादव की गोद में जा बैठा। मुलायम के मुख्यमंत्रित्व काल में मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, डीपी यादव जैसे माफियाओं का वर्चस्व बढ़ गया। इसी बीच 2001 में गाजीपुर के उसरी चट्टी क्षेत्र में बृजेश सिंह ने फिल्मी स्टाइल में एक ट्रक पर सवाल होकर मुख्तार अंसारी पर जानलेवा हमला किया, लेकिन वह बाल-बाल बच निकला। मुख्तार के गनर समेत तीन लोगों की मौत हो गई। बृजेश गैंग ने मुख्तार के काफिले पर आगे और पीछे से हमला करने की रणनीति बनाई थी, लेकिन पीछे वाली कार के रेलवे क्रासिंग पर फंस जाने से रणनीति असफल हो गई।
मुख्तार को दूसरा झटका तब लगा, जब 1985 से मोहम्मदाबाद सीट से लगातार पांच बार से जीतते आ रहे उसके बड़े भाई अफजाल अंसारी की 2002 के चुनाव में हार हो गई। भाजपा के टिकट पर कृष्णानंद राय ने अफजाल को पटखनी दे दी। कृष्णानंद की बृजेश से नजदीकी थी। यह मुख्तार के लिए बड़ा सदमा था।
वर्ष 2004 में लखनऊ के कैंट इलाके में मुख्तार एवं कृष्णानंद राय के गुट के बीच आमने-सामने गोलीबारी हुई। कृष्णानंद राय का गुट भारी पड़ा, जिसकी वजह से मुख्तार का काफिला अपनी जान बचाकर कालीदास मार्ग की तरफ भाग गया। इस घटना के बाद यह तय हो गया था कि दोनों गुटों में बड़ा गैंगवार होगा।
इस घटना के बाद मुख्तार ने कृष्णानंद राय की हत्या की रणनीति बनानी शुरू कर दी। उसने सेना के भगोड़े सैनिक बाबूलाल यादव से एक करोड़ रुपये में एलएमजी खरीदी ताकि कृष्णानंद की बुलेटप्रुफ गाड़ी को भेदा जा सके। इस डील का खुलासा एसटीएफ के तत्कालीन डिप्टी एसपी शैलेंद्र सिंह ने एलएमजी को बरामद करते हुए किया।
शैलेंद्र सिंह के पास मुख्तार की जेल से हुई बातचीत का वायस रिकार्डिंग भी था, जिसके आधार पर उन्होंने मुख्तार पर कड़ी कार्रवाई शुरू की, लेकिन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव नाराज हो गए तथा पुलिस अधिकारियों का तबादला कर दिया। मुलायम ने शैलेंद्र को इतना परेशान कर दिया कि उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया।
इस बीच, 2005 के अक्टूबर महीने में मऊ में भरत मिलाप कार्यक्रम के दौरान दंगा भड़क उठा। दंगे के दौरान मुख्तार एक खुली जीप पर चढ़कर दंगाइयों को समर्थन देता रहा। आरोप लगा कि मुख्तार के इशारे पर मऊ में दंगा हुआ तथा इसने पुलिस के सहयोग से दंगाइयों की मदद की। तब सूबे में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी, और मुख्तार मऊ से विधायक था। गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ ने जब इस दंगे का विरोध किया तब मुलायम सरकार ने उनके खिलाफ अपनी सरकारी मशीनरी लगा दी। मुलायम की सरपरस्ती में मुख्तार बेखौफ हो चुका था।
दंगे के बाद जब चौतरफा राजनीतिक दबाव बनने लगा, तब अक्टूबर 2005 में ही मुख्तार ने मऊ दंगा मामले में सरेंडर कर दिया, जिसके बाद उसे जेल भेज दिया गया। हालांकि जेल में उसे किसी प्रकार की असुविधा नहीं थी। वह अब जेल में सुरक्षित बैठकर अपना साम्राज्य चला रहा था।
गाजीपुर जेल में उसके प्रभाव का आलम यह था कि तत्कालीन डीएम-एसपी उसके साथ बैडमिंटन खेलने जेल में आते थे। जेल में रहते हुए ही मुख्तार ने मुन्ना बजरंगी, राकेश पांडेय उर्फ हनुमान, संजीव माहेश्वरी उर्फ जीवा, अतीकुर्रहमान उर्फ बाबू के जरिये 29 नवंबर 2005 को कृष्णानंद राय समेत सात लोगों की हत्या करा दी।
इस हत्याकांड से पूरा यूपी दहल उठा। वर्ष 2005 में यह दूसरे विधायक की हत्या थी। इसी साल के शुरुआत में अतीक अहमद ने बसपा विधायक राजूपाल की हत्या कराई थी। मुख्तार की इतनी हनक थी कि वह आगरा, लखनऊ या किसी जेल में रहा, उसके लिये जेल में ही सुविधा के सारे साजो सामान उपलब्ध रहे। उसके लोग बेखौफ जेल में उससे मिलने आते थे, कोई रोक-टोक नहीं थी। वह जेल में ही तमाम मामले सुलझाता था। लखनऊ जेल में तो उसने ताजी मछली खाने के लिये तालाब तक खुदवा दिया था। सपा, बसपा और भाजपा सरकार में भी उसे रोकने वाला कोई नहीं था।
मुख्तार का खौफ ही था कि चार दशक में 65 से ज्यादा गंभीर मुकदमों में नामजद होने के बावजूद उसे किसी भी मामले में सजा नहीं मिली थी। योगी की पहली सरकार में तमाम अपराधियों की तरह मुख्तार के खिलाफ ट्रायल तेज हुआ, और उसकी दूसरी सरकार में मुख्तार को 2022 से आठ मामलों में सजा मिल चुकी थी।
कभी यूपी की जेलों को अपना आरामगाह बनाने वाले मुख्तार को योगी सरकार में यही जेल काटने लगी थी। वह यूपी से बाहर रहने के लिए हाथ-पांव मार रहा था। खाने में जहर दिये जाने का आरोप लगाकर किसी दूसरी जेल में जाना चाहता था, लेकिन नियति ने उसे उत्तर प्रदेश के बाहर की किसी जेल में जाने का मौका नहीं दिया। मऊ जेल से अक्टूबर 2005 में शुरू हुआ उसका जेल का सफर बांदा में मार्च 2024 में आकर खत्म हो गया।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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