MS Swaminathan: चले गए हरित क्रांति के जन्मदाता
ऐसी घटनाएं कम हुई हैं, जिनके कारण देश के अंदर बड़ा बदलाव आया हो, जो देश के अंदर परिवर्तन के इतिहास में मील का पत्थर हो। हम जब भी ऐसे किसी परिवर्तनों की सूची बनाएंगे तो उसमें हरित क्रांति का नाम पहले नंबर पर ही होगा। हमारे दैनिक जीवन की तीन मूलभूत आवश्यकताएं, रोटी, कपड़ा और मकान में से पहली जो रोटी और भूख से जुड़ी आवश्यकता है, उसका समाधान हरित क्रांति लेकर आई।

अकाल और भूखमरी से जुझ रहे देश को हरित क्रांति का उपहार देने वाले कृषि वैज्ञानिक पद्मभूषण मनकोम्बु संबासिवन स्वामीनाथन थे, जिनका 98 साल की अवस्था में 28 सितंबर को सुबह 11.15 बजे निधन हो गया। उन्होंने चेन्नई में अंतिम सांस ली। स्वामीनाथन कुछ समय से बढ़ती उम्र की परेशानियों का सामना कर रहे थे। वे देश भर में एमएस स्वामीनाथन नाम से लोकप्रिय थे। उनकी तीन बेटियां हैं- सौम्या स्वामीनाथन, मधुरा स्वामीनाथन और नित्या राव। उनकी पत्नी मीना स्वामीनाथन की मृत्यु पहले ही हो चुकी है।
भारत में हरित क्रांति के जनक स्वामीनाथन 7 अगस्त, 1925 को तमिलनाडु के कुंभकोणम में सर्जन चिकित्सक एम.के. संबविसन और पार्वती थंगम्मल के घर जन्मे थे। डॉ. स्वामीनाथन ने तिरुवनंतपुरम के महाराजा कॉलेज से जूलॉजी और कोयंबटूर कृषि महाविद्यालय से कृषि विज्ञान में बीएससी की डिग्री हासिल की थी। 1988 में उन्होंने चेन्नई में एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन (एमएसएसआरएफ) की स्थापना की, जिसके वो संस्थापक अध्यक्ष और मुख्य संरक्षक थे।
स्वामीनाथन ने साल 1949 में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) से कृषि विज्ञान (आनुवांशिकी और पादप प्रजनन में विशेषज्ञता) में एमएससी और 1952 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी (यूके) से पीएचडी की। साल 1954 में वो IARI नई दिल्ली के संकाय में शामिल हो गए। इसके बाद वो 1961 से लेकर 1972 तक IARI के निदेशक और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक के पद पर रहे।
उनका यह कार्यकाल भारत के अंदर कृषि क्षेत्र में हुई सबसे बड़ी क्रांति, हरित क्रांति के लिए याद किया जाता है। उसके बाद वे भारत सरकार में सचिव पद पर रहे और 1979 से 1980 तक कृषि मंत्रालय में प्रधान सचिव भी रहे। 1980 से 1982 तक उन्होंने योजना आयोग को अपनी सेवाएं दी। फिर वे फिलीपींस चले गए। वहां 1982 से लेकर 1988 तक अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान में महानिदेशक के पद पर रहे।
स्वामीनाथन को दुनिया भर के विश्वविद्यालयों से 81 डॉक्टरेट उपाधियां मिली हुई हैं। उन्हें पद्म विभूषण, रेमन मैग्सेसे पुरस्कार सहित कई अन्य राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। वे 2007-13 तक राज्य सभा के सदस्य भी रहे।
उन दिनों देश अकाल और भुखमरी की समस्या से जुझ रहा था। एक कृषि वैज्ञानिक के तौर पर स्वामीनाथन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस समस्या के स्थाई समाधान की थी। उन्होंने आजीवन टिकाऊ खाद्य सुरक्षा और सतत कृषि की दिशा में काम किया और उनकी इसी सोच ने उन्हें खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में एक स्वीकृत वैश्विक लीडर बनाया।
पंजाब की जमीन को स्वामीनाथन ने अपनी खेती से जुड़े कार्यक्रमों के लिए प्रयोगशाला बनाया। उन्होंने 1966 में मेक्सिको के बीजों को पंजाब की घरेलू किस्मों के साथ हाइब्रिड करके हाई क्वालिटी वाले गेहूं के बीज डेवलप किए थे। इसे सात जिलों में लगाया गया। जब यह कार्यक्रम प्रयोग की प्रारंभिक अवस्था में था, उस दौरान किसे अनुमान था कि यह देश की खाद्य सुरक्षा की सारी समस्या को खत्म करने वाला है। इस कार्यक्रम से जुड़े सभी किसानों को खेती के लिए ऋण, बीज, खाद, औजार उपलब्ध कराया गया। इस कार्यक्रम में गेहूं और धान के उत्पादन में औसत से काफी अधिक वृद्धि हुई। देश के अंदर यह हरित क्रांति का आगाज था।
इस नई तकनीकी के प्रभाव का संज्ञान सबसे पहले यदि किसी अंतरतराष्ट्रीय एजेन्सी ने लिया तो उसका नाम यूएस एड था। यूएस एड के निदेशक विलियम गौड ने नई तकनीक के प्रभाव को रेखांकित किया और बताया जाता है कि सबसे पहले उन्होंने ही पारिभाषिक शब्द के अर्थ में ग्रीन रिवोल्यूशन या हरित क्रांति शब्द का प्रयोग किया। हरित क्रांति को अपना लेने के बाद देश भर में खेती के अंदर क्रांतिकारी बदलाव आए। जैसे खेतों तक बिजली पहुंची और किसानों की मानसून पर निर्भरता कम हुई। ट्रैक्टर, पंपिंग सेट, हार्वेस्टर जैसी मशीनों का प्रयोग खेती में बढ़ा, जो पहले ना के बराबर ही था।
इतना ही नहीं हरित क्रांति के बाद किसानों को बैंकिंग, बीमा, ऋण, सरकार की तरफ से वित्तीय सहायता जैसी संस्थागत सुविधाए भी मिली। वैसे संस्थागत सुविधाओं का यह एक स्याह पक्ष भी रहा कि समय से अपना ऋण ना चुका पाने की वजह से, कर्ज के बोझ तले दबे अनगिनत किसानों ने आत्महत्या का रास्ता चुना। इस संबंध में महाराष्ट्र के विदर्भ की अक्सर चर्चा होती है। विदर्भ के अंदर महाराष्ट्र के अमरावती और नागपुर डिविजन के अन्तर्गत कुल 11 जिले आते हैं।
इसी तरह अधिक फसल लेने के लालच में किसानों द्वारा यूरिया और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग ने पंजाब के बठिंडा और उसके आस पास के जिलों की मिट्टी को जहरीला बना दिया। पंजाब से ही हरित क्रांति का संदेश पूरे देश में गया। फसल लेते हुए सावधानी ना बरतने की वजह से वहां की मिट्टी में रसायन की मात्रा बढ़ गई और इसका असर फसल पर भी आने लगा। इस क्षेत्र में धीरे धीरे कैंसर के मरीज बढ़ने लगे। एक समय हालात ऐसे हो गए थे कि बठिंडा से बीकानेर जाने वाली ट्रेन का नाम स्थानीय लोगों ने कैंसर एक्सप्रेस रख दिया। इस ट्रेन से लंबे समय तक कैंसर के मरीज बीकानेर ईलाज के लिए जाते थे।
रसायन के अधिक प्रयोग से होने वाली बीमारियों की वजह से किसानों के बीच एक भय का वातावरण बना। उनके बीच कृषि विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों ने देश भर में जागरूकता का कार्यक्रम चलाया। उन्हें खेती की तकनीक समझाई गई। खेती में लागत कम और आमदनी बढ़ाने की बात हुई। खेती को मुनाफे की खेती कैसे बनाया जाए, इसके लिए सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर कार्यशालाएं हुई। इन्हीं कार्यशालाओं के बीच से निकल कर एक नया नाम पिछले कुछ समय से सामने आया सुभाष पालेकर का। उनकी बिना लागत यानि जीरो बजट खेती की खूब चर्चा पिछले दिनों हुई, किसान गुरु के नाम से चर्चित सुभाष देश भर में घूम घूम कर किसानों को जीरो बजट वाली नेचुरल फार्मिंग सिखाते हैं।
हरित क्रांति के इस स्याह पक्ष को जानने के बावजूद हम स्वामीनाथन के योगदान को कम करके नहीं आंक सकते। उन्होंने उस समय भारतीयों को भरपेट अनाज मिलने की व्यवस्था की, जब देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती भूख थी। उन्होंने खाद्यान्न में भारत को ना सिर्फ आत्मनिर्भर बनाया बल्कि हरित क्रांति की वजह से ही हम अनाज निर्यातकों में शामिल हुए।
स्वामीनाथन भी अपनी यात्रा के दौरान रूकने वालों में नहीं थे। उन्होंने उच्च उपज देने वाली गेहूं की किस्मों को विकसित करने पर एक प्रसिद्ध अमेरिकी कृषि वैज्ञानिक और 1970 के नोबेल पुरस्कार विजेता नॉर्मन बोरलॉग के साथ भी मिलकर काम किया। बोरलॉग पौधों के जेनेटिक साइंटिस्ट थे।
स्वामीनाथन के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुख जताया है। उन्होंने कहा है कि कृषि में उनके अभूतपूर्व कार्य ने लाखों लोगों के जीवन को बदल दिया और हमारे देश के लिए फूड सेफ्टी सुनिश्चित की। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का भी शोक संदेश आया। उन्हें चाहने वाले उनके 100 वर्ष के होने की कामना कर रहे थे लेकिन 98 वर्ष की अवस्था में वे सबको छोड़कर अनंत यात्रा पर चले गए।
-
Silver Price Today: चांदी में बड़ी गिरावट! 29000 रुपये सस्ती, 36 दिन में ₹1.25 लाख गिरे दाम, क्या है रेट? -
तो इसलिए बदले जा रहे CM, गवर्नर–सीमांचल से नया केंद्रशासित प्रदेश? नया राज्य या UT बनाने के लिए क्या है नियम? -
IPS LOVE STORY: प्यार के आगे टूटी जाति की दीवार! किसान का बेटा बनेगा SP अंशिका वर्मा का दूल्हा -
T20 World Cup फाइनल से पहले न्यूजीलैंड के खिलाड़ी ने लिया संन्यास, क्रिकेट जगत में मची खलबली, फैंस हैरान -
Balen Shah Rap Song: वो गाना जिसने बालेन शाह को पहुंचा दिया PM की कुर्सी तक! आखिर क्या था उस संगीत में? -
PM Kisan Yojana: मार्च की इस तारीख को आएगी पीएम किसान की 22वीं किस्त! क्या है लेटेस्ट अपडेट? -
क्या कंगना रनौत ने चुपचाप कर ली सगाई? कौन है BJP सांसद का मंगेतर? इंटरनेट पर क्यों मचा हंगामा? जानें सच -
IND vs NZ Final: फाइनल से पहले सन्नाटे में क्रिकेट फैंस! आज अपना आखिरी मैच खेलेंगे कप्तान सूर्यकुमार यादव? -
UPSC में 301 रैंक पर 2 आकांक्षा सिंह! ब्रह्मेश्वर मुखिया की पोती या वाराणसी की डॉक्टर-कौन हुआ पास, क्या है सच? -
पिता की चिता को मुखाग्नि देने के बाद दिया इंटरव्यू, रूला देगी UPSC क्रैक करने वाली जूही दास की कहानी -
IAS IPS Love Story: 'ट्रेनिंग के दौरान कर बैठे इश्क',कौन हैं ये IAS जिसने देश सेवा के लिए छोड़ी 30 लाख की Job? -
IND vs NZ: 'झूठ बोल रहा है!' सेंटनर के बयान पर सूर्यकुमार यादव का पलटवार, फाइनल से पहले गरम हुआ माहौल












Click it and Unblock the Notifications