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Madhya Pradesh: मध्य प्रदेश की बंपर जीत का गणित

Madhya Pradesh: मध्य प्रदेश में भाजपा की एकतरफा प्रचंड जीत का कई प्रकार से परीक्षण हो रहा है। लेकिन यहां भाजपा की उस रणनीति पर विचार करने की जरूरत है जो उसने स्थानीय स्तर पर पार्टी प्रबंधन और चुनाव प्रचार के लिए अपनाई। इसके लिए भाजपा ने जहां एक ओर प्रदेश स्तर पर तैयारी की वहीं संभागवार जीत की रणनीति भी बनायी।

मध्य भारत संभाग बीते एक दशक से भाजपा का मजबूत गढ़ बनकर उभरा है। मध्य प्रदेश के आठ जिलों भोपाल, सीहोर, विदिशा, नर्मदापुरम, रायसेन, राजगढ़, हरदा और बैतूल की 36 विधानसभा सीटों में से 31 पर भाजपा प्रत्याशी की जीत यह इंगित करती है कि यह क्षेत्र अब भगवा रंग से सराबोर हो चुका है। 2018 के मुकाबले कांग्रेस को इस संभाग से 7 सीटों का नुकसान हुआ है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इसी क्षेत्र की बुधनी विधानसभा से चुनाव जीते हैं। विदिशा (5 सीटें), नर्मदापुरम (4 सीटें), राजगढ़ (5 सीटें), सीहोर (4 सीटें) और बैतूल (5 सीटें) विधानसभा में कांग्रेस-मुक्त हो गए हैं।

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दिग्विजय सिंह के प्रभाव वाला राजगढ़ जिला पहली बार कांग्रेस को चकित कर गया। मात्र हरदा जिले की दोनों विधानसभाओं हरदा और टिमरनी में कांग्रेस के प्रत्याशी विजयी हुए हैं किन्तु उनकी जीत का अंतर क्रमशः 870 तथा 950 वोट है। भोपाल जिले की बात की जाए तो 7 विधानसभा सीटों में से 5 पर भाजपा और 2 पर कांग्रेस काबिज हुई है। कांग्रेस के दोनों विधायक मुस्लिम समुदाय से हैं और इनका वर्चस्व यहां लंबे समय से है। भोपाल को लेकर एक दिलचस्प आंकड़ा यह है कि भोपाल लोकसभा सीट पर 1984 में कांग्रेस के केएन प्रधान सांसद बने थे और इसके बाद भोपाल गैस कांड के चलते कभी कांग्रेस इस लोकसभा से जीत नहीं पाई। यह समीकरण कई विधानसभा सीटों पर भी चलता है।

2018 में भाजपा को सर्वाधिक नुकसान जिस ग्वालियर-चंबल संभाग से हुआ था और पार्टी ज्योतिरादित्य सिंधिया (तब कांग्रेस में थे) के करिश्मे के चलते 34 में से मात्र 7 सीटों पर ही जीत पाई थी, इस बार ज्योतिरादित्य सिंधिया (अब भाजपा में) और नरेन्द्र सिंह तोमर की जुगलबंदी के चलते 18 सीटों पर विजयी रही है। कांग्रेस को यहां 10 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है। हालांकि ग्वालियर-चंबल संभाग में सिंधिया की छवि के उलट उनके 7 समर्थक 'कमल दल' से हार गए जो उनके लिए सदमे जैसा है।

दरअसल, 2018 में सिंधिया के साथ मिलकर जिन 22 विधायकों ने कमलनाथ सरकार गिराई थी, इनमें 19 सिंधिया समर्थक थे। इस बार 19 में से 13 समर्थकों को सिंधिया टिकट दिलाने में कामयाब रहे थे किंतु उनके 6 समर्थक ही जीत हासिल कर सके जबकि सिंधिया ने अपने समर्थकों को जिताने के लिए 70 सभाएं और रोड शो किए थे। ऐसा कहा जा रहा है कि संभाग में 'महल विरोध' की राजनीति एक बार फिर सिंधिया की भाजपा में स्वीकार्यता की अग्निपरीक्षा लेगी।

कहते हैं कि मध्य प्रदेश में सत्ता का रास्ता मालवा-निमाड़ से होकर ही गुजरता है। 2018 में संभाग की 66 सीटों में से भाजपा को 29 और कांग्रेस को 34 सीटें मिली थीं। तब मंदसौर में किसान गोलीकांड, वनवासी वर्ग का भाजपा से मोहभंग और कांग्रेस की एकजुटता ने कमल के निशान को कुंद कर दिया था किंतु इस बार भाजपा को संभाग से 19 सीटों का लाभ हुआ है। भाजपा ने अपनी गलतियों से सीखकर 2020 से ही क्षेत्र में वनवासी समुदाय के हितों का संरक्षण, अनुसूचित जाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग की बड़ी आबादी को लाभार्थी बनाना, केंद्र-राज्य की योजनाओं की मानिटरिंग करना प्रारंभ कर दिया था।

शहरी क्षेत्र तो पहले से भाजपा के पक्ष में था, इस बार ग्रामीण क्षेत्र में भी कमल खिला है। इंदौर जिले की 9 विधानसभाओं पर भाजपा प्रत्याशियों की जीत हुई है। इसके अलावा इंदौर जिले के 4 नेताओं ने संभाग के अन्य जिले से जीत हासिल कर प्रदेश की राजनीति में इंदौर के दबदबे को साबित किया है। संभाग में भाजपा की प्रचंड जीत के सूत्रधार कैलाश विजयवर्गीय रहे जिन्होंने 10 से अधिक बागियों को भाजपा के पक्ष में काम करने के लिए मनाया और अपने कई समर्थकों के लिए प्रचार करके उन्हें भी जीत दिलाई।

यह भी दिलचस्प तथ्य है कि विजयवर्गीय ने अपने राजनीतिक जीवन में 4 अलग विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ा और जहां भी वे लड़े, वे सीटें 'भाजपा की अयोध्या' बन गईं। कांग्रेस के पास उन सीटों पर लड़ाने के लिए उम्मीदवारों का टोटा रहता है और रस्म-अदायगी की तर्ज पर वहां प्रत्याशी उतारे जाते हैं। हालांकि रतलाम जिले की सैलाना सीट से 'बाप' (भारत आदिवासी पार्टी) उम्मीदवार कमलेश्वर डोडियार की जीत ने भाजपा-कांग्रेस को चौंका दिया है।

बात यदि उत्तर प्रदेश से सटे बुंदेलखंड की करें तो यहां भाजपा को 26 में से 21 सीटें प्राप्त हुई हैं और पार्टी को 2018 के मुकाबले 4 सीटों का लाभ हुआ है। यहां कांग्रेस 2018 के मुकाबले मात्र 2 सीटों के नुकसान में रही है। चूंकि यहां सपा-बसपा का भी प्रभाव रहता है अतः ऐसा माना जा रहा था कि इससे भाजपा को नुकसान होगा किंतु भाजपा ने सपा-बसपा के 1.5 प्रतिशत वोट को ही अपने पाले में कर लिया। हालांकि भाजपा को पृथ्वीपुर और टीकमगढ़ सीट पर हार मिली है जिसका कारण सपा मानी जा रही है। संभाग में पन्ना (3 सीटें) और दमोह (4 सीटें) जिले कांग्रेस मुक्त हो गए हैं जबकि सागर जिले में भाजपा 7-1 और छतरपुर जिले में 5-1 से आगे है।

विंध्य संभाग भी एक दशक से भाजपा का अभेद किला बन चुका है। एक समय प्रदेश का यह पूर्वी इलाका कांग्रेसी दिग्गज 'सफेद शेर' स्व. श्रीनिवास तिवारी और स्व. अर्जुन सिंह का गढ़ माना जाता था और प्रदेश में ओबीसी राजनीति की शुरुआत भी यहीं से हुई थी किंतु समय के साथ विंध्य से कांग्रेस साफ होती गई और वर्तमान में हालात यह हैं कि यहां भी 'हाथ' को प्रत्याशी ढूंढने पड़ते हैं। 2018 में भाजपा ने इस संभाग की कुल 30 में से 24 सीटें जीती थीं जिसमें इस बार एक सीट का इजाफा हुआ है। शहडोल (3 सीटें), सिंगरौली (3 सीटें) और उमरिया (2 सीटें) जिले कांग्रेस मुक्त हो चुके हैं जबकि सतना जिले में 5-2, रीवा जिले में 7-1 और सीधी जिले में 3-1 से भाजपा ने मजबूत बढ़त बनाई है।

यह वही क्षेत्र है जहां पेशाब कांड के बाद जातिगत मुद्दा अहम हो गया था किंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जाति की नई परिभाषा ने कांग्रेस को चारों खाने चित्त कर दिया। 'आप' को संभाग से बड़ी आस थी किंतु उसके हाथ भी कुछ नहीं आया। चुरहट से जरूर स्व. अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह 'राहुल भैया' चुनाव जीते हैं किंतु वे पार्टी को यहां फिर से कैसे मजबूत करेंगे, यह बड़ा प्रश्न है।

2018 में महाकोशल संभाग ने कांग्रेस को संजीवनी दी थी किंतु इस बार यह संभाग भी भगवामय नजर आया है। कुल 38 सीटों में से 21 सीटों पर भाजपा को जीत मिली है। केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल को नरसिंहपुर से लड़ाने का भाजपा नेतृत्व का निर्णय संभाग में असर कर गया। जिले की चारों सीटों के अलावा संभाग के कटनी और जबलपुर में भाजपा ने अपना परचम लहराया है। जबलपुर में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के सुरक्षाकर्मी के साथ भाजपा के कार्यकर्ताओं की मारपीट से ऐसा लग रहा था कि इस बार यहां 'कमलदल' में भीतरघात होगा किंतु गृहमंत्री अमित शाह के दौरे ने आपसी लड़ाई समाप्त कर दी। यहां तक कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी का नर्मदा माँ की पूजा-अर्चना से प्रारंभ हुआ चुनाव प्रचार भी कांग्रेस को संभाग में एकजुट नहीं रख पाया।

हालांकि छिंदवाड़ा जिला अभी भी भाजपा के लिए तिलिस्म बना हुआ है क्योंकि यहां की सभी 7 विधानसभाओं ने कांग्रेस को अजेय बना दिया है। वहीं बालाघाट जिला भी भाजपा के लिए दुस्वप्न बनकर उभरा है और यहां की 6 में से 4 सीटों पर कांग्रेस विजयी रही है। मंडला, डिंडोरी और सिवनी जिले में भी भाजपा का प्रदर्शन कमजोर ही माना जाएगा। प्रदेश की 29 लोकसभाओं में भाजपा के परचम के आड़े भी यही क्षेत्र आ सकता है इसीलिए शिवराज सिंह चौहान ने अभी से संभाग को मथने का बीड़ा उठा लिया है। कुल मिलाकर विधानसभा में बंपर जीत के साथ ही भाजपा ने अभी से लोकसभा चुनाव की चौसर पर चाल चलने की तैयारियां प्रारंभ कर दी हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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