Mother Language Day: जरूरी है मातृभाषाओं का जिंदा रहना
Mother Language Day: उदारीकरण के दौर में जब अंग्रेजी अपनी चमक बिखेर रही है, ऐसे में सवाल उठ सकता है कि मातृभाषाओं की जरूरत क्या है? चूंकि वैश्वीकरण की भाषा के रूप में अंग्रेजी अघोषित तौर पर प्रतिनिधित्व हासिल कर चुकी है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर इस सवाल का उठना स्वाभाविक है।
दुनियाभर के समाजशास्त्री और बाल मनोविज्ञानी मानते हैं कि शिक्षा हासिल करते वक्त बच्चा अपनी मातृभाषा में सबसे ज्यादा सहज रहता है। इसकी वजह यह है कि मातृभाषाओं का रिश्ता व्यक्ति के दिल से ज्यादा रहता है। दिल और दिमाग हमारे शरीर के लिए दोनों ही जरूरी हैं। लेकिन दिमाग के जरिए जो कुछ ग्रहण होता है, वह तार्किकता से पूर्ण होता है।

तार्किकता मनुष्य के नजरिए को वैज्ञानिक तो बनाती है, लेकिन वह कई बार मर्म को छू नहीं पाती। वहीं दिल से स्नेह और प्यार का रिश्ता है। स्नेह और प्यार के रिश्ते के ही चलते दिल वाली बातें मर्म को ना सिर्फ छू लेती हैं, बल्कि दिमाग को भी अरसे तक मथती रहती है।
मातृभाषा को इसी संदर्भ में समझें तो वह दिमाग नहीं, दिल की भाषा है। हर शख्स की प्राथमिक भाषा, उसकी मातृभाषा होती है। मातृभाषा को सीखना बेहद सहज होता है, क्योंकि वह स्नेह और प्यार की भाषा होती है। मां के दूध में जिस तरह पौष्टिकता के साथ ही स्नेह होता है, मातृभाषाएं भी मनुष्य के लिए स्नेह और पौष्टिकता- दोनों को सहज ही उपलब्ध करा देती हैं। जबकि सायासिक ढंग से सीखी गई दूसरी भाषाएं ज्यादातर दिमाग की भाषा होती हैं। दूसरी भाषाएं तार्किकता की भाषा होती हैं। इसलिए उनके साथ मनुष्य का स्नेह और प्यार का संबंध उस तरह नहीं जुड़ पाता, जैसे मातृभाषा से जुड़ता है।
नेल्सन मंडेला के शब्दों में मातृभाषा और दूसरी भाषा के अंतर को हम ठीक से समझ सकते हैं। मंडेला कहते हैं कि अगर किसी शख्स से आप उस भाषा में बात करते हैं, जो उसकी दूसरी भाषा है, जिसे वह समझ सकता है तो वह भाषा उसके मस्तिष्क में जाती है। लेकिन अगर आप उसकी मातृभाषा में बात करते हैं तो वह सीधे उसके दिल तक पहुंच जाती है। यह दिल का रिश्ता ही है कि जब एक भाषा क्षेत्र के वासी जब मिलते हैं तो वे अपनी मातृभाषा में बात करने में ज्यादा सहज महसूस करते हैं। मातृभाषा चूंकि उनके दिल की भाषा होती है, इसलिए एक तरह से उसके जरिए वे एक-दूसरे के करीब आ जाते हैं।
आज की दुनिया ने लोकतंत्र को शासन की बेहतर प्रणाली मान लिया है। समाजशास्त्री भी मानते हैं कि समाज के मानवीय रूप के विकास के लिए उसका लोकतांत्रिक होना जरूरी है। उदारीकरण और वैश्वीकरण की व्यवस्था इसी लोकतांत्रिक समाज में उपजी है। अव्वल तो उदारीकरण और वैश्वीकरण की धारा को भी भाषाओं के संदर्भ में लोकतांत्रिक होना चाहिए था। लेकिन दुर्भाग्य है कि उदारीकरण कम से कम भाषाओं के लिहाज से लोकतांत्रिक नहीं हो पाया है। उसकी प्रतिनिधि भाषा अंग्रेजी है। अगर उसने किसी अन्य भाषा को इस दिशा में कुछ छूट दी है तो वह फ्रेंच, स्विस या यूरोप की कुछ ताकतवर समुदायों की भाषाएं ही हैं।
लेकिन इनमें भी अंग्रेजी का ही वर्चस्व है। कुछ लोग सवाल उठा सकते हैं कि बाजार की बढ़ती ताकत के साथ अंग्रेजी के साथ ही स्थानीय भाषाओं को उदारीकरण बढ़ावा दे रहा है। इस लिहाज से तो उदारीकरण की भी सोच लोकतांत्रिक कही जा सकती है। लेकिन यह आधी सच्चाई है। अगर उदारीकरण स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा दे रहा है, तो वह दरअसल भाषाओं का लोकतांत्रिकरण नहीं कर रहा है, बल्कि उनके जरिए अपना ही विस्तार कर रहा है।
इसका यह मतलब नहीं है कि मातृभाषाओं की जरूरत ऐसी ही रहेगी। मातृभाषाएं इसलिए जरूरी हैं, कि मनुष्य सहज बना रहे। मातृभाषाओं की जरूरत शिक्षा के लिए ज्यादा जरूरी है। यह वैज्ञानिक रूप से साबित हो चुका है कि मातृभाषा में सहज शिक्षा हासिल कर चुका विद्यार्थी दूसरी भाषाओं को कहीं अधिक प्रवीणता से सीख पाता है।
मातृभाषाओं की जरूरत इसलिए भी है कि मानव समाज की विरासत और धरोहर को उन्होंने ही सहेज रखा है। धरोहरों के भाव और संदेश को किसी अन्य भाषा में अनूदित नहीं किया जा सकता। वह अनुवाद दिमागी ही होगा, उसका दिल के मर्म का संबंध नहीं होगा। मातृभाषाओं की जरूरत इसलिए भी है कि वे अभिव्यक्ति की दुनिया को लोकतांत्रिक बनाती हैं, भावों को सहज संप्रेष्य बनाती हैं। इस तरह से वे मानवता की सेवा करती हैं।
लोकतंत्र में नागरिकों की सहज भागीदारी, समावेशी शिक्षा, सामाजिक और प्राकृतिक विविधता के साथ ही बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए सबसे ज्यादा जरूरी मातृभाषाएं ही हैं। इसलिए भी मातृभाषाओं का जिंदा रहना जरूरी है। इस तथ्य को भारत सरकार ने समझा है। नई शिक्षा नीति में मातृभाषा के जरिए जहां प्राथमिक शिक्षा पर जोर दिया गया है, वहीं देश की भाषाओं के आंकड़े और बुनियादी उच्चारण आदि का संग्रह भी किया जा रहा है।
देश में 1652 भाषाएं हैं और वे अपने-अपने समाजों की मातृभाषा भी हैं। गृह मंत्रालय समय-समय पर इनका सर्वेक्षण भी कराता रहता है। पिछले साल नवंबर तक मंत्रालय ने देश की 576 भाषाओं और बोलियों का मातृभाषा सर्वेक्षण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया था, जिन्हे संरक्षित करने के लिए राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र में एक वेब संग्रह तैयार किया जा रहा है।
गृह मंत्रालय के अनुसार इस संग्रह में तमाम भाषाओं को रखा जाएगा। इसके तहत 576 मातृभाषाओं की 'फील्ड वीडियोग्राफी' भी कराई गई है। इस परियोजना में मातृभाषाओं का 'स्पीच डाटा' भी संग्रहित किया जा रहा है। जिसे बाद में वेबसाइट पर प्रदर्शित भी किया जाएगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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