पाकिस्तान और चीन की शह पर बढ़ेंगी मोदी की चुनौतियां
Modi Sarkar: अपने तीसरे कार्यकाल में नरेंद्र मोदी के सामने नए तरह की चुनौतियां हैं| पहली चुनौती अब तक के सबसे मजबूत विपक्ष का सामना करना होगा| कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस की बढी हुई ताकत हर छोटे बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर सरकार को कटघरे में खड़ा करेगी|
महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड तीन ऐसे प्रदेश हैं, जहां भाजपा की ताकत घटी है| इन तीनों ही राज्यों में इसी साल अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव हैं| इनमें से दो राज्यों में भाजपा सत्तारूढ़ है| अगर भाजपा महाराष्ट्र और हरियाणा वापिस नहीं जीतती तो मोदी सरकार को अगले चार साल हमलावर विपक्ष का सामना करना होगा, और अपने सहयोगियों को साथ रखने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ सकती है|

दूसरी चुनौती पाकिस्तान और चीन की ओर से खड़ी की जाएगी| मोदी को अपने दूसरे कार्यकाल में भी इन दोनों ही पड़ोसी देशों से मुश्किलों का सामना करना पड़ा था| प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के नेताओं ने अपने बयानों से इन दोनों देशों को मोदी सरकार के खिलाफ मसाला परोसा था| जैसे चीन की ओर से कथित तौर पर लद्दाख में भारतीय जमीन पर चीन के कब्जे की बात| मोदी सरकार इस मुद्दे पर राष्ट्र को संतुष्ट नहीं कर पाई थी कि कांग्रेस जो कुछ कह रही है, वह गलत है| तीसरी चुनौती देश के भीतर पनप रहे अलगाववाद की होगी|
लोकसभा के चुनाव नतीजों में कम से कम तीन प्रदेशों पर निगाह रखना बेहद जरूरी है| जम्मू कश्मीर के बाद सबसे ज्यादा संवेदनशील राज्य पंजाब हो गया है| जहां जम्मू कश्मीर में एक पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी जीत गया है| वहीं पंजाब में दो अलगाववादी चुनाव जीत गए हैं| जम्मू कश्मीर की बारामुला सीट से अब्दुल रशीद शेख जीता है, जो इंजीनियर रशीद के नाम से मशहूर है| वह आतंकवादियों को फंडिंग के आरोप में 2019 से दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद है, जेल में रहते हुए ही वह चुनाव जीत गया है| इंजीनियर रशीद ने पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को हराया है| इंजीनियर रशीद की जीत के बाद उसके समर्थन में जोरदार प्रदर्शन हुआ है|

पंजाब में भी एक खालिस्तानी अमृतपाल सिंह असम की डिब्रूगढ़ जेल में बंद रहते हुए चुनाव जीत गया है| अमृतपाल सिंह के अलावा इंदिरा गांधी के हत्यारे बेअंत सिंह का बेटा सरबजीत सिंह खालसा भी फरीदकोट से चुनाव जीत गया है| पंजाब में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी की नीतियों के कारण पंजाब में अलगाववादियों के होसले बुलंद हुए हैं|
अमृतपाल सिंह और सरबजीत खालसा की जीत के बाद पंजाब में कई जगहों पर खालिस्तान के झंडों के साथ जोरदार प्रदर्शन हुए हैं| आम आदमी पार्टी की सरकार की नाक के नीचे सैंकड़ों लोगों ने खालिस्तानी झंडों के साथ प्रदर्शन किया| तीन अलगाववादियों के लोकसभा चुनाव जीतने के बाद भारत विरोधी ताकतें एक बार फिर सिर उठाने की कोशिशें कर रही हैं|
चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर कंगना रानौत को जिस महिला कुलविन्दर कौर ने थप्पड़ मारा था, उसके समर्थन में भी प्रदर्शन हो रहे हैं| कंगना रानौत को थप्पड़ मारने की घटना से यह विस्फोटक खुलासा हुआ कि केन्द्रीय सुरक्षा बलों में भी पंजाब के अलगाववादियों की घुसपैठ है| केन्द्रीय सुरक्षा एजेंसी में तैनात जवान ने सरकार के खिलाफ हुए किसानों के प्रदर्शन और धरने में हिस्सा लिया था और केन्द्रीय सुरक्षा बलों की गुप्तचर एजेंसी को उसका पता ही नहीं चला| यह देश के लिए बहुत ही गंभीरता की बात है|
जम्मू कश्मीर और पंजाब के बाद तीसरा प्रदेश है तमिलनाडु, वहां भी अलगाववाद सिर उठा रहा है| चुनावों से पहले ही तमिलनाडु से अलगाववाद की आवाज उठी थी| दक्षिणी राज्यों को भारत से अलग करने की आवाज भी उठी, जिसे द्रमुक के बड़े नेता भी उठा रहे थे| अपनी अलगाववादी आवाजों के कारण द्रमुक बहुत मजबूत हो चुकी है| जिसकी झलक लोकसभा चुनाव नतीजों में दिखाई दी है|
चुनाव के बाद भी एक घटना ऐसी हो गई है कि जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता| तमिलनाडु के एक संगठन फादर पेरियार द्रविड़ कषगम ने कंगना रानौत को थप्पड़ मारने वाली कुलविन्दर कौर को सोने की अंगूठी से सम्मानित करने का फैसला किया है| तमिलनाडु की यह संस्था अलगाववाद की आवाज उठाती रही है| यह संस्था दलितों और अल्पसंख्यकों को हिन्दुओं और भारत के खिलाफ खड़ा करने का कोई मौक़ा नहीं चूकती|
फिल्म इंडस्ट्री में पनप रहे अलगाववादियों पर निगाह रखना भी जरूरी हो गया है| संगीतकार विशाल ददलानी ने कहा है कि कंगना को थप्पड़ मारने वाली कुलविन्दर कौर को अगर सरकारी नौकरी से निकाला जाता है, तो वह उसकी नौकरी का इंतजाम करेगा| विशाल ददलानी आम आदमी पार्टी की टोपी पहन चुका है| वह शाहीन बाग़ के धरने में बैठ चुका है| किसान आन्दोलन में हिस्सा ले चुका है| नरेंद्र मोदी की तुलना नार्थ कोरिया के तानाशाह किम जोंग से करता है|
फिल्म इंडस्ट्री में कितने लोग पाकिस्तान की साजिश का मोहरा बने हुए है, उसका इतिहास भरा पड़ा है| हाल ही के सालों के दो उदाहरण गौर करने लायक हैं| पहला उदाहरण मुम्बई पर हुए आतंकी हमले का है| पाकिस्तान समर्थक बुद्धिजीवियों ने 26/11 के आतंकी हमले को आरएसएस की साजिश बताने की कोशिश की थी|
एक पत्रकार अज़ीज़ बर्नी ने एक किताब लिखी थी- "आरएसएस की साजिश 26/11"| इस किताब के विमोचन में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के साथ फिल्म निर्देशक महेश भट्ट भी शामिल थे| जबकि बाद में जांच में पता चला कि महेश भट्ट का बेटा ही डेविड हेडली को उन सभी जगहों पर लेकर गया था, जहां की रेकी करके हेडली ने पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं को कहां कहां हमला करना है, इसकी पूरी जानकारी दी थी।
किसान आन्दोलन के दौरान फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े हुए दीप संधू ने लाल किले पर खालिस्तान का झंडा लगा दिया था| दीप संधू ने पंजाब में अलगाववाद को हवा देने के लिए वारिस पंजाब दे नाम से एक संगठन खड़ा किया था| दीप संधू की एक एक्सीडेंट में मौत के बाद खालिस्तानी अमृतपाल सिंह उसी "वारिस पंजाब दे" संस्था का मुखिया है| मोदी के पीएम बनने से जितनी निराशा इंडी एलायंस को है, उससे ज्यादा निराशा पाकिस्तान और चीन को है| चुनाव नतीजों के बाद 72 घंटों में जम्मू कश्मीर में आतंकवाद की तीन वारदातें हो गई|
आतंकवाद की नई घटनाओं के बाद फारूख अब्दुला ने राग पाकिस्तान शुरू कर दिया है| उनके बेटे उमर अब्दुल्ला को पाकिस्तान की तरफ से टेरर फंडिंग करने वाले इंजीनियर रशीद ने हरा दिया है| इशारा साफ़ है कि पाकिस्तान अब्दुल्ला परिवार से खुश नहीं है| पाकिस्तान को खुश करने के लिए फारूख अब्दुल्ला फिर से पाकिस्तान से बातचीत की दुहाई देने लगे हैं|
इसका मतलब है कि वह यह मानते हैं कि यह सब पाकिस्तान करवा रहा है| यह लोकल आतंकवाद नहीं है| यह पहली बार हुआ है कि अब्दुल्ला परिवार का कोई सदस्य लोकसभा में नहीं पहुंचा| जब जब परिवार हारता है, अब्दुल्ला परिवार की भाषा बदल जाती है| फारूख अब्दुल्ला ने कहा है कि मिलिट्री ऑपरेशन से आतंकवाद की समस्या का हल नहीं निकलेगा|
ये सब लोग जो भारत सरकार की नीति के खिलाफ बयानबाजी करते हैं, ये सब पाकिस्तान के स्लीपर सेल हैं| इसलिए मोदी के सामने इस बार की चुनौतियां सिर्फ राजनीतिक नहीं है, राष्ट्र की सुरक्षा की भी चुनौतियां हैं| और मिलीजुली चुनौतियां हैं, क्योंकि जैसे ही केंद्र सरकार पंजाब के अलगाववादियों पर कार्रवाई करेगी, फारूख अब्दुल्ला की तरह कांग्रेस के नेता भी यह बयान देने लगेंगे कि यह क़ानून व्यवस्था का मामला नहीं है| नक्सलवादियों के खिलाफ कार्रवाई पर भी कांग्रेस के नेताओं का हमेशा यही स्टैंड रहा है| इसलिए इस बार मोदी के सामने ज्यादा गंभीर चुनौतियां हैं|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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