बिहार: सियासत करो, लेकिन ‘आम’ का नाम बदनाम न करो
नई दिल्ली। बिहार में बच्चों की मौत दुखदायी है लेकिन नेता चमकी पर राजनीति चमकाने से बाज नहीं आ रहे। लीची के बाद अब आम राजा का बज गया है बाजा। बुधवार को सभी विधायकों को मालदह आम और इसका पौधा भेंट किया जाना था। आम के टोकरे और पौधे विधानसभा पहुंच गये थे। लेकिन राजद और कांग्रेस ने इस पर राजनीति शुरू कर दी। पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने कह दिया कि जो ये आम खाएगा उसे चमकी से मरे बच्चों की आह लगेगी। कांग्रेस के विधान पार्षद प्रेमचंद मिश्रा ने कहा कि जो ये आम खाएगा उसका पेट खराब हो जाएगा। ये मालदह आम का सीजन है। क्या राजद और कांग्रेस के नेता चमकी बुखार के कहर से इतने दुखी हैं कि उन्होंने आम खाना छोड़ दिया दिया है ? सरकार का विरोध करना है कीजिए, लेकिन आम का नाम तो बदनाम मत कीजिए।

राबड़ी जी ! आम की नहीं, तेजस्वी की चिंता कीजिए
पेडों की अंधाधुंध कटाई से मौसम का मिजाज बिगड़ रहा है। भीषण गर्मी पड़ रही है। आद्रा नक्षत्र में मेघ नहीं बरसे। सूखे का डर सताने लगा है। सरकार ने पर्यावरण को ध्यान में रख कर तय किया था कि विधायकों के बीच मलदह आम के पौधे बांटे जाएंगे। लगे हाथ आम भी देने की बात हुई। लेकिन राबड़ी देवी ने इस आम पर खास राजनीति शुरू कर दी। उन्होंने कहा कि चमकी बुखार से बच्चे लगातार मर गये हैं। बिहार के गरीब परिवारों में मातम है। ऐसे में जो ये आम खाएगा उसे गरीबों की आह लगेगी। क्या राबड़ी देवी सचमुच बच्चों की मौत पर दुखी हैं ? या फिर चमकी के नाम पर राजनीति कर रही है ? अगर वे चमकी के कहर से सच में दुखी हैं तो पहले उन्हें तेजस्वी को सदन में लाना चाहिए। इतने बड़े मुद्दे पर हंगामा बरपा हुआ है और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी चार दिनों से विधानसभा नहीं आ रहे। बुधवार को भी उनकी आमद नहीं हुई। राबड़ी देवी की संवेदना इस मामले में क्यों नहीं छलकती ? आम से अधिक उन्हें तेजस्वी की चिंता करनी चाहिए। तेजस्वी भी गरीब जनता की आवाज उठाने के लिए नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर बैठे हैं। अगर वे अपना काम नहीं कर रहे हैं तो उन्हें गरीब जनता की आह लगेगी।

आम पर सियासत क्यों ?
आम नहीं लेना है, मत लीजिए लेकिन सियासत तो न कीजिए। आम को बददुआ से जोड़ने का क्या मतलब है ? क्या राबड़ी देवी अपने सरकारी आवास में लगे पेड़ का आम इस्तेमाल नहीं करती ? क्या कांग्रेस के एसएलसी प्रेमचंद मिश्रा ने एक महीने से आम खाना छोड़ दिया है ? अगर आप इतने ही दुखी हैं तो आम ही क्यों अन्य सरकारी सुविधाओं का भी परित्याग कर दीजिए। बंगला, भत्ता, मुफ्त यात्रा सुविधा लेने के लिए नेता क्या क्या नहीं करते। तब तो उन्हें गरीबों का ख्याल नहीं आता। अब छप्पन भोग खाने वाले नेता चमकी की आड़ में आम के नाम पर बददुआएं दे रहे हैं। कोई कह रहा है कि आम खाया तो आह लगेगी। कोई कह रहा है कि आम खाया तो पेट खराब हो जाएगा। आखिर राजनीति और कितना नीचे गिरेगी ?

क्या नीतीश ने मांझी के आम तोड़ने पर लगायी थी रोक?
इसके पहले भी आम पर सियासत हुई है। 2014 में चुनावी हार से दुखी नीतीश ने सीएम पद छोड़ दिया था। उन्होंने बड़े अरमानों से जीतन राम मांझी को सीएम की कुर्सी पर बैठाया था। लेकिन कुछ दिनों के बाद ही दोनों में लड़ाई शुरू हो गयी। बाद में मांझी ने बहुमत साबित करने से पहले ही सीएम पद से इस्तीफा दे दिया था। लेकिन उन्होंने सीएम आवास यानी 1 अणे मार्ग छोड़ा नहीं था। नीतीश दोबारा सीएम बन गये थे लेकिन दूसरे बंगले में रहते थे। 1 अणे मार्ग में आम के बहुत पेड़ थे। उस साल आम भी खूब फले थे।
जून 2015 में मांझी ने आरोप लगाया था कि नीतीश कुमार ने 1 अणे मार्ग के आम को तोड़ने पर रोक लगा दी है। मांझी आम नहीं तोड़ पाएं इस लिए वहां 24 सिपाहियों का पहरा भी बैठा दिया गया था। इस काम के लिए 8 दारोगा और 16 सिपाही तैनात किये गये थे। उनका काम पेड़ों पर लगे आम का हिसाब रखना था। उन्हें बताना था कि कितने आम खुद गिरे और कितने आम तोड़े गये। वहां लीची के भी बहुत पेड़ थे। जब जीतन राम मांझी के माली ने लीची तोड़ने की कोशिश की तो पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था। मांझी के इस आरोप पर नीतीश कुमार को सफाई देनी पड़ी थी। तब नीतीश ने कहा था कि वे अपनी सेलरी से आम और लीची खरीद कर जीतन राम मांझी को खिलाएंगे। यानी आम पर सियासत कोई नयी बात नहीं है।
(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)












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