ममता की कोलकाता रैली: क्या नरेंद्र मोदी का विरोध देश का विरोध है?
नई दिल्ली। रैली कोलकाता में हुई, बेचैनी सूरत में दिखी। सूरत बोलें तो शहर भी, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मौजूद थे। और, सूरत बोलें तो खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा भी। ऐसा लगा जैसे सूरत में वे होवित्जर टैंक पर सवार होकर किसी दुश्मन देश के बारे में नहीं सोच रहे थे, महागठबंधन के बारे में ही सोच रहे थे। क्योंकि, फारिग होते ही उन्होंने महागठबंधन पर एक के बाद एक गोले दागना शुरू कर दिए।

सबसे बड़ी बात जो प्रधानमंत्री ने कही वो यह कि "महागठबंधन मेरे खिलाफ नहीं, बल्कि देश की जनता के ख़िलाफ़ है।" इसका मतलब क्या है? इसका मतलब है- " 'मैं' यानी 'देश की जनता'। 'देश की जनता' यानी 'मैं'।" ठीक उसी तर्ज पर जिस तर्ज पर 'मोदी सरकार के विरोध का मतलब' होता है 'देश का विरोध'।

बीजेपी को छोड़कर कोई दूसरा देशभक्त नहीं हो सकता?
क्या नरेंद्र मोदी, उनकी सरकार और उनकी पार्टी बीजेपी को छोड़कर कोई दूसरा देशभक्त नहीं हो सकता? क्या मोदी विरोधी या बीजेपी विरोधी या सरकार विरोधी लोग देश की जनता नहीं हैं? देश में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, आरजेडी, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, डीएमके, एनसीपी, आरएलडी, नेशनल कान्फ्रेन्स और वो सभी पार्टियां जो कोलकाता में जमा हुई थीं, सबके सब देश की जनता के विरोध में हैं? और, देश की जनता के प्रति समर्पित केवल नरेंद्र मोदी, उनकी सरकार और उनकी पार्टी रह गयी है? ये सारे सवाल नरेंद्र मोदी के बयान के बाद पैदा हो रहे हैं। नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उस विचारधारा को पलट कर रख दिया है जिसमें कहा गया है "व्यक्ति से बड़ी पार्टी, पार्टी से बड़ा देश"। उन्होंने खुद को देश का पर्याय बना लिया है। उन्हें कोसने का मतलब देश को कोसना। उन्हें गलत ठहराना यानी देश को गलत ठहराना।

क्या सरकार विरोधी लोग देश की जनता नहीं हैं?
प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री भी नहीं थे, तब क्या देश की राजनीतिक पार्टियां उनके ख़िलाफ़ कोई गठबंधन बना रही थी? एक व्यक्ति के रूप में नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ महागठबंधन बनाने की जरूरत क्यों हो? चूंकि नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री है, एनडीए सरकार का मुखिया हैं और उस पार्टी से जुड़े हैं जिसकी देश में 20-20 सरकारें हैं। इतना ही नहीं, वे दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी का चेहरा हैं। इसलिए महागठबंधन इस चेहरे के ख़िलाफ़ है और निश्चित रूप से इस चेहरों को बनाए रखने वालों के ख़िलाफ़ भी। प्रधानमंत्री ने कहा है कि भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ उनके कदम से कुछ लोग बेचैन हो गये हैं। इसलिए वे स्वाभाविक रूप से गुस्से में हैं। पीएम मोदी के अनुसार, "मैंने उन्हें जनता का पैसा लूटने से रोक दिया। नतीजा यह निकला कि उन्होंने अब महागठबंधन बना लिया है।"

26 दलों ने कोलकाता में दिखाई एकजुटता
वामदलों को छोड़कर 26 दलों ने कोलकाता में एकजुटता दिखलायी। अगर नरेंद्र मोदी की बात एसपी-बीएसपी तक सीमित होती, तो फिर भी इसे समझा जा सकता था। मगर, महागठबंधन के पूरे दलों को भ्रष्ट बता देना बेईमानी है। इसके पक्ष में इन तर्कों पर गौर करें-
· महागठबंधन (जो अभी बना नहीं है) में शामिल शरद यादव और एन चंद्रबाबू नायडू कभी एनडीए में थे और इस लिहाज से बीजेपी के भी नेता थे। यानी जब बीजेपी के साथ रहे, तो ईमानदार रहे और साथ छूटा तो बेईमान हो गये?
· यशवन्त सिन्हा और अरुण शौरी बीजेपी की वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे। शत्रुघ्न सिन्हा तो आज भी सांसद हैं। ये भी महागठबंधन के मंच पर होने की वजह से भ्रष्ट हो गये? पहले ईमानदार थे!
· हेमंत सोरेन, मायावती, अजित सिंह, ममता बनर्जी सभी कभी न कभी बीजेपी के साथ सरकार में रहे हैं। विरोध में होने पर बीजेपी उन्हें भ्रष्ट करार दे रही है!
ये तथ्य इस बात की ओर भी इशारा कर रहे हैं कि महागठबंधन से बीजेपी बेचैन हो गयी है, नरेंद्र मोदी की सूरत बदल गयी है।

13 दलों ने 5 साल में छोड़ा NDA का साथ
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान से इंदिरा गांधी के जमाने की कांग्रेस की भी याद आ रही है जब कांग्रेस बोला करती थी- "कांग्रेस गरीबी हटाने की बात करती है, विरोधी इंदिरा हटाने की बात करते हैं।" उस वक्त की कांग्रेस ‘इंडिया इज इंदिरा' और ‘इंदिरा इज इंडिया' का फर्क मिटाने की कोशिश में जुटी थी। इस कोशिश में कांग्रेस का क्या हश्र हुआ था, उसकी याद दिलाने की जरूरत नहीं है। नरेंद्र मोदी महागठबंधन पर कह रहे हैं, "महागठबंधन अभी ढंग से साथ भी नहीं आया है और अभी से अपने हिस्से को लेकर मोलभाव शुरू कर दिया गया है।" अच्छा होता अगर नरेंद्र मोदी महागठबंधन के बजाए एनडीए पर ध्यान देते। एक के बाद एक घटक दल साथ छोड़ते गये हैं। अब तक 13 दलों ने एनडीए का साथ पिछले 5 साल में छोड़ दिया है। जो घटक दल हैं वे भी मोलभाव कर रहे हैं, आंखें दिखा रहे हैं।

महागठबंधन से बीजेपी खेमा बेचैन
असल बात ये है कि महागठबंधन ने बीजेपी खेमे को बेचैन कर दिया है। वरना महागठबंधन बने या न बने, उस पर बोलने की प्रधानमंत्री को आवश्यकता ही नहीं थी। होवित्जर तोप पर चढ़ने का समारोह और उसके बाद की रैली में ऐसे विषय तो आने ही नहीं चाहिए थे। मगर, मोदी खुद को देश समझने की गलती कर रहे हैं। इसलिए महागठबंधन में शामिल हर दल और हर नेता उन्हें बुरे लग रहे हैं।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)












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