Maharashtra: पवार की पार्टी और शिंदे की कुर्सी, दोनों पर अजीत का दावा

Maharashtra: अजीत पवार का भाजपा के साथ आना सिर्फ शरद पवार के लिए ही झटका नहीं है। इस फेरबदल से मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की कुर्सी के लिए भी खतरा पैदा हो गया है। सार्वजनिक रूप से मुख्यमंत्री बनने की इच्छा जाहिर कर चुके अजीत पवार के एनडीए में शामिल होने से एकनाथ शिंदे की कुर्सी पर खतरा पैदा हो गया है। एकनाथ शिंदे आज भले ही अजीत पवार के साथ आने का समर्थन कर रहे हों, लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में आने वाले दिनों में एकनाथ शिंदे को ही सबसे बड़ी 'चुनौतियों' का सामना करना पड़ेगा।

उपमुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस और अजीत पवार की दो दशक पुरानी दोस्ती से महाराष्ट्र के सभी नेता वाफिक हैं। विपक्ष के नेता रहते अजीत पवार ने देवेन्द्र फड़नवीस पर कभी एक शब्द नहीं बोला लेकिन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे पर अपने शब्दबाण चलाते रहे। ऐसे में अजीत पवार के सरकार में शामिल होने से देवेन्द्र को ताकत मिलना तय है। वहीं एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना पर भी भाजपा की निर्भरता काफी कम हो गई है। अजीत पवार ने आते ही उप मुख्यमंत्री का पद और 8 मंत्रीपद अपने विधायकों के लिए ले लिए हैं।

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एकनाथ शिंदे के विधायक सरकार बनने के बाद से मंत्री बनने के लिए राह देख रहे हैं। बदली हुई परिस्थितियों में एकनाथ के साथी कब मंत्री बनेगें कुछ कहा नहीं जा सकता। ऐसे में हो सकता है कि शिंदे गुट के कुछ विधायक वापस उद्धव ठाकरे के खेमे में वापस पहुंच जाए। एक बात और महत्वपूर्ण है। एकनाथ शिंदे और अजीत पवार दोनों मराठा हैं। महाराष्ट्र में मराठा वोट बैंक 32 प्रतिशत के आसपास है। ऐसे में आने वाले दिनों में मराठाओे का नेता कौन इसको लेकर अजीत पवार और शिंदे में टकराव होना तय है।

बहरहाल, महाराष्ट्र की राजनीति में हुए इस ताजा उलटफेर से 288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा में सत्ता पक्ष के अब 206 विधायक हो गये हैं। विपक्षी विधायकों की संख्या घटकर अब सिर्फ 82 रह गयी है। ऐसे में महाराष्ट्र में 2024 के आमचुनाव में भाजपा ज्यादा ताकतवर तरीके से मैदान में उतरेगी, इसमें दो राय नहीं है।

पूर्णविराम नहीं है बगावत

बिहार की 40 लोकसभा सीटों और महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों को भाजपा अपने लिए चुनौती के रूप में देख रही थी। उत्तर प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा 48 लोकसभा सीट देने वाले महाराष्ट्र में भाजपा को अपने सुनहरे भविष्य के लिए विपक्षी एकता को तोड़ना जरूरी था। शिवसेना की टूट के बाद आधी रह गई विपक्षी ताकत को अजीत पवार के विद्रोह ने लगभग खत्म कर दिया है। फिलहाल महाराष्ट्र में भाजपा मजबूत स्थिति में है।

अजीत पवार से अपनी लड़ाई को उनके चाचा शरद पवार जनता के बीच में ले जाने का एलान कर चुके हैं। ऐसे में महाराष्ट्र की जनता किसके साथ खड़ी है, यह आने वाले नगरीय निकाय चुनाव, लोकसभा चुनाव और उसके बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में पता चलेगा। लेकिन उद्धव और शरद पवार दोनों को नए नाम, नए चुनाव चिन्ह और नए नेताओं के साथ पार्टी खड़ी करना आसान नहीं होगा। शरद पवार की पार्टी में हुई बगावत ने मोदी के खिलाफ एकत्रित हो रहे विपक्षी नेताओं को तगड़ा झटका भी दिया है।

ऐसे में महाराष्ट्र की राजनीति में अजीत पवार की बगावत पूर्ण विराम नहीं है। एनसीपी में उठापटक भले खत्म हो गयी हो लेकिन महाराष्ट्र अभी और राजनीतिक उठापटक का गवाह बनेगा यह तय है। विपक्ष को साथ लाते लाते भाजपा ही इतने विरोधाभासों से भर गयी है कि भविष्य में लंबे समय तक उसे साध पाना उसके लिए आसान नहीं होगा। वैसे भी अजीत पवार बार बार मुख्यमंत्री बनने की इच्छा सार्वजनिक रूप से जाहिर कर चुके हैं। भविष्य में अपनी इच्छा पूर्ति के लिए वो प्रयास नहीं करेंगे, ये कैसे कहा जा सकता है?

चाचा भतीजा में चला शह मात का खेल

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शरद पवार और उनके भतीजे अजीत पवार के बीच पर्दे के पीछे जारी शह और मात का खेल रविवार को अंतिम नतीजे पर पहुंच गया। अजीत पवार 40 विधायकों के साथ बगावत करके महाराष्ट्र में भाजपा और एकनाथ शिंदे की सरकार में शामिल हो गये। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में यह विभाजन उसी तरह हुआ है जिस तरह शिवसेना में एकनाथ शिंदे ने अपने समर्थक विधायकों के साथ किया था। फर्क इतना है कि एकनाथ जिस सरकार का हिस्सा थे, उसी सरकार को गिराकर भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बने और अजीत पवार विपक्ष के नेता रहते हुए अपनी ही पार्टी से विद्रोह कर बैठे। अजीत पवार सहित 9 राष्ट्रवादी कांग्रेस के विधायकों को मंत्री बनाया गया है। अजीत पवार ने दावा किया है कि 53 में से 40 विधायक उनके साथ हैं। बगावत को अंजाम देने वाले अजीत पवार खुद उपमुख्यमंत्री बन गए हैं। भारतीय जनता पार्टी जिसके सबसे ज्यादा 105 विधायक हैं, उसके नेता और पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस शिंदे सरकार में पहले से ही उप मुख्यमंत्री है।

दरअसल, राष्ट्रवादी कांग्रेस में यह बगावत अचानक नहीं हुई। इसकी पटकथा तब से लिखी जा रही थी, जब से एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे से बगावत कर भाजपा के साथ सरकार बना ली थी। शिंदे सरकार को तीन दिन पहले 30 जून को एक साल पूरा हुआ था। इस एक साल में शरद पवार महाराष्ट्र के साथ साथ पूरे देश में विपक्षी एकता को मजबूत करने मेें जुटे थे। वहीं उनके भतीजे पिछले एक साल से भाजपा के साथ सरकार का हिस्सा बनने की रणनीति बनाने और बगावत को अंजाम देने में जुटे थे। भतीजेे की बगावत और उसको भाजपा के पाले में जाने से रोकने के लिए शरद पवार ने एक मई को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। हांलाकि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के मान मनोव्वल के बाद उन्होंने इस्तीफा वापस ले लिया था।

पार्टी में सभी इस बात को जानते थे कि शरद पवार ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा अजीत पवार के भाजपा के साथ जाने की इच्छा और उनकी महत्वकांक्षा को लगाम लगाने के लिए दिया है। अजीत पवार शरद पवार के फिर से अध्यक्ष बनने से सहमत नहीं थे और चाहते थे कि पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन हो और उनको कमान सौंपी जाए। अजीत पवार ने शरद पवार के इस्तीफे का न विरोध किया और न ही इस्तीफा वापस लेने का समर्थन किया। इसके बाद शरद पवार ने अजीत पवार का कद कम करने के लिए 10 जून को बारामती से अपनी सांसद बेटी सुप्रिया सुले और अपने करीबी प्रफुल्ल पटेल को राष्ट्रवादी कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया।

शरद पवार का अपने भतीजे को संदेश साफ था कि पार्टी का भविष्य उनकी बेटी सुप्रिया सुले होगी,अजीत पवार नहीं। पवार की इस नियुक्ति को अपने लिए सीधी चुनौती मान रहे अजीत पवार ने उसी दिन ठान लिया था कि बस अब बहुत हुआ। कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद जब प्रफुल्ल पटेल अजीत पवार से मिलने पहुचे तो अजीत ने प्रफुल्ल पटेल को पार्टी के चुनाव चिन्ह घड़ी की ओर इशारा करते हुए कहा था कि अब फैसले की घड़ी आ गई है और मैं फैसला कर चुका हूं।

ऐसा नहीं है कि फैसले की इस घड़ी से शरद पवार सजग नहीं थे। वो सजग थे और समझ भी रहे थे लेकिन वो पार्टी में अजीत पवार के दबदबे से भी वाफिक थे, इसलिए सीधे दो दो हाथ करने से बच रहे थे। राष्ट्रवादी कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने लेखक से कहा है कि अजीत पवार के बगावती तेवरों को नजरअंदाज करना शरद पवार की राजनीतिक मजबूरी रही है। 23 नवंबर 2019 को अजीत पवार ने देवेन्द्र फड़नवीस के साथ सरकार बनाकर पहली बार शरद पवार के नेतृत्व को सीधी चुनौती दी थी। उसके बाद भी उद्धव सरकार में अजीत का उपमुख्यमंत्री बनना पार्टी में उनकी धमक दिखाने के लिए काफी था। उद्धव सरकार गिरने के बाद सदन में विपक्ष का नेता बनना भी पार्टी में अजीत के दबदबे को दिखाने के लिए पर्याप्त था।

शरद पवार और 40 का आंकड़ा

बहरहाल शरद पवार के लिए इतिहास ने मानों घड़ी की सुई दोबारा घुमा दी है। 1987 में उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री वसंत दादा पाटिल के खिलाफ ऐसा ही विद्रोह किया था और 40 विधायकों के साथ प्रोगेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट बना लिया था। इसी एलांयस के बल पर वो वसंत दादा पाटिल को हटाकर मुख्यमंत्री बने थे। अब 36 साल बाद उनके ही भतीजे ने ठीक उसी तरह से 40 विधायक तोड़कर उनके राजनीतिक भविष्य पर ग्रहण लगा दिया है। शरद पवार कह तो रहे हैं कि वो पार्टी को दोबारा खड़ा कर लेंगे लेकिन इसके लिए बहुत देर हो चुकी है। उम्र के 80 पड़ाव पार कर चुके शरद पवार के लिए फाइट बैक करना मुश्किल है। फिलहाल बगावत के दूसरे दिन जहां शरद पवार जनता के बीच जाने के लिए सतारा निकल गये वहीं अजीत पवार मुंबई में बैठकर विधायकों को एकजुट करने में जुट गये।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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