Maharashtra Congress: महाराष्ट्र में अकेली पड़ी कांग्रेस को सता रहा है पार्टी में टूट का डर
Maharashtra Congress: शिवसेना, एनसीपी में चौंकाने वाली टूट के बाद अब अगली बड़ी टूट क्या कांग्रेस में होगी? इस सवाल का जवाब सकारात्मक है। बहुत संभव है कि अब महाराष्ट्र कांग्रेस में भी बिखराव आ जाए। महाराष्ट्र में विपक्ष के नेता अजित पवार के पाला बदल कर सरकार में उपमुख्य़मंत्री बन जाने के अत्यंत आश्चर्यजनक राजनीतिक घटनाक्रम को कांग्रेस में काफी गंभीरता से लिया जा रहा है। पार्टी के बड़े नेता भी मान रहे हैं कि अजित पवार के बीजेपी के साथ चले जाने के बाद अगले साल होनेवाले चुनाव में हार-जीत का गणित बदल चुका है और इस कारण कांग्रेस विधायकों के लिए भी पालाबदल करके सत्ता के साथ जाने का रास्ता खुल गया है।
रविवार से लेकर मंगलवार तक तीन दिनों से दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान और उसके प्रतिनिधियों तथा मुंबई में बैठे कांग्रेस नेताओं के बीच लगातार फोन घनघना रहे हैं। सतर्कता यह बरती जा रही है कि किसी को खबर तक नहीं लगे कि किस पर नजर रखी जा रही है और सावधानी यह भी कि पार्टी को लगातार एकजुट बनाए रखना है। खास ध्यान इस पर है कि कांग्रेस का कौनसा विधायक बीजेपी के किस बड़े नेता के संपर्क में है, किस विधायक पर किस बीजेपी नेता का प्रभाव है तथा कौन कौन से विधायक हार के गणित से डर कर किसी दूसरे रास्ते पर अपने कदम बढ़ा सकते हैं, इसका गहन आकलन किया जा रहा है।

जानकारी इस बात की भी जुटाई जा रही है कि अजित पवार किस कांग्रेस नेता को अपने साथ लाने में सक्षम साबित हो सकते हैं। कांग्रेस में हालात सावधानी के हैं। दिल्ली में बैठा आलाकमान सतर्क है, और महाराष्ट्र में कांग्रेस के विधायक सहमे हुए हैं क्योंकि सब के सब स्कैनर पर हैं। फोन पर किसी से खुलकर बात करना भी उनको नहीं सुहा रहा।
महाराष्ट्र में कांग्रेस की नजर अब अपने ही विधायकों पर इसलिए है, क्योंकि आलाकमान को पता है कि पार्टी में प्रादेशिक नेताओं के बीच व्यक्तिगत स्तर पर काफी खींचतान है। विधायकों में असंतोष भी है। राजनीतिक विश्लेषक अभिमन्यु शितोले मानते हैं कि "कांग्रेस नेतृत्व इस तथ्य से भी बहुत ही अच्छी तरह से वाकिफ है कि एनसीपी में बड़ी टूट से प्रदेश के बदले हुए राजनीतिक हालात में कांग्रेस विधायकों को हार की चिंता सता रही है।" शितोले मानते हैं कि "बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में कांग्रेस के ज्यादातर विधायकों के लिए अगला चुनाव जीतना मुश्किल होगा। ऐसे में हर विधायक सुरक्षित रास्ता अपनाना चाहता हैं।"
नई दिल्ली में एक दशक तक कांग्रेस मुख्यालय की राजनीतिक गतिविधियों के साक्षी रहे वरिष्ठ पत्रकार संदीप सोनवलकर मानते हैं कि "कांग्रेस विधायकों के लिए अब भाजपा की हिंदुत्व की विचारधारा से दूरी बनाकर रखना कोई बड़ा कारण नहीं हैं। क्योंकि कांग्रेस पहले भी कट्टर हिंदुत्व की विचार रखने वाली शिवसेना के साथ उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार में सहभागी रही है।" इस कारण से भी कांग्रेस के विधायकों के लिए शिवसेना, भाजपा और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की सामूहिक सरकार के साथ खड़े रहना ज्यादा आसान है। वैचारिक रूप से भी कांग्रेस सदा से राष्ट्रवादी कांग्रेस की सबसे करीबी पार्टी रही है। नई दिल्ली की नजर मुंबई पर इसी कारण है, क्योंकि उसे अपने विधायकों को साथ रखे रहना ज्यादा जरूरी हो गया है।
हालात कांग्रेस में टूट के समर्थन में हैं और माहौल भी। महाराष्ट्र में कांग्रेस के कई वर्तमान विधायक ऐसे हैं, जिनका बदले हुए राजनीतिक हालात में कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में अगला चुनाव लड़ना या जीतना दोनों ही लगभग बेहद मुश्किल है। राजनीतिक विश्लेषकों की राय में ऐसे लोग अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने के लिए बीजेपी - शिवसेना - एनसीपी के वर्तमान सत्ता समीकरण में समाहित हो सकते हैं।
सरकार में रहने के लिए कांग्रेस की वैचारिक बाधाएं साढ़े तीन साल पहले वैसे भी टूट ही गई थीं, जब स्वयं सोनिया गांधी ने कट्टर हिंदुत्व का मुखर मुखौटा माने जाने वाले उद्धव ठाकरे को अपना समर्थन घोषित किया था। उस समर्थन के पीछे महाराष्ट्र के कांग्रेस विधायकों का सामूहिक दबाव था, क्योंकि वे हर हाल में सरकार में रहना चाहते थे। इतिहास गवाह है कि महाराष्ट्र के कांग्रेस विधायक 2019 के चुनाव के बाद जब जयपुर में बाड़ाबंदी में थे, तो राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और शिवसेना से गठबंधन के उस वक्त के गवाह अहमद पटेल ने शिवसेना के साथ सरकार बनाने के बारे में विधायकों की राय ली, तो जयपुर में उपस्थित 40 में से 36 विधायकों ने शिवसेना के साथ सरकार बनाने की सहमति जताई थी। बाकी ने फैसला आलाकमान पर छोड़ा था।
उसके बाद लगातार ढाई साल तक कांग्रेस शिवसेना के साथ सत्ता में रही। तस्वीर साफ है कि कांग्रेस के विधायक हर हाल में सत्ता में रहना चाहते हैं। वैसे, विधायकों की जरूरत भी है क्योंकि सत्ता में न होने के कारण उनके इलाके में विकास के काम अटके हुए हैं। फिर, विधायकों को अपने भविष्य का डर भी सता रहा है, जिसका सबसे बड़ा कारण यह है कि अगर बीजेपी, शिवसेना (शिंदे) और एनसीपी (अजित) तीनों मिलकर विधानसभा चुनाव में उतरे, तो कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर ज्यादातर विधायकों की जीत की संभावना भी क्षीण ही है। विधायकों की इसी असलियत को जानते हुए रविवार से ही कांग्रेस आलाकमान सतर्क और सावधान है।
कांग्रेस के महाराष्ट्र प्रभारी व कर्नाटक के मंत्री एचके पाटिल, प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और पृथ्वीराज चव्हाण सहित वरिष्ठ नेता बालासाहेब थोरात व मुंबई कांग्रेस की अध्यक्ष वर्षा गायकवाड़ सहित कुछ अन्य बड़े नेताओं से दिल्ली के बड़े नेता लगातार संपर्क में हैं। कांग्रेस के जो विधायक पाला बदल सकते हैं, उन पर नजर रखने के संकेत हैं और असलम शेख जैसे शिवसेना से प्यार की पींगे बढ़ाने के संकेत देनेवाले विधायकों पर नजर रखी जा रही है।
कांग्रेस ने अपनी बैठक भी बुलाई है, लेकिन महाराष्ट्र के कांग्रेसी विधायकों के लिए अब इस सबके कोई खास मायने नहीं है, क्योंकि उनके लिए सबसे बड़ा सवाल सत्ता का साथ पाने का है। सवाल हर हाल में अगला चुनाव जीतने का भी है। ऐसे में कांग्रेस में अपने लिए कम संभावनाएं होने की वजह से विधायकों में एक बड़ी टूट हो सकती है, ऐसा माना जा रहा है। यह भी माना जा रहा है कि अगर टूट नहीं हुई, तो चुनाव आते आते धीरे धीरे करके एक एक कांग्रेस नेता बीजेपी के साथ खड़े हो सकते हैं। कांग्रेस का डर इसीलिए जायज है, इसी डर में कांग्रेस सतर्क भी है और सावधान भी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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