Madhya Pradesh Congress: मध्य प्रदेश में 'मोहब्बत की दुकान' छोड़कर क्यों भाग रहे कांग्रेसी?
Madhya Pradesh Congress: कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी देशभर में 'नफरत के बाजार में, मोहब्बत की दुकान' खोलने का उपक्रम कर रहे हैं किंतु मध्य प्रदेश में उनकी मोहब्बत की दुकान में ताला लगने की नौबत आती जा रही है।
कमलनाथ के 'भगवाधारी' होने-न होने के अंदेशे के बीच राहुल गांधी की न्याय यात्रा की मध्य प्रदेश से रुखसती के तीसरे दिन इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी और सोनिया गांधी के सबसे करीबी नेताओं में शुमार वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सुरेश पचौरी ने अपने समर्थक दल-बल के साथ कांग्रेस को बाय-बाय कह दिया।

सुरेश पचौरी के साथ इंदौर लोकसभा क्षेत्र से संजय शुक्ला और देपालपुर से विशाल पटेल सहित भोपाल जिला कांग्रेस अध्यक्ष कैलाश मिश्रा, धार से पूर्व सांसद गजेंद्र सिंह राजूखेड़ी व अन्य ने कांग्रेस को 2020 की ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत के बाद सबसे बड़ा झटका दिया है।
भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के सामने विधानसभा चुनाव लड़ने से देशभर में चर्चा के केंद्र में आए संजय शुक्ला का नाम इंदौर लोकसभा से कांग्रेस के पैनल में सबसे ऊपर था, वहीं सुरेश पचौरी को भी पार्टी भोपाल या होशंगाबाद लोकसभा से चुनाव लड़ाने के मूड में थी। किस्मत तो गजेंद्र सिंह राजूखेड़ी की भी चमक सकती थी क्योंकि धार से कांग्रेस को कोई सशक्त चेहरा नहीं मिल रहा था। अब स्थिति यह है कि इंदौर, भोपाल, होशंगाबाद और धार से कांग्रेस के पास ऐसा कोई प्रत्याशी नहीं है जो भाजपा के मजबूत प्रत्याशी के सामने लड़ सके।
सूत्रों के अनुसार धार से गजेंद्र सिंह तो होशंगाबाद से सुरेश पचौरी भाजपा की टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ सकते हैं। हालांकि भाजपा ने होशंगाबाद लोकसभा सीट से दर्शन सिंह चौधरी को टिकट दे दिया है किंतु पार्टी यहां बदलाव भी कर सकती है। यदि टिकट न भी बदला तो 24 वर्षों तक राज्यसभा सांसद रहे सुरेश पचौरी को पार्टी राज्यसभा में एडजस्ट कर उनके अनुभव का लाभ उठा सकती है।
हालांकि अब भाजपाई हलकों में यह प्रश्न मुखर होता जा रहा है कि वर्तमान भाजपा तो पहले से अधिक कांग्रेसी होती जा रही है। आखिर इसका परिणाम क्या होगा? क्या भाजपा के समर्पित कार्यकर्ता इन आयातित नेताओं को दिल से स्वीकार कर पाएंगे? इन सबमें यह भी बड़ा प्रश्न है कि इन सभी नेताओं का पुनर्वास कैसे और कब होगा?
जिनके खिलाफ लड़े, अब उनके साथ खड़े
राहुल गांधी की न्याय यात्रा के मध्य प्रदेश आगमन के समय ग्वालियर-चंबल संभाग में कार्यकर्ताओं के नाश्ते-भोजन की व्यवस्था का अपने खर्चे पर प्रबंध करने वाले संजय शुक्ला 200 करोड़ से अधिक की संपत्ति के मालिक हैं। पार्षद, विधायक रहते हुए अपने खर्च से क्षेत्र की जनता को तीर्थयात्रा करवाने और भंडारे की राजनीति से इंदौर में कैलाश विजयवर्गीय के समकक्ष खड़े होने से संजय शुक्ला कांग्रेस के कद्दावर नेता बन गए थे।
2023 के विधानसभा चुनाव में उनके बढ़ते कद को देखते हुए भाजपा ने अपने कद्दावर नेता कैलाश विजयवर्गीय को संजय शुक्ला के सामने इंदौर विधानसभा क्रमांक 1 से उतारकर प्रदेश की राजनीति में भूचाल ला दिया था। इंदौर में जनसंघ और भाजपा के शिल्पकार रहे स्व. विष्णुप्रसाद शुक्ला के बेटे संजय शुक्ला को पूरे चुनाव प्रचार में कैलाश विजयवर्गीय अपना बच्चा बताते रहे किंतु संजय शुक्ला ने उन पर गंभीर एवं चारित्रिक आरोपों की झड़ी लगा दी।
हालांकि कैलाश विजयवर्गीय चुनाव जीत गए किंतु इंदौर शहर की जनता के मन में यह बात घर कर गई कि भाजपा को कोई टक्कर दे सकता है तो वह संजय शुक्ला ही है। अब जबकि संजय शुक्ला स्वयं कैलाश विजयवर्गीय के हाथों से भगवा गमछा पहन चुके हैं तो इंदौर की राजनीति के समीकरण ही बदल गए हैं। समीकरण तो शुक्ला परिवार में भी बदलेंगे क्योंकि इन्हीं संजय शुक्ला के चचेरे भाई गोलू शुक्ला कांग्रेस के गढ़ रहे विधानसभा क्रमांक 3 से कमल खिला चुके हैं। अब एक ही परिवार के दो कद्दावर भाइयों की राजनीतिक उड़ान को भाजपा कितनी ढील देगी, यह भविष्य बताएगा।
इसी प्रकार देपालपुर से धनाढ्य विशाल पटेल को भाजपा में शामिल करवाकर पार्टी ने स्व. निर्भयसिंह पटेल की राजनीतिक विरासत के भी दो टुकड़े कर दिए हैं जिसका दूसरा टुकड़ा विधायक मनोज पटेल होंगे। विशाल और मनोज की राजनीतिक अदावत किसी से छुपी हुई नहीं है। शिवराज सिंह चौहान के वरदहस्त के चलते मनोज पटेल अब तक विशाल पटेल से जमकर लोहा लेते थे किंतु अब न तो प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान का राज है और न ही उनका हस्तक्षेप वर्तमान शासन बर्दाश्त करेगा। ऐसे में विशाल पटेल के भाजपा में आने और संजय शुक्ला के मित्र होने का लाभ तो उनको मिलेगा।
जहां तक सुरेश पचौरी की बात है तो वे कभी जननेता नहीं रहे। यहां तक कि अपने जीवन में दो चुनाव, लोकसभा और विधानसभा, वे बुरी तरह हारे हैं। मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहते हुए उन पर टिकट के बदले धन लेने के भी आरोप लगे थे किंतु गांधी-नेहरू परिवार से नजदीकी उनको बचा ले गई। हालांकि यह भी सच है कि प्रदेश में कांग्रेस की सर्वाधिक दुर्गति भी उन्हीं के अध्यक्ष रहते हुई। उन्हें कांग्रेस ने हमेशा ब्राह्मण नेता के तौर पर प्रस्तुत किया है किंतु वे कभी प्रदेश के ब्राह्मणों के नेता नहीं बन पाए।
भाजपा ने पचौरी का आगमन मात्र कांग्रेस का मनोबल तोड़ने हेतु किया है ताकि यह संदेश दिया जा सके कि कांग्रेसी नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में स्वयं को असहज महसूस कर रहे हैं। गजेंद्र सिंह राजूखेड़ी के भाजपा में आने से धार में रंजना बघेल परिवार को परेशान होना स्वाभाविक है क्योंकि अब तक परिवार के नखरे झेलती रही भाजपा में अब एक सशक्त चहेरा है जो धार में पार्टी की राजनीति को धार दे सकता है।
भोपाल से कैलाश मिश्रा का हित सुरेश पचौरी तय करेंगे क्योंकि राजधानी में भाजपा में एक अनार सौ बीमार वाले हाल हैं और कई कद्दावर नेता पद की लालसा में पार्टी की ओर ताक रहे हैं। खैर, ये सभी तो देर-सवेर कुछ न कुछ पा ही लेंगे किंतु खोया तो जनता का विश्वास है कि जो एक-दूसरे के खिलाफ खड़े थे, आज साथ साथ खड़े हैं।
नहीं रुक पा रही कांग्रेस की भगदड़
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद केंद्रीय नेतृत्व ने राहुल गांधी के करीबी पूर्व मंत्री जीतू पटवारी को प्रदेश कांग्रेस का मुखिया यह सोचकर बनाया था कि वे वरिष्ठ एवं युवा नेताओं के बीच समन्वय स्थापित कर पार्टी को पुनर्जीवित करेंगे किंतु उनके अध्यक्ष बनने के बाद से ही पार्टी नेताओं में अजीब सी बेचैनी दिख रही है। वरिष्ठ उन्हें अपना नेता मानने को तैयार नहीं हैं तो युवाओं को उनका 'बॉस' रूप अधिक पसंद नहीं आ रहा।
स्थिति यह हो गई है कि इंदौर के होने के बाद भी उन्हें इंदौर के दो बड़े कांग्रेस नेताओं के भाजपा में शामिल होने की भनक तक नहीं लगी। यदि यही हाल रहा तो नकुलनाथ भी यदि भगवा गमछा ओढ़े दिखें, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह तो पहले से ही पार्टी को आंखें दिखाने लगे थे। भाजपा अरुण यादव पर भी डोरे डाल रही है। अभी स्थिति यह है कि कांग्रेसी प्रदेश की 6 लोकसभा सीटें जीतने और 6 पर कड़ी टक्कर देने का दंभ भर रहे हैं किंतु लड़कर जीतेगा कौन, इस पर मौन साधे हुए हैं।
कई लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस के पास मजबूत और सर्वमान्य चेहरा तक नहीं है। इंदौर, ग्वालियर, भोपाल, जबलपुर जैसे महानगरों में दशकों से कांग्रेस का सांसद नहीं बना है। इन परिस्थितियों में मोहब्बत की दुकान खोलने से अच्छा होता कि राहुल गांधी पहले मोहब्बत बेचने वाले दुकानदारों को संभालते ताकि मोहब्बत खरीदने वाले खरीददार तो मिलते। फिलहाल तो मोहब्बत की दुकान में कुछ ही लोग बचे हैं और जो बचे हैं वे साहूकार हैं जिनके पास खरीददार जाना नहीं चाहते।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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