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Madhya Pradesh BJP: भाजपा ने केन्द्रीय नेताओं को क्यों दिया विधायक बनने का टिकट?

राजनीतिक शह-मात, गुटबाजी, कद्दावर नेताओं के पार्टी छोड़ने के बीच भाजपा के कार्यकर्ता विधानसभा चुनाव को लेकर असमंजस में थे किन्तु जैसे ही केंद्रीय कार्यालय ने भाजपा प्रत्याशियों की दूसरी सूची जारी की, कार्यकर्ता मानो सोती नींद से जाग गए।

राजनीतिक पंडितों ने भी यह कल्पना नहीं की होगी कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व 7 हेवीवेट सांसदों, जिसमें तीन केंद्रीय मंत्री हैं, सहित राष्ट्रीय महासचिव को विधानसभा चुनाव का टिकट देकर प्रदेश का राजनीतिक तापमान बढ़ा देगा।

Madhya Pradesh Why did BJP give tickets to central leaders to become MLAs

यह दीगर तथ्य है कि जबसे गृहमंत्री अमित शाह ने मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव की बागडोर अपने हाथों में ली है, वहां बड़े पैमाने पर प्रयोग हो रहे हैं। पहले जो 49 प्रत्याशियों की सूची जारी हुई थी उसमें अधिकांश वे विधानसभा सीटें थीं जहां भाजपा लंबे समय से हार रही थी। ऐसे में ढ़ाई-तीन माह पूर्व प्रत्याशी चयन से भाजपा प्रत्याशी को क्षेत्र में संपर्क करने का पर्याप्त समय मिलेगा जिसका परिमाण सुखद भी हो सकता है। इसके पश्चात जारी 39 प्रत्याशियों की दूसरी सूची ने निश्चित रूप से कांग्रेस के ऊपर बहुत बड़ी बढ़त बना ली है और अब कांग्रेस के समक्ष प्रत्याशी चयन की दुविधा मुंह बाये खड़ी है।

दरअसल, दूसरी सूची जो जारी हुई है उसमें केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर मुरैना जिले की दिमनी सीट से, ग्रामीण विकास राज्य मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते मंडला जिले की निवास सीट से, जल शक्ति राज्य मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल नरसिंहपुर से, जबलपुर से सांसद राकेश सिंह जबलपुर पश्चिम से, सतना से सांसद गणेश सिंह सतना से, सीधी से सांसद रीति पाठक सीधी से, होशंगाबाद से सांसद उदय प्रताप सिंह नरसिंहपुर जिले की गाडरवाड़ा से और राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय इंदौर की विधानसभा क्रमांक एक से चुनाव लड़ते नजर आएंगे।

भाजपा नेतृत्व को आशा है कि कद्दावर नेताओं को टिकट देने से न केवल वो अपनी सीट जीतेंगे बल्कि उनके आसपास की सीटों पर भी इसका असर होगा और भाजपा की कमजोर दशा में सुधार होगा।

विधानसभा चुनाव का टिकट मिलने के बाद स्वाभाविक है ये नेता अब प्रदेश की राजनीति में एक्टिव होंगे जबकि लंबे समय से प्रदेश की राजनीति से दूर थे। फग्गन सिंह कुलस्ते आखिरी बार 1990 में विधानसभा चुनाव लड़े थे और 1992 तक विधायक रहने के बाद से 6 बार लोकसभा सांसद और एक बार राज्य सभा सांसद रह चुके हैं। यानि फग्गन सिंह कुलस्ते 33 वर्षों बाद प्रदेश की राजनीति में सक्रिय होने जा रहे हैं। नरेंद्र सिंह तोमर 10 वर्षों बाद विधानसभा चुनाव लड़ेंगे वहीं प्रह्लाद सिंह पटेल का यह पहला ही विधानसभा चुनाव होगा। 6 बार के विधायक कैलाश विजयवर्गीय 2018 से प्रदेश की राजनीति से दूर हैं जबकि रीति पाठक पहली बार विधायक बनने के लिए मैदान में उतारी गई हैं।

गणेश सिंह अपना पहला विधानसभा चुनाव हार गए थे और उसके बाद से 4 बार सांसद रहे किन्तु अब एक बार पुनः वे केंद्रीय नेतृत्व के निर्णय से प्रदेश की राजनीति में सक्रिय होंगे। उदय प्रताप सिंह 2007 में कांग्रेस विधायक के रूप में विधानसभा में बैठे थे किन्तु इस बार वे भाजपा के टिकट पर वोट मांगते नजर आएंगे। इन सभी नेताओं में नरेंद्र सिंह तोमर, प्रह्लाद सिंह पटेल, कैलाश विजयवर्गीय और फग्गन सिंह कुलस्ते का नाम भावी मुख्यमंत्री के तौर पर भी उछाला जाता रहा है किन्तु इस सूची के आने से इतना तो तय है कि यदि भाजपा अपनी सरकार बना लेती है तो इतने वरिष्ठ नेताओं में मुख्यमंत्री पद के लिए आपसी सहमति बनाना कठिन होने वाला है।

बहरहाल, भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने दूसरी सूची में बड़े केंद्रीय नेताओं को प्रदेश के चुनावी रण में उतारकर स्पष्ट संकेत दे दिया है कि मध्य प्रदेश चुनाव को वह हलके में नहीं ले रहा है। वैसे भी केंद्र की राजनीति में विकल्प की कमी और चेहरे के अभाव ने नरेंद्र मोदी के विजयी रथ को रोकने में नाकामी हासिल की है और संभवतः यह स्थिति 2024 के लोकसभा चुनाव में भी रहने वाली है। खासकर विपक्षी गठबंधन में चेहरे की लड़ाई भले ही अभी नहीं हुई हो किन्तु चुनाव आते-आते इसका विस्फोट होना तय है अतः केंद्र की राजनीति को लेकर भाजपा अभी निश्चिंत है किन्तु प्रदेशों को लेकर वैसी निश्चिंतता भाजपा नेतृत्व को नहीं है।

पहले हिमाचल प्रदेश, पंजाब और हाल ही में कर्नाटक जैसे दुर्ग ढहने के बाद भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व जनता के बीच यह संदेश नहीं देना चाहता कि प्रदेशों से भाजपा के पैरों तले जमीन खिसक रही है। फिर मध्य प्रदेश गुजरात की ही भांति हिंदुत्व की प्रयोगशाला का बड़ा गढ़ है और 2018 में कमलनाथ सरकार ने डेढ़ साल के अपने संक्षिप्त कार्यकाल में ही इस प्रयोगशाला को नुकसान पहुंचा दिया था।

जिस दूसरी सूची में भाजपा ने अपने केन्द्रीय नेताओं को विधानसभा चुनाव में उतारा है उस दूसरी सूची की 39 विधानसभा सीटों में से 36 विधानसभा सीटें भाजपा 2018 में हार गई थी और सरकार बनाने से चूक गई थी। ऐसे में बड़े केंद्रीय नेताओं को विधानसभा चुनाव में उतारकर पार्टी ने साफ संकेत दिया है कि वह इस बार कांग्रेस को कोई मौका नहीं देना चाहती।

हालांकि इस सूची के जारी होते ही कहीं-कहीं विवाद की स्थिति बन रही है। मसलन, नागदा से तेज बहादुर सिंह का विरोध होने लगा है, वहीं सीधी में वर्तमान विधायक केदारनाथ शुक्ला के समर्थक प्रदर्शन कर रहे हैं। ये वही केदारनाथ शुक्ला हैं जिनके खास समर्थक पर आदिवासी समुदाय के पुरुष पर पेशाब करने का वीडियो वायरल हुआ था।
इसके अलावा भितरवार से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे अनूप मिश्रा को ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक मोहनसिंह राठौर के हाथों मायूसी मिली है तो सतना के विधायक नारायण त्रिपाठी की पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते छुट्टी हो गई है। दोनों स्थानों पर विरोध के स्वर भी उठने लगे हैं। नरसिंहपुर में जालम सिंह पटेल के स्थान पर उनके बड़े भाई प्रह्लाद सिंह पटेल को टिकट देकर पार्टी ने क्षेत्र में पटेल परिवार की पारिवारिक मजबूती को स्वीकार किया है।

बहरहाल, भाजपा की दूसरी सूची जारी होते ही जहां कई नेता पुत्र-पुत्रियों का राजनीति में स्थापित होने का सपना टूटा है वहीं पार्टी ने हिरेंद्र सिंह बंटी, ज्योति डहेरिया, नंदा ब्राह्मणे, नरेंद्र शिवाजी पटेल, मधु गहलोत, श्रीकांत चतुर्वेदी, पंकज टेकाम, गौरव पारधी, तेज बहादुर सिंह व श्याम बर्डे जैसे नए चेहरों को टिकट देकर क्षेत्र में एंटी-इन्कंबेंसी को भी रोकने की जद्दोजहद की है।

इस दूसरी सूची ने भाजपा के भविष्य की राजनीति की झलक भी दे दी है कि आगामी लोकसभा चुनाव में युवा प्रोफेशनल्स चुनाव लड़ते नजर आएंगे। हालांकि कांग्रेस ने भाजपा की दूसरी सूची पर तंज कसते हुए इसे 15 वर्षों का कुशासन बताया है किन्तु कहीं-कहीं अब कांग्रेस पर भी दबाव है कि वे अपने राष्ट्रीय स्तर के चर्चित चेहरों जैसे दिग्विजय सिंह, अरुण यादव, सुरेश पचौरी, विवेक तन्खा, अजीज कुरैशी, कांतिलाल भूरिया को विधानसभा के रण में उतारे और भाजपा को कड़ी चुनौती पेश करे।

फिलहाल भाजपा ने राज्य से जुड़े अपने केन्द्रीय नेताओं को विधानसभा चुनाव में उतारकर हाथ से फिसलते मध्य प्रदेश को कसकर पकड़े रखने का प्रयास किया है। वह इस प्रयास में सफल होती है या नहीं ये चुनाव परिणाम ही बतायेगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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