Madhya Pradesh CM: मध्य प्रदेश भाजपा में जय माधव-जय यादव युग की शुरुआत

Madhya Pradesh CM: उज्जैन दक्षिण से विधायक डॉ. मोहन यादव मध्यप्रदेश के नए मुखिया चुन लिये गये। 11 दिसंबर को भोपाल के पार्टी कार्यालय में जब केंद्रीय पर्यवेक्षकों की उपस्थिति में विधायक दल का नेता चुनने की बैठक चल रही थी, तो यादव पीछे की पंक्ति में बैठे थे। उनके नाम का प्रस्ताव शिवराज सिंह चौहान ने रखा तो उन्हें भी यकीन नहीं हुआ। शिवराज सिंह के कहने पर वे दोनों हाथ जोड़कर खड़े हुए और विधायकों ने उन्हें अपने नेता के रूप में मान्यता दी। इससे पूर्व विधायकों के फोटो सेशन में भी यादव तीसरी पंक्ति में बैठे नजर आए थे गोयाकि उन्हें स्वयं इस बात का भान नहीं था कि वे साढ़े सात करोड़ जनसंख्या के मुखिया बनने वाले हैं।

तमाम राजनीतिक विश्लेषक इस घटना को बदलती भाजपा की कार्यप्रणाली बता रहे हैं किंतु ऐसा है नहीं। याद कीजिए 2005, जब बाबूलाल गौर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और असंतोष के चलते उनकी कुर्सी पर संकट के बादल छा गए थे तथा नए मुख्यमंत्री की खोज की जा रही थी। तब केंद्रीय पर्यवेक्षक के रूप में प्रमोद महाजन और लालकृष्ण आडवाणी भोपाल आए थे। उस बैठक में जब प्रमोद महाजन ने प्रदेश के मुखिया के तौर पर तत्कालीन सांसद शिवराज सिंह चौहान का नाम रखा और लालकृष्ण आडवाणी ने उनका अनुमोदन किया, तब भी प्रदेश में ऐसी स्थिति बनी थी जैसी 11 दिसंबर को बनी।

Madhya Pradesh CM Beginning of Jai Madhav-Jai Yadav era in mp BJP

तब भी मुख्यमंत्री के तौर पर शिवराज सिंह का नाम दूर-दूर तक नहीं था और इस बार दो पूर्व केंद्रीय मंत्रियों सहित राष्ट्रीय महासचिव और तमाम कद्दावर नेताओं के बीच मोहन यादव का नाम किसी के जेहन में नहीं था। दोनों घटनाएं यह इंगित करती हैं कि पार्टी का नेतृत्व किसी के पास भी क्यों न हो, उसकी कार्यप्रणाली नहीं बदली है। भाजपा पहले भी चौंकाती थी, अब भी चौंका रही है।

कौन हैं मोहन यादव?

उज्जैन दक्षिण से तीसरी बार विधायक चुने गए मोहन यादव के सामाजिक-राजनीतिक जीवन का प्रारंभ छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता के रूप में 1984 से हो गया था। सड़क पर संघर्ष करने की छवि ने उन्हें लोकप्रियता दी। विद्यार्थी परिषद में प्रदेश-राष्ट्रीय स्तर के विभिन्न पदों पर रहते हुए उन्होंने विद्यार्थियों के लिए बहुत काम किया। 2004 में वे भाजपा प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य बने और उमा भारती के मुख्यमंत्री रहते हुए मोहन यादव को उज्जैन विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष के साथ ही सिंहस्थ केंद्रीय समिति का सदस्य बनाया गया था। सिंहस्थ के विश्वस्तरीय सफल आयोजन ने प्रदेश की राजनीति में नए-नवेले मोहन यादव को प्रदेश स्तरीय नेता बना दिया।

प्रदेश में सबसे अधिक पढ़े-लिखे नेता के रूप में पहचान बना चुके मोहन यादव को संगठन और सत्ता का समान अनुभव है। यादव मप्र कुश्ती संघ के अध्यक्ष के साथ ही मप्र ओलंपिक संघ के उपाध्यक्ष भी हैं। 2003 में उन्हें बड़नगर से भाजपा का टिकट मिला किंतु भारी असंतोष और बाहरी उम्मीदवार के चलते उन्होंने संघ की पहल पर टिकट वापस कर दिया और 10 साल तक उज्जैन में अन्य दायित्व निभाते रहे। 10 साल बाद 2013 में पहली बार विधायक बने और ठीक 10 साल बाद अब प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं।

मोहन यादव ही मुख्यमंत्री क्यों?

प्रदेश के तमाम बड़े नेताओं के बाद भी आखिर डॉ. मोहन यादव को ही मुख्यमंत्री के रूप में क्यों चुना गया? यह सवाल राजनीतिक हलकों में पूछा जा रहा है और सभी अपने आकलन के हिसाब से इसकी विवेचना भी कर रहे हैं। दरअसल, प्रदेश में भाजपा की ओर से 2003 से ओबीसी मुख्यमंत्री ही प्रदेश की कमान संभाल रहे हैं। उमा भारती, बाबूलाल गौर (यादव) और शिवराज सिंह चौहान ने इस वर्ग को भाजपा का समर्थक बना दिया है। एक अनुमान के मुताबिक, प्रदेश में 51 प्रतिशत संख्या ओबीसी वर्ग की है जिसमें यादवों की संख्या 3 से 4 प्रतिशत है। आर्थिक रूप से सक्षम यादव समुदाय प्रदेश के विकास में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।

बाबूलाल गौर प्रदेश के पहले यादव मुख्यमंत्री थे किंतु वे यादवों को एकजुट नहीं कर पाए जबकि कांग्रेस के उप-मुख्यमंत्री के रूप में सुभाष यादव ने यादवों को एकजुट कर सहकारिता को कांग्रेस की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बना दिया था। उनके जाने के बाद उनके बेटे अरुण यादव ने यादवों को संभाल कर नहीं रखा और वे कांग्रेस से कट गए। इसी दौर में मोहन यादव राजनीति की सीढ़ियों पर दौड़ लगा रहे थे। यादवों को अपना नेता मिल गया था और भाजपा को सहकारिता क्षेत्र में यादवों के दबदबे से मजबूती मिलने लगी थी।

इसके बाद हाल ही में गठित इंडिया गठबंधन ने जातिगत जनगणना के साथ ही "जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी" की बात शुरू कर दिया। इसका केंद्र बिंदु कहीं न कहीं बिहार और उत्तर प्रदेश था जिसकी काट ढूँढना भाजपा के लिए आवश्यक था। मध्य प्रदेश में भाजपा नेतृत्व को वह काट मोहन यादव के रूप में दिखी। उनकी ससुराल यूपी के सुल्तानपुर में है। इसलिए लोकसभा चुनाव प्रचार में अखिलेश यादव के समाज के योगदान पर प्रश्न उठाते दिखें, तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। भाजपा भी यादव समुदाय को यह संदेश देना चाहती है कि यदि समुदाय उसके साथ आएगा तो वह उन्हें भी उच्च पदों पर बिठाने से गुरेज नहीं करेगी।

प्रदेश के किसी भी गुट में न होना और सभी गुटों में स्वीकार्यता डॉ. मोहन यादव के पक्ष में काम कर गई। हालांकि चुनौतियां उनके समक्ष भी कम नहीं हैं। मुख्यमंत्री के रूप में शिवराज सिंह चौहान ने लोकप्रियता के आयाम स्थापित कर दिए हैं, यादव को उसे भी ध्यान में रखकर सुशासन देना होगा। 2024 का लोकसभा चुनाव उनके लिए अग्निपरीक्षा जैसा होगा जो उनकी ताजपोशी के पैमाने को तौलेगा।

मोहन यादव का अब तक का राजनीतिक जीवन निर्विवाद नहीं रहा है। उन पर पार्टी के ही कई नेताओं ने सिंहस्थ में हुए भ्रष्टाचार के बड़े आरोप लगाए थे। इसमें उज्जैन उत्तर से पूर्व विधायक पारस जैन बड़ा नाम थे। यहां तक कि कैबिनेट की बैठक में भी मोहन यादव द्वारा परिवार के नाम पर जमीनों की हेरा-फेरी और सिंहस्थ मेला क्षेत्र की जमीन को आवासीय में बदलने के गंभीर आरोप लगे थे। परिवारवाद को लेकर भी मोहन यादव अपने ही दल के नेताओं के निशाने पर रहे हैं और मुख्यमंत्री बनने के पश्चात उन्हें इन आरोपों से बचने की आवश्यकता है क्योंकि भाजपा के लिए परिवारवाद एक प्रमुख मुद्दा है।

बहरहाल मध्य प्रदेश में लगभग डेढ दशक लंबा शिवराज का राज समाप्त हो गया है और अब यादवराज की शुरुआत हो रही है। दूसरी ओर माधवराव सिंधिया के बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया केन्द्र में अब भाजपा के ताकतवर प्रतिनिधि और मोदी के करीबी बन गये हैं। इस तरह देखा जाए तो राज्य से लेकर केन्द्र तक मध्य प्रदेश भाजपा में जय माधव-जययादव युग की शुरुआत हो रही है। यह भाजपा के लिए कितनी लाभकारी रहेगी, यह तो आनेवाला समय बतायेगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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