Madhya Pradesh BJP: मध्य प्रदेश के टिकट बंटवारे में शिवराज का राज
Madhya Pradesh BJP: भाजपा ने लोकसभा चुनाव के मद्देनजर 195 प्रत्याशियों की पहली सूची जारी करते हुए मध्य प्रदेश में भी 29 में से 24 प्रत्याशी उतार दिए हैं। 13 सांसदों को रिपीट करते हुए 6 सांसदों का टिकट काटा गया है, वहीं 5 सीटों पर दिग्गज चेहरे अब नहीं दिखेंगे।
फिलहाल 5 एसटी, 3 एससी, 4 ब्राह्मण, 2 क्षत्रिय, 1 वैश्य और 11 ओबीसी प्रत्याशी उतारकर भाजपा ने सभी वर्गों को साधने का प्रयास किया है। इन प्रत्याशियों में 4 महिला चेहरे हैं।

देवास के महेंद्र सिंह सोलंकी, मंदसौर से सुधीर गुप्ता और बैतूल से दुर्गादास उइके को संघ की नजदीकी का लाभ मिला है, वहीं टीकमगढ़ से सात बार के सांसद वीरेंद्र खटीक पर फिर से भरोसा जताया गया है। भाजपा ने आचार संहिता लागू होने के पूर्व ही 24 प्रत्याशियों की घोषणा करके सियासी शंखनाद कर दिया है जबकि कांग्रेस में अभी तक यात्राओं का दौर जारी है।
टिकट बंटवारे में 'शिव' का 'राज'
मध्य प्रदेश की 24 लोकसभा सीटों के घोषित प्रत्याशियों में से 9 प्रत्याशी शिवराज सिंह चौहान के करीबी हैं। सागर से लता वानखेड़े, रीवा से जनार्दन मिश्रा, खंडवा से ज्ञानेश्वर पाटिल, रतलाम-झाबुआ से अनीता नागर सिंह चौहान, खरगोन से गजेंद्र पटेल, राजगढ़ से रोडमल नागर, भोपाल से अलोक शर्मा, होशंगाबाद से दर्शन सिंह चौधरी, शहडोल से हिमाद्री सिंह को शिवराज सिंह का करीबी माना जाता है।
स्वयं शिवराज सिंह को 19 वर्षों बाद उनकी पारंपरिक लोकसभा सीट विदिशा से उतारा गया है। शिवराज सिंह को छिंदवाड़ा से नकुलनाथ के सामने उतारने के भी कयास थे, जिससे प्रदेश में यह संकेत जा रहा था कि केंद्रीय नेतृत्व शिवराज सिंह को मुख्यमंत्री न बनने देने के बाद कमलनाथ के प्रभाव क्षेत्र वाली लोकसभा सीट से उतारकर राजनीतिक रूप से उन्हें वनवास भेजने का मन बना चुका है किंतु विदिशा से उनकी उम्मीदवारी ने सभी कयासों को विराम दे दिया है।
फिर जिस अनुपात में शिवराज सिंह के करीबियों को टिकट दिया गया है, इससे साबित होता है कि प्रदेश में शिवराज सिंह की लोकप्रियता को नकारने का साहस केंद्रीय नेतृत्व के पास भी नहीं है। हालांकि 10 वर्ष वित्तमंत्री रहे राघवजी ने हाल ही में मीडिया को दिए एक साक्षात्कार में शिवराज सिंह को लेकर पदलोलुप सहित लॉबिंग करने वाले नेता सहित कई गंभीर आरोप लगाए हैं, किंतु इनका असर विदिशा में उनके विरुद्ध दिखेगा, ऐसा लगता नहीं है।
कभी अटल बिहारी वाजपेयी और सुषमा स्वराज की सीट रही विदिशा को शिवराज सिंह की स्वाभाविक सीट माना जाता है। शिवराज सिंह समर्थकों के अलावा विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के तीन समर्थकों मुरैना से शिवमंगल सिंह तोमर, भिंड से संध्या राय और ग्वालियर से भारत सिंह कुशवाहा को टिकट देकर ग्वालियर-चंबल संभाग में उनकी पकड़ को केंद्रीय नेतृत्व ने स्वीकार किया है।
वहीं जबलपुर से आशीष दुबे, सीधी से डॉ. राजेश मिश्रा सहित स्वयं प्रदेशाध्यक्ष वीडी शर्मा को खजुराहो से टिकट देकर भाजपा में उनके कद का भी मान रखा गया है। सबसे चौंकाने वाला निर्णय मंडला से फग्गन सिंह कुलस्ते, सतना से गणेश सिंह और दमोह से राहुल लोधी को प्रत्याशी बनाना रहा। सांसद होते हुए फग्गन सिंह कुलस्ते निवास से और गणेश सिंह सतना से विधानसभा चुनाव हार चुके थे और ऐसा माना जा रहा था कि यदि दोनों सांसद होने के बाद भी अपने क्षेत्र में विधानसभा चुनाव नहीं जीत सकते तो इनके सांसद होने से क्या लाभ?
किंतु ऐसा लगता है कि आदिवासी चेहरे फग्गन सिंह और ओबीसी कुर्मी गणेश सिंह का विकल्प पार्टी खोज नहीं पाई है। वहीं 2021 में कांग्रेस से भाजपा में आए और उपचुनाव हार चुके राहुल लोधी को दमोह से टिकट देकर लोकसभा क्षेत्र की समस्त आठ विधानसभा सीटों पर ओबीसी बहुल वोट बैंक को भुनाने का प्रयास किया गया है।
हारे प्रत्याशियों पर भरोसा आखिर क्यों?
2023 के विधानसभा चुनाव में फग्गन सिंह कुलस्ते, गणेश सिंह, अलोक शर्मा और भारत सिंह कुशवाह भाजपा की प्रचंड जीत के बाद भी हार गए थे। तब ऐसा कहा था कि इनकी क्षेत्र में निष्क्रियता और एंटी-इन्कंबेंसी इनकी हार की वजह बनी थी किंतु इन्हें हारने के बाद भी इनाम के तौर पर लोकसभा चुनाव में उतार दिया गया है। राहुल लोधी 2020 के उपचुनाव में और शिवमंगल सिंह तोमर 2018 विधानसभा चुनाव में हार चुके हैं किंतु इन्हें भी लोकसभा चुनाव का टिकट देकर भाजपा आखिर क्या साबित करना चाहती है?
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इस बार का लोकसभा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे और राम मंदिर की लहर के भरोसे ही लड़ा जाना है और ऐसे में प्रत्याशी कौन का प्रश्न गौण हो जाता है। प्रधानमंत्री स्वयं कह चुके हैं कि इस बार चुनाव 'कमल' लड़ेगा अतः इन हारे हुए नेताओं से संभवतः पार्टी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा।
हारे हुए नेताओं में सबसे बड़ा नाम ज्योतिरादित्य सिंधिया का है, जो 2019 लोकसभा चुनाव में गुना से भाजपाई केपी यादव से हार गए थे। इस बार पार्टी ने केपी यादव को घर बिठाते हुए सिंधिया को गुना से उतार दिया है। हालांकि गुना लोकसभा यादव बहुल है और केपी यादव को घर बिठाने का 'कमल' को क्या नुकसान होगा, यह चुनाव परिणाम तय करेगा। केपी यादव के रुख पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है क्योंकि सिंधिया के कारण कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए केपी यादव अब भाजपाई सिंधिया के चलते असहज महसूस कर रहे हैं। उन पर कांग्रेस ने भी डोरे डालना शुरू कर दिया है।
जिनके टिकट कटे, अब उनका क्या?
भाजपा नेतृत्व ने मध्य प्रदेश में 6 सांसदों के टिकट काटने के साथ ही 5 दिग्गजों के स्थान पर दूसरों को चुनाव लड़ने का अवसर दिया है। टिकट कटने वाले में सबसे बड़ा चेहरा भोपाल से साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर का रहा जिनकी विवादित टिप्पणियां उन पर ही भारी पड़ीं। प्रधानमंत्री का 'दिल से माफ नहीं कर पाऊंगा' का भाव भी उनकी टिकट कटने की वजह बना।
इसके अलावा भोपाल की जनता भी साध्वी को सांसद के रूप में पसंद नहीं कर रही थी। साध्वी अब राजनीति में 'उमा' गति की ओर अग्रसर हो रही हैं। विदिशा से रमाकांत भार्गव को शिवराज का करीबी माना जाता है अतः उनके राजनीतिक जीवन का निर्णय शिवराज ही करेंगे। ग्वालियर से विवेक शेजवलकर को संघ का वरदहस्त प्राप्त था किंतु बढ़ती उम्र और क्षेत्र में निष्क्रियता उनके आड़े आ गई। अब आगे इनका भी राजनीतिक भविष्य अधर में है।
सागर से राजबहादुर सिंह उम्र के चलते और रतलाम से जेपी डामोर निष्क्रियता के चलते टिकट पाने से वंचित हुए हैं। इनके पास भी अब पाने को कुछ नहीं बचा है। गुना से सिंधिया को हराने वाले केपी यादव का टिकट भी कट गया है। इसके अलावा मुरैना से नरेंद्र सिंह तोमर, सीधी से रीति पाठक, होशंगाबाद से राव उदय प्रताप सिंह, दमोह से प्रह्लाद पटेल और जबलपुर से राकेश सिंह अब विधानसभा के सदस्य हैं जिनके स्थान पर नए चेहरों को लोकसभा चुनाव लड़ने का अवसर दिया गया है।
जो सीटें रुकीं अब उन पर सबकी नजर टिकी
इंदौर, उज्जैन, धार, बालाघाट और छिंदवाड़ा सीट पर भाजपा नेतृत्व ने अभी प्रत्याशी का एलान नहीं किया है। इंदौर में सांसद शंकर लालवानी के अलावा खाती समाज या महिला को प्रतिनिधित्व देने की मांग की जा रही है। एससी सीट उज्जैन में मुख्यमंत्री मोहन यादव की पसंद अब मायने रखने वाली है। हालांकि यहां से पूर्व केंद्रीय मंत्री सत्यनारायण जटिया अपने पुत्र राजकुमार के लिए प्रयास कर रहे हैं। बालाघाट में सांसद ढाल सिंह बिसेन और पूर्व मंत्री गौरीशंकर बिसेन के बीच रार भाजपा नेतृत्व की परेशानी बढ़ा रही है। गौरीशंकर बिसेन विधानसभा चुनाव की हार का दोष सांसद पर मढ़ते हुए उनकी संभावित उम्मीदवारी का विरोध कर रहे हैं।
धार में सांसद छतर सिंह दरबार का स्थानीय स्तर पर विरोध हो रहा है और यहां भी महिला उम्मीदवार की चर्चा जोर पकड़ रही है। कमलनाथ के गढ़ छिंदवाड़ा में भाजपा से कौन का यक्ष प्रश्न बना हुआ है। यदि भाजपा इस बार इस सीट पर भी कमल खिलाना चाहती है तो उसे कमलनाथ से सशक्त उम्मीदवार देना होगा।
बहरहाल राज्य की 29 सीटों को जीतने के लिए भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व ने अपने स्तर पर निर्णय ले लिया है। देखना यह होगा कि क्या विधानसभा चुनावों की तरह आमचुनाव में भी भाजपा की एकतरफा जीत होगी या कांग्रेस जोर लगाकर उसकी एकतरफा जीत को रोक देगी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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