मतदान के सात चरण, आठवां चरण मतदाता का

Lok Sabha Voting: संसार में सात अजूबे हैं और संयोग से इस बार भारत में मतदान भी सात चरण में होगा। संसार में आठवां अजूबा भले न खोजा गया हो लेकिन भारत में मतदाता ही आठवां अजूबा है जिसके बारे में कभी भी सटीक भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है कि वह वोट देते समय किस आधार पर वोटिंग करेगा।

एक बार अनौपचारिक चर्चा में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने कहा था कि इस देश का आम मतदाता जिसे हम गंवार, देहाती या कम समझवाला समझते हैं, उससे अधिक समझदार कोई है ही नहीं। उसका सामूहिक निर्णय सदैव सटीक होता है जो देश को हमेशा नयी दिशा देता है। विचारधारा की राजनीति भले ही देश पर थोपने की कोशिश की गयी हो लेकिन भारत का आम मतदाता इससे कभी बहुत प्रभावित नहीं रहा है। उसने समय और परिस्थिति के अनुसार ही निर्णय लिया है और उसकी सामूहिक समझ वैचारिक बुद्धिजीवियों के विश्लेषण पर सदैव भारी पड़ी है।

Lok Sabha polls in 7 phases

दस साल पहले 2014 में नरेन्द्र मोदी इतने प्रचंड बहुमत से सरकार बनाने जा रहे हैं इसका अनुमान उन पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को भी नहीं था जिन्हें यह भ्रम होता है कि वो देश के लोक मानस का सटीक आकलन कर सकते हैं। मोदी की सरकार बन जाने के बाद भी बहुत लंबा समय लगा बुद्धिजीवियों को यह समझने में कि मोदी को इतनी प्रचंड जीत मिली तो आखिर क्यों मिली?

इस जीत में कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों और उनके प्रभाव में राजनीति करनेवाले नेताओं को हिन्दू मुस्लिम द्वंद नजर आया। यह एक फैक्टर जरूर था लेकिन मोदी का दस साल का कार्यकाल देखने के बाद यह कहा जा सकता है कि देश की बहुसंख्यक जनता ने एक ऐसे शासक को चुना जो कठोरता से निर्णय ले सकता है। आज से दस साल पहले राजनीति में जिस तरह की सांप्रदायिकता घुस चुकी थी, आज दस साल में ही उसका बहुत हद तक अंत हो गया है। फिर मोदी ने नोटबंदी, धारा 370 से लेकर कोरोना लॉकडाउन तक ऐसे ऐसे कठोर निर्णय लिये जो किसी अन्य नेता के बूते की बात नहीं थी।

इससे पहले के इतिहास में जाएंगे तो हम यही पायेंगे कि इस देश का सामान्य मतदाता अस्थिर चित्त नहीं है। उसकी जो सामूहिक चेतना है वह आश्चर्यजनक रूप से एक समय में लगभग एक जैसा ही सोच रही होती है। नेहरु, इंदिरा, राजीव हों या फिर अटल बिहारी और नरेन्द्र मोदी। जनता ने किसी का समर्थन किया है तो उसके पीछे उसकी सामूहिक सोच काम कर रही होती है। उस काल में उससे बेहतर कोई और दूसरा विकल्प हो ही नहीं सकता था, इसलिए बहुसंख्य जनता ने उसे ही अपना समर्थन दिया।

नब्बे का दशक जरूर भारत का राजनीतिक रूप से सबसे अस्थिर दशक था। लेकिन इस दशक की अस्थिरता के लिए अस्सी के दशक में वीपी सिंह द्वारा दिया गया अस्थिर नेतृत्व भी जिम्मेवार था। राजीव गांधी सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप थे और उस भ्रष्टाचार के खिलाफ वीपी सिंह बतौर नेता खड़े किये गये थे। लेकिन जल्द ही समझ में आ गया कि उनका नेतृत्व कमजोर है। वो आनन फानन में बने जनता दल को ही बचाकर नहीं रख पाये। फिर आर्थिक प्रशासनिक सुधार के बजाय उन्होंने सामाजिक सुधार का रास्ता पकड़ लिया जिसकी किसी ने उनसे उम्मीद ही नहीं की थी।

इसलिए वीपी सिंह गये तो अपने पीछे एक भारी उथल पुथल छोड़ गये। नरसिंहराव देश की जनता की पसंद नहीं थे। वो राजीव गांधी की मौत से उभरे शून्य को भरने आये थे। उनके बाद एचडी देवेगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल के छोटे कार्यकाल हों या अटल बिहारी वाजपेयी का 6 साल का कार्यकाल। सबसे सामने एक ही संकट था कि उन्हें स्थिर सरकार देनी है जिसे दो बार असफल होने के बाद आखिरकार तीसरी बार अटल बिहारी वाजपेयी ही दे पाये। उसके बाद मनमोहन सिंह ने गठबंधन के दस साल और मोदी ने एक पार्टी बहुमत में दस साल की सरकारों का नेतृत्व किया।

अगर हम आम चुनावों का विश्लेषण करें तो समझ आता है कि जनता एक प्रकार की परिस्थिति को दूसरे प्रकार की परिस्थिति से बदलने का प्रयास करती है। इसमें पार्टी की ओर से बनाये गये प्रधानमंत्री का आचरण और व्यवहार बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए हर जाते प्रधानमंत्री के बाद जो आता हुआ प्रधानमंत्री होता है वह पिछले का विकल्प ही नजर आता है।

जैसे नरसिंहराव, देवेगौड़ा जैसे कम बोलनेवाले प्रधानमंत्रियों के दौर में अटल बिहारी वाजपेयी जैसे ओजस्वी वक्ता प्रधानमंत्री के रूप में एक स्वाभाविक विकल्प नजर आये तो जनता ने उन्हें अपना नेता मान लिया। इसके बाद दस साल मनमोहन सिंह के ढीले ढाले मौन शासन के बाद नरेन्द्र मोदी मुखर वक्ता और कठोर शासक नजर आये तो जनता ने उन्हें अपना नेता मान लिया।

इसी पैटर्न पर चलते हुए 2024 को देखें तो इस बार अंदाज लगाना मुश्किल है कि चतुर, तेजतर्रार और आत्मकेन्द्रित मोदी ही जनता के मन में बसे हैं या फिर उनके विकल्प के तौर जनता ने इन गुणों के विपरीत वाले किसी व्यक्तित्व में विकल्प खोजना शुरु कर दिया है। मतदाता का वही रहस्यमय स्वभाव इस बार सबको परेशान कर रहा है कि आखिरकार मतदाता के मन में क्या है? उसके चरण घर से निकलकर मतदान केन्द्र तक जाएंगे तो किसको वोट देकर आयेंगे?

हालांकि भारत में औसत मतदान 60-65 प्रतिशत के आसपास ही रहता है। सभी की जीत हार इसी 60-65 प्रतिशत में ही निहित रहती है। भारत के विशाल भूभाग और यहां रोजी रोटी के लिए जनसंख्या का पलायन देखें तो यह आंकड़ा भी कहीं से कम नहीं है। देश का वह आम आदमी जिसका मतदान को लेकर अपना स्वभाव गुप्त दान वाला ही रहता है, वही सबसे अधिक इसका हिस्सेदार बनता है। लेकिन उसी के सामने रोजी रोटी का भी संकट हैं। उसके वोट से सरकारें बनती हैं, बिगड़ती हैं, नेतृत्व उभरते हैं, नष्ट हो जाते हैं लेकिन उसके अपने हालात में बहुत परिवर्तन नहीं आता है।

सरकारों को सलाह देने, उसकी दिशा तय करने में जिस इलिट क्लास का कब्जा रहता है वो वोट देने में ही विश्वास नहीं करते। वह उन सरकारों को मैनेज करने या फिर उनसे काम निकाल लेने में विश्वास करता है, जिसको चुनने के लिए आम आदमी घण्टों लाइन में लगकर वोट देता है। उसकी अपनी सामूहिक चेतना चाहे जो हो लेकिन इलिट क्लास की अपनी कोई चेतना ही नहीं होती। उसके लिए अपना धंधा व्यापार, कारोबार, लाभ-हानि, ठेका-पट्टा, सट्टा यही सब महत्वपूर्ण होता है। आश्चर्य यह कि सरकार किसी की भी बनें, यह क्लास उसे अपने सांचे में ढाल ही लेता है।

शायद यही कारण है कि वोट देने वाली सामूहिक चेतना अक्सर धोखा खाती रही है। मानों खेल का मैदान कोई और तैयार करता है और उसके खिलाड़ी किसी और लोक से आ जाते हैं। भारत के लोकतंत्र का व्यावहारिक स्वरुप इसके सैद्धांतिक आदर्शों से इतना दूर है कि इसके विरोधाभाष खत्म होने का नाम ही नहीं लेते। इन्हीं विरोधाभाषों के बीच अगर मतदाता अपने मताधिकार को गुप्त बनाये हुए है और हर आकलन करनेवाले को छकाये हुए है तो इसमें गलत भी कुछ नहीं है।

इस बार का आमचुनाव एकतरफा किसी लीडर के पीछे लामबंद होनेवाला ही रहता है या फिर जीत हार का गणित सीटों के हिसाब से बंट जाता है, इसका सही पता तो 4 जून शाम को ही लगेगा। लेकिन हमेशा की तरह इतना तो तय है कि मतदाता का आठवां चरण मतदान के सात चरणों में सबसे महत्वपूर्ण है। उसके बिवाई फटे नंगे पैर जिसके सिर पर आशीर्वाद स्वरूप स्पर्श कर देंगे, वह दिल्ली के सिंहासन पर जा बैठेगा। लेकिन वह भाग्यशाली कौन होगा, इसका पता 4 जून के बाद ही चलेगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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