Lok Sabha Elections: मोदी से मुकाबले में विपक्ष कर रहा आत्मघाती गोल

लोकसभा चुनाव में पहले दिन से भाजपा और मोदी का पलड़ा भारी दिखाई दे रहा है। नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीतिक पटल पर प्रवेश के बाद से लोकसभा के चुनाव राष्ट्रपति प्रणाली की तरह हो गए हैं।

मोदी एक लोकप्रिय चेहरा बन चुके हैं। जब तक उनके सामने एक वैकल्पिक चेहरा नहीं होगा, तब तक विपक्ष का चांस ही दिखाई नहीं दे रहा। विपक्ष भले ही यह कहता रहे कि 1996 में कौन सा चेहरा था, या 1977 में कौन सा चेहरा था, तब भी तो जनता ने तख्ता पलट दिया था। तो इन दोनों वक्त की परिस्थितियों को समझना जरूरी है।

Lok Sabha Elections Opposition is scoring self-goal in contest with Modi

1977 का नतीजा आपातकाल के खिलाफ जनता की प्रतिक्रिया थी, और 1996 का नतीजा नरसिंह राव की भ्रष्ट सरकार और हिंदुत्व के उभार के कारण आया था। बाबरी ढांचा टूट चुका था, जिस कारण मुस्लिम वोटर कांग्रेस से नाराज था। एक तरफ मुस्लिमों ने कांग्रेस छोड़ कर क्षेत्रीय पार्टियों का रूख कर लिया था। दूसरी तरफ हिन्दू भाजपा की तरफ आकर्षित होने लगे थे।

1996 का नतीजा कांग्रेस के खिलाफ था, लेकिन किसी के पक्ष में नहीं था, इसलिए वह भारतीय राजनीति का सबसे कठिन दौर था, जब दो साल बाद ही चुनाव करवाने पड़े थे। 1984 से पहले के दौर को याद कीजिए, देश के दूर दराज के क्षेत्रों में इंदिरा गांधी लोकप्रिय थी। या 1964 से पहले का जमाना देख लीजिए जब जवाहर लाल नेहरू लोकप्रिय थे।

Lok Sabha Elections Opposition is scoring self-goal in contest with Modi

आज से दस साल पहले तक दूर दराज के आदिवासी क्षेत्रों में किसी से पूछते थे कि प्रधानमंत्री कौन है, तो जवाब मिलता था इंदिरा गांधी। जबकि इंदिरा गांधी की 30 साल पहले हत्या हो गई थी। भारतीय राजनीति में चेहरे का हमेशा महत्व रहा है। तमिलनाडू में एमजीआर और बाद में करुणानिधि या जयललिता, इसी तरह आंध्रप्रदेश में एनटीआर चेहरे ही थे, जो राजनीति में आते ही छा गए।

विपक्ष के पास न चेहरा है, न 1977 और 1996 की तरह मुद्दा है। जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद कुछ समय के लिए एक बार अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति के चेहरे थे। वाजपेयी के समय भी लेखक अखबारों में लिखते थे, वाजपेयी के बाद कौन।

नेहरू, इंदिरा और वाजपेयी, इन तीनों के कार्यकाल में अखबारों और टेलीविजन की दुनिया में एक शब्द बहुत ही पॉपुलर हुआ था, वह शब्द था टीना फेक्टर। टीना का फुल फ़ार्म है, देयर इज नो एल्टरनेटिव, यानी कोई विकल्प ही नहीं है।

अब नरेंद्र मोदी के लिए भी वही स्थिति पैदा हो चुकी है, लोकसभा के चुनाव में मोदी का कोई विकल्प ही नहीं है। दस साल पहले सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस इसलिए बुरी तरह हार गई थी क्योंकि उनकी सरपरस्ती में चल रही मनमोहन सिंह सरकार ने भ्रष्टाचार के सारे रिकार्ड तोड़ दिए थे। अपने सहयोगी दलों के मंत्रियों के भ्रष्टाचार पर प्रधानमंत्री खुद कहते थे कि गठबंधन की राजनीति की कुछ मजबूरियां होती हैं। इसका मतलब यह था कि वह भ्रष्टाचार को अपनी सरकार की मजबूरी बता रहे थे।

वहीं से परिवारवाद और भ्रष्टाचार का मुद्दा बना, जो आज दस साल बाद भी नरेंद्र मोदी का सबसे बड़ा हथियार बना हुआ है। अपने दूसरे दौर के पांच सालों में मोदी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ इतनी बड़ी मुहिम चलाई कि विपक्ष का कोई नेता वैकल्पिक चेहरा ही नहीं बन पाया। देश की आम जनता यह मानने लगी है कि परिवारवाद की राजनीति लोकतंत्र के लिए खतरा तो है ही, भ्रष्टाचार की जड़ में भी परिवारवाद है।

नरेंद्र मोदी ने एक एक कर विपक्ष के सभी नेताओं को अदालत में खड़े हो कर जमानत लेने को मजबूर कर दिया है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी से लेकर पी. चिदंबरम तक सब भ्रष्टाचार के मामलों में जमानत पर रिहा हैं। लालू यादव, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव भ्रष्टाचार के मामलों में जमानत पर रिहा हैं।

ममता बनर्जी की केबिनेट के दो मंत्री भ्रष्टाचार के मामले में जेल में हैं। उनका भतीजा ईडी की पूछताछ के घेरे में है। अरविन्द केजरीवाल की सरकार के दो मंत्री भ्रष्टाचार और मनीलांड्रिंग में एक साल से भी ज्यादा समय से जेल में हैं। आम आदमी पार्टी की पंजाब सरकार का एक मंत्री भ्रष्टाचार में जेल की हवा खा चुका है, आप का एक सांसद भी शराब घोटाले में जेल में है। खुद अरविन्द केजरीवाल शराब घोटाले और जल प्राधिकरण घोटाले में ईडी की पूछताछ से बचते घूम रहे हैं। ईडी के समन की तामील न करने के केस में खुद केजरीवाल जमानत पर रिहा हैं।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को सरकारी जमीन हड़पने और अवैध खदान के आरोपों में इस्तीफा देकर जेल में जाना पड़ा है। उनकी भाभी सीता सोरेन को रिश्वत मांगने के आरोप में दोषी पाया गया है। इसलिए विपक्ष जितना चाहे गठबंधन कर ले, विपक्ष के नेताओं की विश्वसनीयता खत्म हो चुकी है।

राहुल गांधी को मोदी का विकल्प बनाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन उनमें कोई विजन ही दिखाई नहीं दे रहा। उन्हें भारतीय संस्कृति, परंपराओं और भारतीय राजनीति की कोई समझ ही नहीं है। इसकी झलक बार बार उनके भाषणों में दिखती है। नफरत की राजनीति से कोई भारतीय जनमानस में अपनी जगह नहीं बना सकता। राहुल गांधी की सारी राजनीति मोदी विरोध और उनसे नफरत पर टिकी है।

भले ही उन्होंने मुम्बई में अपनी दूसरी भारत जोड़ो न्याय यात्रा के समापन भाषण में कहा कि विपक्ष की राजनीति मोदी या भाजपा के खिलाफ नहीं है, लेकिन उनका कोई भाषण मोदी विरोध के बिना खत्म ही नहीं होता। उन्हें इतनी सी समझ नहीं है कि मोदी ने भारतीय वोटरों के मन में अपनी जगह नेहरू और इंदिरा गांधी जैसी बना ली है। उनका विरोध सिर्फ मुद्दों पर हो सकता है, लेकिन विपक्ष एक मुद्दा उठाकर दूसरे दिन उसे भूल जाता है।

इलेक्टोरल बॉन्ड चंदे का कानूनी प्रावधान था, विपक्ष ने भले ही इलेक्टोरल बॉन्ड का विरोध किया, लेकिन उन्होंने खुद भी इलेक्टोरल बॉन्ड से चंदा लिया। अब सुप्रीमकोर्ट ने उसे अवैध ठहरा दिया है, तो विपक्ष भाजपा को घेरने की कोशिश कर रहा है। लेकिन जितनी भाजपा कटघरे में खडी है, उतनी ही कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके और आम आदमी पार्टी कटघरे में है। इसलिए इलेक्टोरल बांड भी विपक्ष का सेल्फ गोल ही है।

राहुल गांधी हो या विपक्ष का कोई भी अन्य नेता, वे मोदी पर हमले करके सिर्फ सेल्फ गोल ही कर रहे हैं। कुछ दिन पहले तेजस्वी यादव की रैली में लालू यादव ने नरेंद्र मोदी के हिन्दू होने और उनके परिवारहीन होने का बयान देकर सेल्फ गोल कर लिया था। अब राहुल गांधी ने यह कह कर अपने खिलाफ बहुत बड़ा सेल्फ गोल कर लिया कि उनका मुद्दा हिन्दू धर्म की शक्ति के खिलाफ है। वह अपनी बात को आसान शब्दों में समझा ही नहीं पाते, अलबत्ता हिन्दू धर्म के बारे में अपने अल्पज्ञान के कारण हिन्दुओं के आक्रोश और हंसी का पात्र बन जाते हैं। जिसका हिन्दू धर्म के बारे में, जिसे सुप्रीमकोर्ट ने भारत की जीवन पद्धति कहा है, उसका बोध ही नहीं है, वह भारत की अस्सी प्रतिशत हिन्दू जनता का नेता कैसे बन सकता है।

मुम्बई के अपने भाषण में राहुल गांधी ने कहा कि उनका विरोध भाजपा या मोदी से नहीं है, हिन्दू धर्म में एक शब्द होता है शक्ति, उनका विरोध उस शक्ति के खिलाफ है। हिन्दू धर्म में मां काली को शक्ति माना जाता है, मां दुर्गा को शक्ति माना जाता है, स्त्री को शक्ति माना जाता है। राहुल गांधी को पता ही नहीं है कि वह क्या कहना चाहते हैं, और क्या कह रहे हैं।

अपने नेता के अल्पज्ञान और विजन की कमी के कारण कांग्रेस खुद ही हतोत्साहित हो चुकी है। कांग्रेस चुनाव में कहीं लड़ती हुई दिखाई ही नहीं दे रही। मल्लिकार्जुन खडगे, दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, अशोक गहलोत, सभी ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया। ममता बनर्जी ने ठीक समय पर कहा था कि लड़ाई तब दिखाई देगी, जब राहुल गांधी या प्रियंका गांधी वाराणसी में मोदी के सामने खड़े हों। लेकिन गांधी परिवार तो चुनाव लड़ने से ही भाग रहा है। सोनिया गांधी चुनावों से पहले ही राज्यसभा पहुंच गई।

खबर यह आई है कि प्रियंका गांधी चुनाव नहीं लड़ रही, राहुल गांधी ने सुरक्षित सीट केरल की वायनाड चुन ली है। अगर राहुल गांधी की उम्मीदवारी वायनाड से पहले अमेठी घोषित होती, तो एक संदेश निकलता कि वह भाजपा को चुनौती दे रहे हैं। अब वह अमेठी से भी चुनाव लड़ें, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि एक संदेश तो चला गया है कि गांधी परिवार उस यूपी से भाग रहा है, जो उनके परिवार का राजनीतिक आधार रहा है।

मोदी के सामने चुनौती तब दिखाई देती, जब कांग्रेस उत्तर प्रदेश में खम ठोक कर समाजवादी पार्टी से आधी सीटों की मांग करती, देश में एक संदेश जाता कि राहुल गांधी की भारत जोड़ों यात्राओं से कांग्रेस में मोदी को हराने का कान्फिडेंस पैदा हुआ है|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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