लोकसभा चुनाव 2019 : बहुप्रचारित विपक्षी एकता की धुंधली पड़ती तस्वीर

नई दिल्ली। ऐसे समय जब माना जा रहा है कि आम चुनाव की घोषणा किसी भी समय की जा सकती है और सभी पार्टियां चुनावी तैयारियों में जुटी हुई हैं, यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव के मद्देनजर विपक्षी एकता की तस्वीर कैसी है। अब से कोई चार-छह महीने पहले की राजनीतिक सरगर्मी को अगर याद किया जाए, तो लगता था कि यह लोकसभा चुनाव तकरीबन पूरा विपक्ष एकजुट होकर लड़ेगा। इसके लक्षण भी कई बार दिखे थे, जिनको लेकर सियासी हलकों में भी ऐसी चर्चाएं जोर पकड़ने लगी थीं कि इस बार विपक्ष काफी मजबूती के साथ सत्ताधारी भाजपा को कड़ी चुनौती देने की तैयारी कर चुका है।

लोकसभा चुनाव:बहुप्रचारित विपक्षी एकता की धुंधली पड़ती तस्वीर

इसे कर्नाटक में एक मंच पर विपक्ष के आ जाने से लेकर हाल में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की रैली में बड़े विपक्षी जमावड़े से काफी मजबूती मिली थी। बीच-बीच में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रयासों से भी इस तरह की धारणा बन रही थी कि चुनाव के पहले कोई बड़ा और मजबूत विपक्षी गठबंधन बन सकता है। इसके पीछे सबसे मजबूत आधार प्रदान किया था उत्तरप्रदेश में गोरखपुर, फूलपुर और कैराना की सीटों पर विपक्ष को मिली जीत ने। उसके आधार पर यह माना जाने लगा था कि अगर विपक्ष एकजुट होकर लड़ेगा तो भाजपा को हराया जा सकता है।

असल में यह तीनों सीटें दो कारणों से बहुत महत्वपूर्ण थीं। एक तो यह कि यह भाजपा की सीटें थीं और तीनों ही उत्तरप्रदेश की जहां भाजपा के दिग्गज नेता चुनाव जीते थे, लेकिन उपचुनाव में पार्टी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। इसमें भी गोरखुपर से योगी आदित्यनाथ जीते थे जो उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। फूलपुर की सीट से केशव प्रसाद मौर्य जीते थे जो तब उत्तरप्रदेश भाजपा के अध्यक्ष थे और फिर उपमुख्यमंत्री बने। कैराना सीटे से भी भाजपा के दिग्गज नेता हुकुम सिंह जीते थे। वह सीट भी भाजपा हार गई थी। इस लिहाज से अगर देखा जाए तो पता चलता है कि जिस उत्तरप्रदेश में बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा को करीब-करीब एकतरफा सीटें मिली थीं, उसी उत्तरप्रदेश में पार्टी अपने मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री की सीट नहीं बचा पाई तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण विपक्षी एकता को ही माना गया। इन तीनों ही उपचुनावों में कांग्रेस, सपा, बसपा और रालोद समेत तकरीबन पूरे विपक्ष से एक ही प्रत्याशी था। इससे यह संदेश गया कि एकजुट विपक्ष में इतनी ताकत है कि वह अजेय मानी जा रही भाजपा को परास्त कर सकता है।

लेकिन अब जबकि चुनाव आ चुके हैं, एक तरह से साफ लग रहा है कि विपक्ष की उस एकता का स्वरूप नहीं बन पा रहा है जिसकी बहुत चर्चा चल रही थी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण उत्तरप्रदेश से ही देखा जा रहा है जहां पहले सपा और बसपा तथा बाद में रालोद ने गठबंधन बना लिया जिसमें कांग्रेस नहीं है। कुछ इसी तरह के हालात पश्चिम बंगाल में भी बनते नजर आ रहे हैं जहां तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के अलग-अलग चुनाव लड़ने की संभावनाएं ज्यादा नजर आ रही हैं। दिल्ली में भी आम आदमी पार्टी और कांग्रेस की एकता की एक तरह से समाप्त हो चुकी हैं। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में भी लगता नहीं कि कांग्रेस किसी अन्य पार्टी के साथ कोई गठबंधन करने जा रही है। हालांकि महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में कांग्रेस जरूर गठबंधन कर चुकी है। बिहार में संभावना है कि उसका राजद के साथ तालमेल रहेगा। लेकिन देश के स्तर पर उस तरह की विपक्षी एकता का कोई रूप बनता नहीं दिख रहा है।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अब विपक्षी एकता की वैसी जरूरत नहीं जैसी पहले बताई जा रही थी अथवा विपक्ष की कोई अपनी अंदरूनी रणनीति है। यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि जब विपक्षी एकता की बातें शुरू हुई थीं, तब राजनीतिक दलों के नेताओं की ओर से यह कहा जाता था कि भाजपा और नरेंद्र मोदी को सत्ता से बाहर करना जरूरी है और यह तभी संभव हो सकता है कि जब पूरा विपक्ष एकजुट होकर चुनाव में जाए। तब आखिर अब क्या परिस्थितियां बदल गई हैं और क्या अब अकेले दम पर भी कोई पार्टी अथवा छोटे-छोटे गठबंधन भाजपा को हराने में सक्षम हो गए हैं। क्या कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों ने यह मान लिया है कि उनके मतदाता भाजपा को हराने का मन बना चुके हैं। शायद इन सबको यह भान हो गया हो लेकिन देखने की बात यह है कि क्या वाकई ऐसी स्थितियां बन चुकी हैं कि आम मतदाता भाजपा से इतना परेशान हो चुका है कि वह विपक्षी प्रत्याशी को जिता देगा।

कांग्रेस को शायद यह विश्वास हो गया हो। पंजाब से लेकर छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में उसका यह प्रयोग सफल हो चुका है। इससे स्वाभाविक रूप से उसे लग सकता है कि यह समय उसके लिए उन जगहों पर अकेले चुनाव में जाने का है जहां वह जीत सकती है। इसीलिए वह केवल उन्हीं जगहों पर गठबंधन कर रही है जहां उसे इसकी जरूरत लग रही है। उत्तरप्रदेश जैसे उस राज्य में भी वह अकेले चुनाव मैदान में जाने को तैयार है जहां कांग्रेस को बहुत कमजोर माना जाता है। लेकिन शायद उसे लग रहा है कि उसे अकेले लड़ने में ही लाभ होगा। एक कारण यह भी हो सकता है कि सपा-बसपा ने खुद ही गठबंधन कर लिया और कांग्रेस को पूछा तक नहीं। ऐसे में उसके सामने एकला चलो के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।

इन हालात में फिलहाल यह एक तरह से साफ हो चुका है कि इस चुनाव में भी गठबंधन पिछले चुनाव जैसे ही रहेंगे। चंद्रबाबू नायडू जैसे कुछ सहयोगी इधर से उधर हो सकते हैं लेकिन समग्र विपक्षी एकता की तस्वीर धुंधली ही पड़ती नजर आ रही है। अब यह देखने की बात होगी कि जब विपक्ष अलग-अलग चुनाव मैदान में जाएगा तो परिणाम कैसे आएंगे। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि पिछले चुनाव में भाजपा ने बहुत छोटे-छोटे दलों के साथ गठबंधन किए थे जबकि इस बार उसके कई सहयोगी पहले ही साथ छोड़ चुके हैं और कई छोड़ने पर आमादा हैं। इसके अलावा यह भी माना जा रहा है कि नोटबंदी से लेकर जीएसटी तक और किसानों से लेकर दलित-आदिवासियों तक के मुद्दों और बेरोजगारी जैसे सवालों को लेकर भाजपा की साख भी कमजोर हुई है। यह अलग बात है कि भाजपा मानकर चल रही है कि वह देशभक्ति और मंदिर जैसे मुद्दों के बलपर वह पहले से ज्यादा मजबूत स्थिति में आ गई है। अब यह देखने वाली बात होगी कि एकजुटता के अभाव में विपक्ष की स्थिति कैसी बनती है।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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