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लोकसभा चुनाव 2019: अंतिम समय में घोषणापत्र ही नहीं दल-बदल रोकना भी जरूरी

नई दिल्ली। चुनाव आयोग ने चुनाव प्रचार ख़त्म होने के 48 घंटे पहले घोषणापत्र जारी करने पर रोक लगा दी है। यह निर्देश हर चुनाव में लागू होगा। यह कदम स्वागतयोग्य लगता है मगर ज़रूरत इस कदम से कहीं और ज्यादा की है। आखिरी समय में मतदाताओं को लुभाने की कोशिश रोकने की ज़रूरत तो है ही, उन्हें भरमाने की कोशिशों पर भी विराम लगाना बहुत जरूरी है। यह सही मौका है जब हम तलाश करें कि ऐसे और कितने छिद्र वर्तमान चुनाव व्यवस्था में हैं जिन्हें भरना लोकतांत्रिक व्यवस्था को पवित्र बनाए रखने के लिहाज से बेहद जरूरी है।

अंतिम समय में घोषणापत्र ही नहीं दल-बदल रोकना भी जरूरी

राजनीतिक उत्सव बन गया है दलबदल
चुनाव की तारीख नजदीक आते ही दलबदल चरम पर है। हमने जनप्रतिनिधियों के दलबदल पर अंकुश के लिए तो कानून बना रखा है मगर राजनीतिक दलों में इसकी आवश्यकता बनी हुई है। पार्टी छोड़ने-पकड़ने की गतिविधियां चुनावी मौसम का उत्सव बनी दिख रही हैं। हर कोई ख़ुश है। पार्टी भी, पार्टी छोड़ने-पकड़ने वाले भी। किसी नेता को जोड़कर राजनीतिक दल खुद के मजबूत होने का दावा तो कर लेते हैं, लेकिन किसी नेता के छोड़कर जाने की घटना से वे बेपरवाह भी दिखते हैं मानो उन पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

ऐसा नहीं है कि दलबदल से कोई दुखी नहीं है। राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं में रोष के रूप में यह दुख दिखता है। पार्टी से इस्तीफ़ा देकर घर बैठ जाने वाले मायूस नेता भी होते हैं जिन्हें कहीं और जाना भी गवारा नहीं होता। मगर, ऐसे लोगों को सुर्खियां नहीं मिलतीं। वजह ये है कि चुनाव को प्रभावित करने वाले लोग ही मीडिया में जगह बना पाते हैं। चुनाव को प्रभावित करना यानी किसी दल या उम्मीदवार को चोट पहुंचाने की क्षमता होना। ऐसे तत्व बागी कहे जाते हैं।

हेलीकॉप्टर उम्मीदवार, बगावत, असंतोष...से मिलेगा छुटकारा?
सवाल ये है कि क्या कोई तरीका नहीं है जिससे हेलीकॉप्टर उम्मीदवार, दलबदल, बगावत, असंतोष और चुनाव मौसम की ऐसी ही व्युत्पत्तियों से निजात पाया सके? यह सवाल भी उतना ही जरूरी है कि क्या चुनाव के लिए ये चीजें बिल्कुल गैर जरूरी हैं और इससे बचना बहुत जरूरी है? अगर किसी राजनीतिक दल ने कोई ऐसी राजनीतिक लाइन पकड़ ली जिसे बड़ा सैद्धांतिक परिवर्तन कहते हैं तो राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं को उस पर प्रतिक्रिया देने का पूरा अधिकार होना चाहिए। वह पार्टी छोड़कर या पार्टी तोड़कर या किसी और तरीके से इस पर अपने असंतोष का इजहार कर सकते हैं या फिर कोई नयी उम्मीद अपने लिए या दूसरों के लिए पैदा कर सकते हैं। मगर, ऐसी घटना चुनाव आचारसंहिता लागू होने से पहले हो या इससे भी बहुत पहले हो, इसे निश्चित करने के बारे में सोचा जा सकता है।

दलबदल रोकने के क्या हैं रास्ते?
कुछेक कदम उठाए जा सकते हैं जैसे चुनाव प्रक्रिया पूरी होने की अंतिम तारीख से छह महीने की उल्टी गिनती शुरू होने के बाद
· किसी नये राजनीतिक दल को मान्यता न मिले
· किसी को नये राजनीतिक दल का चुनाव चिन्ह न मिले
· राजनीतिक दलों को सैद्धांतिक बदलाव की आज़ादी भी इस दौरान न हो (हालांकि अपवाद बने रहेंगे)
· किसी भी सरकार में मंत्री, किसी अन्य संकाय के प्रमुख पद पर नियुक्ति या अपदस्थ करने जैसे फैसले भी न हों
· चुनाव पूर्व गठबंधन पर भी इस दौरान रोक रहे

ऐसे कदमों से चुनाव के दौरान जो आपात परिस्थितियां बनती हैं, नये-नये समीकरण बनते-बिगड़ते हैं और इस वजह से आम मतदाताओं को विगत 5 साल के अनुभव के आधार पर वोट देने में जो दिक्कतें पैदा हो जाती हैं, उससे उन्हें बचाया जा सकेगा। कम से कम चुनाव से पहले के छह महीने तटस्थ मूल्यांकन के जरूर बनेंगे जिसमें मतदाताओं को राजनीतिक अवसरवाद को समझने का मौका मिलेगा और राजनीतिक ईमानदारी का भी वे मूल्यांकन कर सकेंगे। हालांकि दल बदलने की आज़ादी नहीं रोकी चाहिए, किन्तु इस आज़ादी को चुनाव नहीं लड़ने देने से जोड़ने की ज़रूरत है। ऐसा करके ही राजनीतिक आज़ादी के दुरुपयोग को सुनिश्चित किया जा सकता है।

लोकलुभावन बजट पर भी अंकुश लगे
चुनाव के छह महीने पहले बजट पेश करने को भी रोका जाना चाहिए। ऐसा नहीं है कि संसदीय चुनाव हो तो यह प्रतिबंध केवल संसद पर लागू हो, विधानसभाओं पर भी यह प्रतिबंध होना चाहिए। इसी तरह राज्यों में चुनाव की स्थिति में यह अनुशासन संसद के लिए भी जरूरी हो। मगर, ऐसा तभी हो सकता है जब कम से कम ऐसी व्यवस्था हो कि संसदीय चुनाव एक बार में और विधानसभाओं के चुनाव भी एक बार में हों। यानी दो बार से अधिक समय के लिए चुनाव की परिस्थितियां न बने।

ढाई साल के फर्क पर देश में हों दो चुनाव
लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव ढाई-ढाई साल के अंतर पर निश्चित किए जा सकते हैं। हालांकि इसे निश्चित करने के लिए भी कई तरह की नयी व्यवस्थाएं करनी होंगी जिससे बारहमासी चुनावी मौसम को रोका जा सके, जो देश के लिए बहुत जरूरी हो गया है। इस व्यवस्था में निर्वाचित प्रतिनिधियों की अकाल मृत्यु, असमय सरकार का गिर जाना जैसी स्थितियां भी शामिल हैं। अकाल मृत्यु के मौके पर दूसरे नम्बर पर रहने वाले उम्मीदवार को मौका दिया जा सकता है या तो सरकार गिरने की स्थिति में राष्ट्रीय सरकार जैसी संकल्पना को लागू किया जा सकता है। विकल्प और भी हैं मगर इस आलेख की भी अपनी सीमा है।

घोषणापत्र के साथ ही शुरू हो चुनाव अभियान
घोषणापत्रों को सिर्फ चुनाव की तारीख से 48 घंटे पहले जारी करने की व्यवस्था बहुत फायदेमंद नहीं है। बगैर घोषणापत्र के चुनाव अभियान की शुरुआत की इजाजत ही नहीं दी जानी चाहिए। एक बार घोषणापत्र बन गये, तो नयी घोषणाएं और वादों पर भी रोक लगाने की ज़रूरत है। इससे एक-दूसरे से मात देने के लिए जो बेवजह की बढ़चढ़कर घोषणाएं होती हैं और मतदाताओं को लुभाया जाता है उस पर रोक लग सकेगी। सवाल ये है कि क्या इस विषय पर सोचने की ज़िम्मेदारी सिर्फ चुनाव आयोग की हो? यह विषय इतना बड़ा है कि इस सोच के लिए राजनीतिक दलों को ही बैठना होगा।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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