मध्यप्रदेश: लोकसभा चुनाव के बीच छापेमारी के सियासी मायने
नई दिल्ली। आयकर विभाग द्वारा मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के करीबियों पर छापे के बाद से प्रदेश के सियासी माहौल में उबाल आ गया है. लोकसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग से 4 दिन पहले की गयी इस कारवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं और इसके राजनीतिक मायने भी तलाशे जा रहे हैं, जहां एक तरफ भाजपा इसे “काले धन” पर प्रहार बता रही है तो वहीँ कांग्रेस इसको भाजपा द्वारा आगामी चुनाव में लाभ लेने की कवायद बता रही है।

कमलनाथ के नजदीकियों के यहां छापे
आयकर विभाग के इस छापे के दायरे में मुख्यमंत्री कमलनाथ के पूर्व निजी सचिव प्रवीण कक्कड़, ओएसडी राजेंद्र कुमार मिगलानी, भांजे रतुल पुरी, अश्विनी शर्मा, प्रदीप जोशी शामिल हैं जिनके 50 से अधिक ठिकानों पर छापे मारे गये हैं. दावा किया जा रहा है इस छापेमारी के दौरान करोड़ों की संपत्ति और नगदी मिली है. पश्चिम बंगाल की तरह यहां भी आयकर विभाग की टीम द्वारा प्रदेश की ऐजेंसियों बाताये बिना ही यह कार्रवाई की गयी है यहां तक कि राज्य चुनाव आयोग तक को इसके बारे में जानकारी नहीं दी गई थी. आईटी टीम अपने साथ सीआरपीएफ जवानों की टुकड़ी भी लाई थी जिसकी वजह से छापेमारी के दौरान केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ़) और मध्य प्रदेश पुलिस के बीच टकराव जैसी स्थिति बन गयी थी.
आयकर विभाग की इस कारवाई के बाद भाजपा हमलावर नजर आ रही है पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि पिछले 100 दिनों में मध्यप्रदेश में जो खेल चला था यह सब उसी का नतीजा है. नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने आरोप लगाया है कि प्रदेश में कमलनाथ सरकार में जो ट्रांसफ़र उद्योग चलाया गया उसके नतीजे अब जनता के सामने आ रहे हैं उन्होंने कहा है कि "मुख्यमंत्री के ओएसडी के यहाँ से छापे में कालेधन का मिलना गंभीर मामला है, नैतिकता के आधार पर मुख्यमंत्री को अपना इस्तीफ़ा दे देना चाहिये."
वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस ने पलटवार करते हुये आरोप लगाया है कि यह कार्यवाही चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस पार्टी की छवि खराब करने और राजनीतिक दबाव बनाने का यह असफल प्रयास है. मुख्यमंत्री कमलनाथ ने आरोप लगाया है कि ये सबकुछ मोदी सरकार के इशारे पर हो रहा है, उन्होंने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि पूरा देश जानता है कि पिछले 5 वर्षों से यह लोग कैसे संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल करते आये हैं, जब इनके पास विकास और अपने काम पर कुछ कहने और बोलने के लिए नहीं बचता है तो ये विरोधियों के खिलाफ इसी तरह के हथकंडे अपनाते हैं।

छापों की टाइमिंग पर सवाल
इस पूरे प्रकरण में चुनाव आयोग का रुख भी गौरतलब है जिसमें उसने जांच एजेंसियों को आगाह करते हुये निर्देश दिया है कि आचार संहिता के दौरान होने वाली कार्रवाई एकतरफा नहीं होनी चाहिये और ऐसी किसी भी कार्रवाई से पहले उसे इसकी सूचना आयोग को दी जाये। आयकर विभाग द्वारा की गयी इस कारवाई के टायमिंग और मकसद को लेकर सवाल खड़े किये जा रहे हैं . एजेंसियों के बेजा इस्तेमाल को लेकर मोदी सरकार का रिकार्ड पहले से ही खराब रहा है ऐसे में ठीक ऐसे समय जब लोकसभा चुनाव प्रचार-प्रसार अपने चरम पर है आयकर विभाग की इस छापेमारी में सियासी मकसद ढूंढें जा रहे हैं. इससे पहले आयकर पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में भी आयकर विभाग द्वारा की गयी छापेमारी को लेकर बवाल हो चूका है जिसमें ममता बनर्जी और चंद्रबाबू नायडू धरना भी दे चुके हैं. इस सम्बन्ध में कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी भी प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी पर चुनाव से पहले विपक्षी पार्टियों को कमजोर करने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का बेजा इस्तेमाल करने का आरोप लगा चुके हैं।
मध्यप्रदेश में सत्ता से बाहर होने के बाद से प्रदेश भाजपा इकाई में भ्रम और नेतृत्वहीनता की स्थिति बन गयी है जिसकी वजह से राज्य इकाई में खेमेबाजी, आपसी घमासान और उथल-पथल अपने चरम पर है. आज स्थिति यह है कि सूबे में लोकसभा चुनाव के लिये कांग्रेस पार्टी का का प्रचार-प्रसार ज़ोर पकड़ चुका है वहीँ भाजपा में टिकटों के लिये घमासान चल रहा है. प्रदेश में भाजपा के सबसे बड़े नेता शिवराज सिंह चौहान को भले ही राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया गया हो लेकिन राजनीतिक रूप से वे अभी भी पूरी तरह से सेटल नहीं हो पाये हैं और उनका एक पांव अभी भी मध्यप्रदेश में जमा हुआ है. शिवराज ने वैसे भी अपने सामने किसी और नेता को पनपने नहीं दिया था इधर उनके मध्यप्रदेश में जमे रहने की जिद के कारण नयी टीम भी उभर कर सामने नहीं आ पा रही है।

शिवराज सिंह की भाजपा में स्थिति
2018 में विधानसभा चुनाव की हार के बाद से केंद्रीय नेतृत्व शिवराज की मर्जी के खिलाफ उन्हें प्रदेश की राजनीति से बेदखल करने को आमादा है दरअसल मोदी और शाह की जोड़ी इस बात को बखूबी समझती है कि अगर पार्टी में उनकी स्थिति थोड़ी भी कमजोर पड़ती है तो शिवराज सिंह मजबूत विकल्प केर रूप में सामने आ सकते हैं इसलिये शिवराज को उनके मजबूत किले से बाहर निकालना जरूरी है. इसलिये उन्हें राज्य से बाहर नकालने की एक खामोश जद्दोजहद जारी है. उपाध्यक्ष बना दिये जाने के बावजूद भी शिवराज खुद को प्रदेश की राजनीति में ही सक्रिय बनाये हुये हैं, फिलहाल उनकी सारी जद्दोजहद हिंदी ह्रदय प्रदेश की जमीन पर अपने पकड़ को कमजोर ना होने देने का है और इसके लिये वे हर संभव प्रयास कर रहे हैं और प्रदेश में अपने दखल का कोई ना कोई बहाना ढूंढ ही लेते हैं. सूबे में शिवराज के आलावा कोई और चमकदार चेहरा ना होने के कारण लोकसभा चुनाव तक के लिये वे भाजपा आलाकमान के लिये भी मजबूरी है।
इस खींच-तान के कारण शिवराज इस लोकसभा चुनाव के दौरान उदासीन दिखाई पड़ रहे हैं इन सबसे राज्य ईकाई में भी असमंजस्य की स्थिति बनी हुई है. ऐसे में मध्यप्रदेश में अब भाजपा की साड़ी उम्मीदें मोदी- शाह के करिश्मे और रणनीतियों पर निर्भर है. कमलनाथ के करीबियों पर छापेमारी को इसी से जोड़ कर देखा जा रहा है जिससे सक्रिय और तेजी निर्णय लेने वाले मुख्यमंत्री की छवि बना रहे कमलनाथ को कमजोर किया जा सके। बहरहाल जो भी हो इस छापेमारी की गूंज प्रदेश में लोकसभा चुनाव की पूरी प्रक्रिया के दौरान बनी रहेगी और भाजपा की कोशिश रहेगी कि चुनाव इसी के साये में लड़ा जाये।
(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)












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