दिल्ली को पूर्ण राज्य के सवाल को हवा देने के पीछे कहीं आप की मजबूरी तो नहीं
नई दिल्ली। पूरे देश में लोकसभा चुनाव के लिए मुद्दे चाहे जो हों, दो प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों और अनेक क्षेत्रीय दलों के लिए सवाल भले ही कुछ और हों, आम आदमी पार्टी (आप) ने खुद को दिल्ली को पूर्ण राज्य राज्य का दर्जा दिलाने पर केंद्रित किए हुए है। अभी दिल्ली सरकार में मंत्री गोपाल राय ने बाकायदा इसको लेकर कुछ शर्तें भी रख दी हैं। गोपाल राय ने कहा है कि वह महागठबंधन की सरकार को इस शर्त पर समर्थन करेंगे, जब उनकी ओर से यह वादा किया जाएगा कि सरकार बनने पर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाएगा। इसका मतलब यह हुआ कि आप के एजेंडे में मुख्य मुद्दा पूर्ण राज्य का दर्जा ही है।

केजरीवाल लगातार कर रहे पूर्ण राज्य का सवाल
अगर थोड़ा पीछे जाकर देखा जाए तो पता चलता है कि बीते कुछ समय से दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हर समस्या के पीछे पूर्ण राज्य का दर्जा न होने को बड़ा कारण बताते रहे हैं। यह कुछ उसी तरह है जैसे कभी वह भ्रष्टाचार और लोकपाल को मुद्दा बनाए हुए थे। इन्हीं मुद्दों पर आप का गठन किए जाने से पहले केजरीवाल ने आंदोलन किया था जिसके अगुवा तब प्रसिद्ध सवाजसेवी अन्ना हजारे हुआ करते थे। इस आंदोलन की सफलता के बाद केजरीवाल ने खुद को अन्ना हजारे से अलग कर राजनीतिक पार्टी बनाई और चुनाव मैदान में कूद पड़े। दिल्ली विधानसभा चुनाव में पहली बार लड़ी उनकी पार्टी आप को काफी सीटें मिलीं, लेकिन सरकार बनाने लायक नहीं। तब कांग्रेस के सहयोग से सरकार बनाई, जो बहुत दिनों तक नहीं चल सकी। उसके बाद फिर से हुए विधानसबा चुनाव में आप को प्रचंड बहुमत मिला। कांग्रेस का पूरी तरह से सफाया हो गया और भाजपा भी करारी हार का सामना करना पड़ा। बाद में हुए लोकसभा चुनाव में हालांकि आप को दिल्ली में एक भी सीट नहीं मिल सकी। पंजाब में जरूर चार आप प्रत्याशियों को जीत मिली।
अब एक बार फिर लोकसभा चुनाव हो रहे हैं और निकट भविष्य में दिल्ली विधानसभा के चुनाव भी होने हैं। इस बीच आप और केजरीवाल दोनों को भ्रष्टाचार से लेकर लोकपाल तक कई सारे मुद्दों पर लोगों की आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा है। हालांकि माना जाता है कि बिजली बिल माफ करने से लेकर मुहल्ला क्लिनिक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार जैसे बहुत सारे वादों को पूरा किया गया है, लेकिन दिल्ली सरकार के बहुत सारे फैसले ऐसे रहे हैं जिन पर उपराज्यपाल के जरिये केंद्र सरकार की ओर से लगातार अड़चनें पैदा की गईं। इसके बहाने वह लगातार इस सवाल को उठाते रहे कि केंद्र सरकार उन्हें काम नहीं करने दे रही है।

विपक्ष उठाता रहा है केजरीवाल की नीयत पर सवाल
यह अलग बात है कि विपक्ष भी लगातार केजरीवाल और आप के रवैये को लेकर सवाल उठाता रहा है। लेकिन इस सबसे इतर केजरीवाल यह बताने की कोशिश में ही लगे रहे कि अगर दिल्ली पूर्ण राज्य होता, तो आम जनता के हित में बहुत सारे काम सकते थे। ऐसा न होने की वजह से जनहित के काम प्रभावित होते रहे हैं। इसीलिए वे दिल्ली की जनता को इस समस्या को समझाना चाहते हैं कि जब तक यह नहीं होगा, उनकी समस्याएं इसी तरह बनी रहेंगी। इसलिए पूरा जोर इसी पर लगाया जाना चाहिए। केजरीवाल को शायद यह लगता है कि अब पुराने मुद्दों के आधार पर जनसमर्थन नहीं हासिल किया जा सकता। उन्हें शायद यह भी लगता होगा कि पिछले लोकसभा चुनाव में उनके मुद्दों को जनता ने कोई तवज्जो नहीं दी थी। इसलिए इस बार भी यह हो सकता है। इस कारण वह ऐसा मुद्दा लेकर आना चाहते हैं जो लोगों को समझ में भी आए और जिसके जरिये उन्हें वोट भी हासिल हो सके।
सवाल यह है कि क्या दिल्ली के लिए इस समय यह इतना बड़ा मुद्दा बन सकता है। इसे समझने के लिए यह भी देख लेना जरूरी है कि इस मुद्दे का क्या इतिहास है और अन्य बड़े दलों भाजपा और कांग्रेस का इसको लेकर रवैया कैसा रहा है। इतिहास पर नजर डालने पर पता चलता है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य को दिलाने की प्रमुखता से सबसे पहली मांग भाजपा नेता कालका दास की ओर से उठाई गई थी। लेकिन इसे बल तब मिला जब 1998 में दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा ने इस मुद्दे पर मसौदा विधेयक तैयार कराया। 1999 के लोकसभा चुनाव में भी दिल्ली में पूर्ण राज्य का मुद्दा उठा था। इतना ही नहीं, 2003 में जब केंद्र में एनडीए की सरकार थी, तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने इससे संबंधित एक विधेयक भी संसद में पेश किया था जिसे बाद में स्थायी समिति को भेज दिया गया था। अभी इससे पहले 2013 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा की ओर से इस मुद्दे को उठाया गया था और भाजपा के घोषणा पत्र में भी इसे प्रमुखता से जगह मिली थी। इस तरह भाजपा लगातार इस मुद्दे को उठाती रही है।

भाजपा-कांग्रेस भी उठाया रहे ये मु्द्दा
भाजपा के अलावा कांग्रेस भी समय-समय पर इस मुद्दे को उठाती रही है। केंद्र में पिछली एनडीए की सरकार के दौरान एक बार तो उस समय की कांग्रेस की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर संसद मार्च भी किया था। 2013 के विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के घोषणापत्र में भी इस मुद्दे को शामिल किया गया था। मतलब यह कि दोनों मुख्य पार्टियां कांग्रेस और भाजपा भी दिल्ली को पूर्ण राज्य का मुद्दा उठाती रही हैं। लेकिन फिलहाल दोनों ही पार्टियां इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं। इसके विपरीत उनकी ओर से यह भी कहा जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल और आप के पास कोई मुद्दा नहीं है, इसलिए उनकी ओर से इस मुद्दे को उठाया जा रहा है।
बहरहाल, विपक्ष के अपने तर्क हो सकते हैं, लेकिन दिल्ली को पूर्ण राज्य का मसला एक बड़ा मुद्दा तो माना ही जा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या फिलहाल यह ऐसा मुद्दा है जो किसी दल को जीत दिला सकने में सहायक हो सकेगा। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या मुद्दा कभी हल हो सकेगा। भले ही राजनीतिक पार्टियां वोट और सत्ता की खातिर इसे उठाते रहे हों अथवा उठाते रहें, लगता नहीं कि देश की राजधानी की विशिष्ट परिस्थितियों की वजह से यह कभी पूरा हो सकेगा। लेकिन अगर किसी पार्टी को यह लगता है कि इसमें वह सफल हो जाएगी, तो जवाब उन मतदाताओं के माध्यम से मिल सकता है कि वे इस लोकसभा चुनाव में इस मुद्दे को कितना तवज्जो देते हैं।
(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)












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