Western UP: पश्चिमी यूपी में ‘नल’ के पानी से ‘कमल’ की सिंचाई
Western UP: पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट नेता जयंत चौधरी ने कहा है कि उनका चुनाव चिन्ह नल है और नल से पानी निकलेगा तो उससे कमल की सिंचाई होगी। सांकेतिक रूप से वो यह कहना चाह रहे हैं कि रालोद और भाजपा गठबंधन से पश्चिमी यूपी में उनकी जीत को कोई रोक नहीं सकता।
जयंत चौधरी का ऐसा कहना कितना सही साबित होगा यह तो 4 जून को पता चलेगा लेकिन पश्चिमी यूपी में फिलहाल भाजपा के लिए समीकरण उलझते हुए दिख रहे हैं। अपनी पुख्ता तैयारियों, जबर्दस्त रैलियों के बावजूद इस बार पश्चिमी यूपी में भाजपा के लिए हालात 2019 से ज्यादा मुश्किल हैं।

भाजपा को पिछले चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन ने सबसे ज्यादा झटका इसी क्षेत्र में दिया था। पिछली बार दोनों गठबंधनों में सीधा मुकाबला था, लेकिन इस बार कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। ऐसे में यह अनुमान लगाना कि ऊंट किस करवट बैठेगा, मुश्किल हो गया है।
दरअसल, 2019 में पश्चिमी यूपी के सहारनपुर, मेरठ एवं मुरादाबाद मंडल की 14 सीटों में 6 पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था, जबकि ब्रज क्षेत्र की आगरा, अलीगढ़ और बरेली मंडल की 13 सीटों में केवल मैनपुरी में हारी थी। सपा-बसपा-रालोद का गठबंधन नहीं होने के बावजूद भाजपा को पश्चिमी यूपी में जूझना पड़ रहा है तो उसका सीधा कारण शीर्ष नेतृत्व का अति आत्मविश्वास तथा जाट वोटरों पर सर्वाधिक विश्वास दिखाना है। पश्चिमी यूपी में 2022 के विधानसभा चुनाव की तरह एक बार फिर जाट बनाम अन्य का समीकरण प्रभावी हो गया है।
पश्चिम यूपी के मेरठ, सहारनपुर तथा मुरादाबाद मंडल के मुजफ्फरनगर, कैराना, गौतमबुद्धनगर, मेरठ, बुलंदशहर सीट पर स्थानीय सांसदों का जबर्दस्त विरोध हो रहा था। जनता से दूरी, जातीय एवं थानों की राजनीति के चलते मतदाता अपने सांसदों से असंतुष्ट था। मुजफ्फरनगर, गौतमबुद्धनगर एवं कैराना में नाराजगी सबसे ज्यादा थी। भाजपा समर्थक वोटर मानकर चल रहे थे कि इन सीटों पर प्रत्याशियों को बदला जायेगा, लेकिन भाजपा नेतृत्व ने मेरठ छोड़कर सभी सीटों पर पुराने चेहरों को ही रिपीट कर दिया। मतदाताओं के एक बड़े वर्ग में इससे असंतोष है।
हालांकि, भाजपा मानकर चल रही है कि नाराज मतदाताओं के पास विकल्प नहीं है। मतदान के दिन नाराजगी के बावजूद नरेंद्र मोदी के नाम पर भगवा खेमे में लौट आयेंगे। भाजपा की यह सोच कुछ हद तक सही भी है, क्योंकि नरेंद्र मोदी को लेकर जनता में कोई नाराजगी नहीं है और विपक्ष भी कमजोर नजर आ रहा है। परंतु, इस बार भाजपा की यह सोच उल्टी पड़ सकती है। कोर वोटर अपने स्थानीय सांसदों से इतना नाराज है कि वह भाजपा का विरोध कर रहा है।
भाजपा का आईटी सेल इस विरोध को कुछ लोगों की साजिश बताकर डैमेज कंट्रोल करने का भरसक प्रयास कर रहा है। आईटी सेल दूसरे दलों को वोट देने वाले अपने वोटरों को देशद्रोही साबित कर भावनात्मक घेरेबंदी भी कर रहा है, लेकिन जमीन पर इसका असर उल्टा दिख रहा है। पश्चिमी यूपी में केवल क्षत्रिय ही नहीं बल्कि त्यागी, शाक्य, कश्यप, सैनी, पाल और प्रजापति वोटर भी अलग-अलग सीटों पर अलग-अलग कारणों से भाजपा से नाराज हैं। सबसे ज्यादा विरोध मुजफ्फरनगर में संजीव बालियान तथा कैराना में प्रदीप चौधरी का है।
पश्चिमी यूपी में तमाम जातियां प्रभावी संख्या में हैं, लेकिन भाजपा ने जाटलैंड का नैरेटिव बना दिया है। यह नैरेटिव इस बार भाजपा को नुकसान पहुंचा सकता है। 2022 में किसान आंदोलन के समय भी नैरेटिव बना था कि जाटों की नाराजगी भाजपा को भारी पड़ेगी। जाटों की नाराजगी और रालोद-सपा गठबंधन के बावजूद भाजपा ने पश्चिमी यूपी में शानदार प्रदर्शन किया था तो उसका सीधा कारण था कि जाट रालोद-सपा के साथ था, वहीं क्षत्रिय, ब्राह्मण, सैनी, कश्यप, शाक्य, पाल, त्यागी, प्रजापति जैसी तमाम जातियां भाजपा के साथ खड़ी थीं।
पश्चिमी यूपी में त्यागी, पाल, सैनी, कश्यप, प्रजापति, ब्राह्मण, गुर्जर भी अच्छी संख्या में हैं। गुर्जर और ब्राह्मणों में कोई नाराजगी नहीं है, लेकिन अन्य जातियों को प्रतिनिधित्व ना मिलने से उदासीनता है। दूसरे दलों ने जिन सीटों पर इन जातियों के उम्मीदवार उतारे हैं, इनका उस दल की तरफ झुकाव दिख रहा है। पश्चिमी यूपी में दलित एवं मुसलमान बड़ा फैक्टर है। जाटव पूरी तरह बसपा के साथ हैं तो मुसलमान इंडिया गठबंधन के साथ, लेकिन बसपा ने कई सीटों पर मुस्लिम प्रत्याशी उतारकर इंडिया गठबंधन की, वहीं क्षत्रिय एवं त्यागी प्रत्याशी उतारकर भाजपा की मुश्किल बढ़ा दी है।
बसपा ने सहारनपुर में इंडिया गठबंधन के इमरान मसूद के खिलाफ माजिद अली को उतारकर मामला फंसा दिया है। भाजपा से राघव लखनपाल उम्मीदवार हैं। मुस्लिम वोट बंटे तो भाजपा को फायदा होगा और क्षत्रिय वोट बंटा तो कांग्रेस को। इसी तरह बसपा ने नोएडा में पूर्व विधायक राजेंद्र सिंह सोलंकी, गाजियाबाद से नंदकिशोर पुंडीर तथा मेरठ से देववृत्त त्यागी को उतारकर भाजपा की मुश्किल बढ़ा दी है। मुरादाबाद, रामपुर, संभल और अमरोहा में मुस्लिम प्रत्याशी उतारकर बसपा ने सपा के सामने मुस्लिम वोटों के बंटवारे को रोकने की चुनौती पैदा कर दी है।
बसपा ने मुजफ्फरनगर में दारा सिंह प्रजापति को उम्मीदवार बनाकर भाजपा के वोटों में सेंधमारी की है। इस सीट पर क्षत्रियों के अलावा अन्य जातियां भी संजीव बालियान से नाराज हैं। भाजपा को केवल जाटों पर ज्यादा भरोसा दिखाना, भारी पड़ रहा है। प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी जाट हैं, इसके बावजूद भाजपा ने जाटलैंड के नैरेटिव को मजबूत करने के लिये रालोद से गठबंधन किया। भूपेंद्र चौधरी ने जाटलैंड के नैरेटिव को बनाये रखने के लिये अपना पूरा फोकस मुजफ्फनगर सीट पर लगा दिया है। नाराज लोगों से मीटिंग कर रहे हैं, लेकिन यह कितना असरकारी होगा, यह तो चुनाव परिणाम आने पर ही पता चलेगा।
पश्चिमी एवं ब्रज क्षेत्र में भाजपा ने त्यागी, सैनी, पाल, प्रजापति समाज को कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया है, लेकिन ये जातियां भाजपा से तभी छिटकेंगी, जब दूसरे दल से इनकी जाति का प्रत्याशी आयेगा। इस बार भाजपा के लिए 2019 का प्रदर्शन दोहराना भी आसान नहीं है। भाजपा ने पश्चिम एवं ब्रज की 27 सीटों में 20 पर जीत हासिल की थी, लेकिन इस बार स्थानीय समीकरणों एवं त्रिकोणीय लड़ाई के चलते 20 सीटों को बचा पाना आसान नजर नहीं आ रहा है। भाजपा अपनी जीती हुई सीटें बचाने में सफल होती है तो यही उसके लिए बड़ी उपलब्धि होगी।
भाजपा के लिए 2019 में इन 27 सीटों पर समीकरण इसलिए बहुत खराब नहीं हुए, क्योंकि सपा-बसपा गठबंधन जितना कागजों पर प्रभावी नजर आ रहा था, धरातल पर उतना असरकारी नहीं दिखा। दोनों दलों में गठबंधन के बावजूद जमीनी एवं सामजिक स्तर पर इनके मतदाताओं के बीच बनी दूरी मतदान के दौरान भी दिखी। सपा का वोटर तो खुलकर बसपा के साथ आया, लेकिन बसपा का वोटर अपना वोट सपा को देने के बजाय भाजपा को दे आया। इसके चलते ही बसपा शून्य से दस सीट तक पहुंच गई और सपा पांच की पांच रही।
गठबंधन जमीन पर असरकारी होता तो सपा नेता डिम्पल यादव की कन्नौज और धर्मेंद्र यादव की बदायूं में हार नहीं होती और मैनपुरी में मुलायम सिंह यादव की जीत का अंतर एक लाख के नीचे नहीं आता। यह इसलिए हुआ क्योंकि बसपा वोटर सपा को वोट देने के बजाय भाजपा की तरफ मूव कर गया।
दरअसल पिछली बार सपा-बसपा का गठबंधन भाजपा के लिए संजीवनी का काम कर गया, लेकिन इस बार मुकाबला त्रिकोणीय है। इसलिए पश्चिमी यूपी में भाजपा के लिए फिर से 2014 और 2019 के चुनाव परिणामों को दोहरा पाना आसान नहीं है। वह भी तब जब हिंदुत्व की राजनीति में जातीय समीकरण की सेंध लग चुकी है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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