डर दिखा कर चुनाव जीतने की रणनीति से किसे लाभ?
Chunav Prachar: जब चुनाव शुरू हुआ था, तब राहुल गांधी जाति आधारित आरक्षण के अपने एजेंडे पर चल रहे थे| भले ही उन्हें नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी के जाति आधारित जनगणना नहीं करवाने के निर्णयों से जुड़े तीखे सवालों का सामना करना पड़ रहा था| लेकिन पहले चरण की वोटिंग तक राहुल अपने एजेंडे से टस से मस नहीं हुए थे।
राहुल गांधी को लगता था कि "जिसकी जितनी संख्या भारी, उतनी उसकी हिस्सेदारी" का नारा दलितों, आदिवासियों और ओबीसी को प्रभावित कर रहा है| बल्कि उसमें बाद में उन्होंने देश के हर नागरिक की सम्पत्ति का सर्वेक्षण करवाने का मुद्दा भी जोड़ दिया था| लेकिन पहले चरण की वोटिंग के बाद ही जब भाजपा इन दोनों मुद्दों पर हमलावर हुई तो कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने मोदी के तीसरी बार सत्ता में आने पर लोकतंत्र खत्म होने और संविधान बदलने का डर दिखाना शुरू कर दिया|

जब पहले चरण की वोटिंग कम हुई थी, जिसका अर्थ यह निकल रहा था कि भाजपा को पहले चरण की वोटिंग में कुछ नुकसान उठाना पड़ा है, तब होना तो यह चाहिए था कि विपक्ष अपने एजेंडे को और जोरदार ढंग से उठाता| वह कह सकता था कि हम सत्ता में आएंगे तो सुप्रीमकोर्ट से लड़ कर हर किसी को उसकी आबादी के अनुपात में शिक्षा और नौकरी का आरक्षण दिलाएंगे| लेकिन विपक्ष ने मोदी के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के नतीजों का डर दिखाना शुरू कर दिया कि मोदी इसलिए 400 सीटें मांग रहे हैं क्योंकि वह आरक्षण खत्म करना चाहते हैं|
जहां तक लोकतंत्र के खत्म होने और आख़िरी चुनाव होने का डर दिखाने की बयानबाजी थी, उसका समाज के किसी वर्ग पर कोई असर नहीं पड़ रहा था, इसलिए नरेंद्र मोदी ने उस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी| संविधान बदल कर उसमें से सेक्यूलर शब्द हटाने का डर भी समाज में कोई असर नहीं डाल रहा था, इसलिए नरेंद्र मोदी उस पर भी नहीं बोले|

लेकिन जब संविधान से आरक्षण हटाने की बात की जाने लगी, तो मोदी और शाह को लगा कि विपक्ष का यह प्रचार भाजपा को नुकसान पहुंचा सकता है| क्योंकि अतीत में आरएसएस और भाजपा के कुछ लोगों की ओर से भी जाति आधारित आरक्षण खत्म करके आर्थिक आधार पर आरक्षण की वकालत होती रही थी| संघ और भाजपा नेताओं के पुराने बयान दलितों, आदिवासियों और ओबीसी में भ्रम पैदा करने में कारगर साबित हो सकते थे, इसलिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने संविधान और आरक्षण पर अपना स्टैंड क्लीयर किया|
मोदी ने कहा कि वह तो क्या डॉक्टर आम्बेडकर भी संविधान को नहीं बदल सकते| अमित शाह ने कहा कि आरक्षण कम करने या खत्म करने का सवाल ही पैदा नहीं होता| अलबत्ता मोदी और शाह ने आरक्षण के मुद्दे पर यह कह कर उलटे कांग्रेस को कटघरे में खड़ा कर दिया कि अगर वह सत्ता में आ गई तो दलितों और आदिवासियों के कोटे से धर्म परिवर्तन करके मुसलमान और ईसाई बनने वालों को आरक्षण दे देगी| साथ ही उसी तरह देश के सारे मुसलमानों को ओबीसी कैटेगरी में शामिल करके हिन्दुओं को मिलने वाले आरक्षण का हक मार लेगी|
विपक्ष ने दलितों, आदिवासियों और ओबीसी को आरक्षण खत्म करने का डर दिखा कर मोदी और शाह को बचाव मुद्रा में ला दिया था, लेकिन अरविन्द केजरीवाल ने अपने भीतर का डर जाहिर करके इंडी एलायंस के लिए सेल्फ गोल कर लिया| जो बात उन्होंने दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस में कही थी, उसे लखनऊ में अखिलेश यादव के साथ प्रेस कांफ्रेंस में भी दोहरा दिया कि मोदी प्रधानमंत्री बनने के कुछ महीनों के अंदर ही योगी आदित्यानाथ को मुख्यमंत्री पद से हटा देंगे|
इसका मतलब यह हुआ कि वह जनता को डर दिखा रहे हैं कि जिस योगी आदित्यनाथ ने यूपी से माफिया राज और गुंडागर्दी खत्म की, जनता के उस प्रिय मुख्यमंत्री को मोदी हटा देंगे| इस का मतलब यह भी है कि अखिलेश यादव के साथ बैठ कर उन्होंने योगी आदित्यनाथ का समर्थन और तारीफ़ की है|
दूसरी बात केजरीवाल ने यह कही कि मोदी 75 साल की आयु पूरी होते ही प्रधानमंत्री की कुर्सी अमित शाह को दे देंगे| तो अपने इस बयान से भी वह जनता को डराना चाह रहे हैं कि मोदी वोट तो अपने लिए मांग रहे हैं, लेकिन वह अमित शाह को पीएम बना देंगे| इसका अर्थ यह निकलता है कि जनता में मोदी की अपील का असर है और उनकी अपील पर भाजपा तीसरी बार जीतने जा रही है|
इसका तीसरा अर्थ यह निकलता है कि उन्हें मोदी से ज्यादा अमित शाह से डर है कि जिस तरह पहली बार गृहमंत्री बनते ही उन्होंने 370 को निपटाया था, उसी तरह दूसरी बार गृहमंत्री बनते ही दिल्ली विधानसभा पर ही तलवार न चला दें, जो पिछले 25 साल से भाजपा के गले की हड्डी बनी हुई है| पहले 1998 से 2013 तक कांग्रेस जीतती रही और 2013 से आम आदमी पार्टी जीत रही है|
मोदी और शाह ने बचाव में ही सही दलितों, आदिवासियों और ओबीसी को डर दिखाया है कि कांग्रेस सत्ता में आई तो उनके आरक्षण का कोटा वह मुसलमानों को दे देगी| यह बात इन तीनों वर्गों के गले उतरनी स्वाभाविक है| इसके साथ ही चुनाव हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के पुराने एजेंडे पर लौट आया है|
नरेंद्र मोदी और अमित शाह के भाषणों में खुलेआम हिन्दुओं को विपक्ष के मुस्लिम एजेंडे का डर दिखाया जाने लगा है| चौथे चरण तक उत्तर प्रदेश की सिर्फ 26 और पश्चिम बंगाल की सिर्फ 16 सीटों पर चुनाव हुआ था, उत्तर प्रदेश की 54 और बंगाल की 26 सीटों पर चुनाव बाकी है| चौथे चरण की वोटिंग आते आते हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण तेज हो गया, जो इन दोनों ही राज्यों में बहुत मायने रखता है|
पांचवें चरण की वोटिंग से पहले दो बड़ी बातें हुई हैं| पहली बात तो यह हुई है कि बीच चुनाव में केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन क़ानून को लागू करके पाकिस्तान से आए कुछ हिन्दुओं को नागरिकता के प्रमाण पत्र बांट दिए| इससे भाजपा ने बांग्लादेश से आकर पश्चिम बंगाल में बसे हिन्दुओं को संदेश दे दिया है कि केंद्र में मोदी सरकार बनते ही उन्हें भी नागरिकता देने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी| ममता बनर्जी ताल ठोक कर कह रही हैं कि जब तक नागरिकता संशोधन क़ानून में मुसलमानों को शामिल नहीं किया जाता, वह मौजूदा नागरिकता संशोधन क़ानून लागू नहीं होने देगीं| जबकि अमित शाह ताल ठोक कर कह रहे हैं कि संसद के बनाए क़ानून को कोई राज्य सरकार नहीं रोक सकती|
दूसरी बात यह हुई है कि असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा ने उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार शुरू करते ही मथुरा और ज्ञानवापी का मुद्दा उठा दिया है| हालांकि अब तक मथुरा और काशी भारतीय जनता पार्टी के एजेंडे पर नहीं थे, लेकिन हेमंत बिस्व सरमा ने उन दोनों मन्दिरों को भारतीय जनता पार्टी का एजेंडा बता कर उत्तर प्रदेश के यादव और ब्राह्मण वोट बैंक को साफ़ संदेश दिया है कि केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद सरकार इन दोनों मन्दिरों को मुक्त करवाने का काम शुरू करेगी| भले ही हल्के से लेकिन अमित शाह ने भी मथुरा और काशी का मुद्दा उठाया है|
इसके अलावा पांचवें दौर की वोटिंग से पहले नरेंद्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह, एस.जयशंकर और हेमंत बिस्व सरमा ने एक साथ पाक अधिकृत कश्मीर को वापस लेने का राग अलापना शुरू कर दिया है| यह एक ऐसा मौक़ा है जब पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान सरकार के खिलाफ लगभग उसी तरह की बगावत शुरू हो चुकी है, जैसे 1970 में मौजूदा बांग्लादेश में पाकिस्तान के खिलाफ बगावत शुरू हुई थी और शेख मुजीबुर रहमान की रहनुमाई में मुक्ति वाहिनी ने पाकिस्तान के खिलाफ संघर्ष शुरू कर दिया था| जब पूर्वी पाकिस्तान के नागरिक सीमा पार करके भारत में घुस रहे थे, इंदिरा गांधी के आदेश पर भारतीय फ़ौज ने हमला करके पाकिस्तानी सेना को घुटने पर ला दिया था|
अब उसी तरह के हालात पाक अधिकृत कश्मीर में बन रहे हैं, और वहां आज़ादी के नारे लगने शुरू हो गए हैं| कश्मीर सभी भारतीयों लेकिन खासकर उत्तर भारतीयों के लिए भावनात्मक मुद्दा है, जिसे मोदी सरकार ने जोर शोर से उठाना शुरू कर दिया है| इस पर फारूख अब्दुल्ला का यह बयान ईंडी एलायंस के गले की हड्डी बन गया है कि पाकिस्तान ने कोई चूड़ियां नहीं पहन रखीं| उनका यह बयान पाकिस्तान की पैरवी करने वाला है|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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